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    आज जीवन की 80वीं वर्षगांठ पर खड़े होकर मैं ईश्वर के चरणों में कृतज्ञता अर्पित करता हूँ।

    आज जीवन की 80वीं वर्षगांठ पर खड़े होकर मैं ईश्वर के चरणों में कृतज्ञता अर्पित करता हूँ।
    यह दिन उत्सव से अधिक आत्मचिंतन का है—
    जहाँ पीछे मुड़कर देखने पर केवल ईश्वर की कृपा, संतों का सान्निध्य और समाज का अपार स्नेह दिखाई देता है।
    जीवन की इस दीर्घ यात्रा में यह अनुभव गहरा हुआ है कि—
    “जिया वही सार्थक, जो दूसरों के काम आया।”
    80 वर्ष पूर्ण होना उपलब्धि नहीं, बल्कि
    सेवा, करुणा और संवेदना की कसौटी है।
    अब संकल्प है कि शेष जीवन
    अहंकार से मुक्त,
    अपेक्षा से रहित,
    और मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा मानकर अर्पित रहेगा।
    मैं न किसी सम्मान का आकांक्षी हूँ,
    न किसी अभिनंदन का अधिकारी—
    यदि कोई कामना है तो बस यही कि
    मेरे कर्म किसी असहाय के आँसू पोंछ सकें,
    और अंतिम सांस तक
    मानवता की लौ जलती रहे।
    ईश्वर मुझे सद्बुद्धि दे,
    सेवा की शक्ति दे,
    और अंत समय तक
    सही मार्ग पर चलने का विवेक प्रदान करे।

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