ना तू बचेगा, ना साथी तुम्हारे; जो डूबेगी कश्ती तो डूबोगे सारे…!
लेख – राजेन्द्र सिंह जादौन
कहते हैं कि लोकतंत्र में कानून का राज होता है। हर नागरिक कानून की नजर में बराबर होता है। लेकिन यह किताबों में लिखा हुआ सत्य है। जमीन पर उतरते ही यह सत्य कई बार किसी रसूखदार भू-माफिया की आलीशान कोठी के बाहर अपनी चप्पलें उतारकर खड़ा नजर आता है।
एक ऐसे ही महाशय हैं, जिनके खिलाफ लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू और अन्य जांच एजेंसियों में 25 से अधिक शिकायतें 5000 पन्नों में साक्ष्य दर्ज हैं। शिकायतों का पुलिंदा इतना मोटा हो चुका है कि यदि उसे किसी सरकारी कार्यालय की अलमारी में रख दिया जाए तो अलमारी भी कह उठे “भाई साहब, अब मुझसे नहीं संभल रहा।”
लेकिन आश्चर्य देखिए, शिकायतें बढ़ती गईं, फाइलें मोटी होती गईं, जांचों के आदेश निकलते गए, आवेदनकर्ता बूढ़े होते गए, पर नतीजा आज भी शून्य है। ऐसा लगता है मानो शिकायतें किसी ब्लैक होल में प्रवेश कर जाती हैं, जहां से न कोई रिपोर्ट बाहर आती है और न कोई कार्रवाई।
जनता पूछती है कि आखिर ऐसा कौन-सा दिव्य कवच है जो इस भू-माफिया को हर जांच से बचा लेता है? क्या उसके पास कोई अदृश्य शक्ति है? या फिर वह सरकारी फाइलों में “वीआईपी पास” लगवाकर चलता है?
व्यंग्य यह है कि आम आदमी यदि अपने घर के सामने दो फीट की बाउंड्री बिना अनुमति बना ले तो अगले दिन नोटिस आ जाता है। लेकिन कुछ लोग पूरे खेत, तालाब, सरकारी जमीन और गरीबों के सपनों तक पर कब्जा कर लेते हैं और फिर भी व्यवस्था उनके सामने नतमस्तक दिखाई देती है।
लोकायुक्त में शिकायत हुई-जांच चल रही है।
ईओडब्ल्यू में शिकायत हुई-जांच विचाराधीन है।
दूसरी एजेंसी में शिकायत हुई-प्रकरण परीक्षण में है।
तीसरी एजेंसी बोली-दस्तावेजों का अध्ययन किया जा रहा है।
चौथी एजेंसी ने कहा -उच्च स्तर से मार्गदर्शन प्राप्त किया जा रहा है।
और जनता सोच रही है कि शायद जांच एजेंसियां नहीं, कोई विश्वविद्यालय शोधकार्य कर रहा है जिसका निष्कर्ष अगले सौ वर्षों में प्रकाशित होगा।
लेकिन इतिहास गवाह है कि सत्ता, पैसा और रसूख हमेशा स्थायी नहीं होते। जब व्यवस्था का धैर्य टूटता है, जब फाइलों की धूल हटती है और जब जनाक्रोश सवाल बनकर खड़ा होता है, तब बड़े-बड़े साम्राज्य भी धराशायी हो जाते हैं।
भू-माफियाओं की सबसे बड़ी भूल यही होती है कि वे खुद को कानून से बड़ा समझने लगते हैं। उनके आसपास चाटुकारों, दलालों और लाभार्थियों की भीड़ जमा हो जाती है। सब उन्हें अजेय बताते हैं। कोई कहता है “साहब का कुछ नहीं बिगड़ सकता”, कोई कहता है “उनकी पहुंच बहुत ऊपर तक है।” लेकिन यही भीड़ संकट आने पर सबसे पहले गायब होती है।
जब तक मलाई मिलती है, तब तक जय-जयकार होती है। जिस दिन जांच की आंधी चलती है, उसी दिन सबसे करीबी साथी भी मोबाइल बंद कर लेते हैं। जो कल तक कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे, वे अचानक पहचानने से इंकार कर देते हैं।
इसलिए आज उस रसूखदार भू-माफिया और उसके संरक्षकों के लिए यह चेतावनी समय की दीवार पर लिखी दिखाई देती है
“ना तू बचेगा, ना साथी तुम्हारे जो डूबेगी कश्ती तो डूबोगे सारे।”
क्योंकि अवैध कमाई की नींव पर खड़े महल बाहर से जितने मजबूत दिखते हैं, भीतर से उतने ही खोखले होते हैं। एक छोटी-सी दरार पूरी इमारत को गिराने के लिए काफी होती है।
जनता अब सवाल पूछ रही है। शिकायतकर्ता हार नहीं मान रहे। दस्तावेज सामने आ रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह कि समय सबका हिसाब रखता है।
हो सकता है आज फाइलें बंद हों, रिपोर्टें लंबित हों और जांचें अधूरी हों। लेकिन सच की एक खास आदत होती है वह देर से आता है, पर आता जरूर है।
तब न लोकायुक्त की फाइलों का बोझ छिपाया जा सकेगा, न ईओडब्ल्यू की जांचों का इतिहास, न उन लोगों की भूमिका जो वर्षों तक इस खेल के मूक दर्शक बने रहे।
क्योंकि जब जवाबदेही का दिन आता है तो सवाल केवल मुख्य आरोपी से नहीं पूछे जाते, बल्कि उनसे भी पूछे जाते हैं जिन्होंने सब कुछ देखकर भी आंखें मूंद ली थीं। और तब यही पंक्ति व्यवस्था के गलियारों में गूंजती सुनाई देती है
“ना तू बचेगा, ना साथी तुम्हारे; जो डूबेगी कश्ती तो डूबोगे सारे…”।
यह केवल एक सच नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के लिए आईना है जिसमें शिकायतें वर्षों तक भटकती रहती हैं और न्याय इंतजार करता रहता है। लेकिन जब न्याय जागता है, तब उसके कदमों की आहट बहुत दूर तक सुनाई देती है।
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