
80 बरस का राधेश्याम: लावारिश लाशों को मजबूत कंधों से देता है राम नाम
लेख – राजेंद्र सिंह जादौन
कहते हैं, अगर इंसान के भीतर सच्ची लगन हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है। ऐसा ही एक उदाहरण हैं 80 वर्षीय राधेश्याम, जो जीवन बीमा पॉलिसी की उन पाँच पंक्तियों को सार्थक करते नज़र आते हैं
“ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी।” फ़र्क बस इतना है कि जहाँ बीमा कंपनी नारा देती है, वहीं राधेश्याम उसे अपने कर्मों से जीते हैं।
राधेश्याम उन लावारिश शवों का अंतिम संस्कार करते हैं, जिनका न ज़िंदगी में कोई अपना होता है और न ही ज़िंदगी के बाद। जिन हाथों को पकड़कर कोई आख़िरी विदा देने वाला नहीं होता, उन्हें राधेश्याम अपने कंधों का सहारा देते हैं। राम नाम के साथ वे उन देहों को सम्मानपूर्वक अंतिम यात्रा पर ले जाते हैं, जिन्हें समाज अक्सर भूल जाता है।
आज स्वयं 80 वर्ष की आयु में भी राधेश्याम अपनी उम्र से नहीं, अपने जुनून से पहचाने जाते हैं। उनका शरीर भले ही वृद्ध हो चला हो, लेकिन हौसले आज भी जवान हैं। उनके कंधे आज भी उतने ही मज़बूत हैं, जितना उनका संकल्प कि कोई भी इंसान इस दुनिया से बिना संस्कार के न जाए।
ऐसे कर्मयोगी, ऐसे मौन समाजसेवी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। राधेश्याम जी, आपका जीवन हम सबके लिए एक सबक है इंसानियत कभी बूढ़ी नहीं होती।


