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    हर कोशिश जारी है कि कहीं भारतीय राजनीति को कोई अध्यात्मिक , बुद्धिजीवी और संजीदा नेतृत्व ना मिल जाये ??

    हर कोशिश जारी है कि कहीं भारतीय राजनीति को कोई अध्यात्मिक , बुद्धिजीवी और संजीदा नेतृत्व ना मिल जाये ??

    भारत में ज्ञान और शिक्षा ‘ मिस्टर इंडिया ‘ हो चुके और लोकतंत्र का ‘ राम नाम सत्य ‘ हो चुका है, शिक्षा और ज्ञान की जगह जुगाड़, बेईमानी, धोख़ा, षड्यंत्र, सेटिंग ने जगह ले ली है और लोकतंत्र की जगह अधिनायकवाद और दबंगई ने ले ली है I मीनाक्षी नटराजन का व्यक्तिव और उनका राज्यसभा का नामांकन रद्द होना इस बात की पुष्टि करता कि देश निरंकुशता की ओर बढ़ रहा है, देश मूर्खता, पाखंड, पैसे ताकत, सामर्थ्य, प्रभाव और उद्दंडता के आगे नतमस्तक हो चुका है ? चारों तरफ लालच और स्वार्थ के शरीर बैठे हुए हैं जिनकी ना आत्मा बची है ना ईमान, चाहे वो संसद हो या विधानसभा या चुनाव आयोग या कोई भी राजनीतिक पार्टी हो या लोकायुक्त हो या न्यायाधीश हों या किसी यूनिवर्सिटी का कुलपति हो ? हर सूट टाई, सफेद कुर्ते – पजामा, धोती – कुर्ता – टोपी, गेरुए कपड़ों के पीछे सिर्फ धोख़ा है, छल, कपट है और विश्वासघात है I

    52 साल की गाँधी वादी मीनाक्षी नटराजन राजनीति में सादगी और सरलता का पर्याय हैं उनका नामांकन रद्द होने का मतलब है कि राजनीति में गुंडों, अज्ञानी, मवाली, उचक्कों का वर्चस्व हो चुका है , मीनाक्षी नटराजन जैसी बुद्धिजीवी और शिक्षित नेत्री की भारतीय राजनीति में कोई जगह नहीं बची है, हिंदुस्तान की राजनीति मूर्खों , जाहिलों का शरण स्थल बन चुकी है और ऐसे में जहां औसत, साधारण किस्म के लोग शासन के महत्वपूर्ण पदों पर जबरदस्ती विराजमान हों , उनके लिये मीनाक्षी नटराजन जैसी साहित्यकार, इतिहासकार और वैचारिक चिंतक का सक्रिय राजनीति में आना तो असहज होगा ही ! वर्तमान राजनीतिज्ञों के कमतर बौद्धिक स्तर का ही परिणाम है मीनाक्षी नटराजन जैसी रचनात्मक व्यक्तित्व का षड्यंत्रपूर्वक नामांकन रद्द करवा दिया गया I

    राजनीति में सफलता और असफलता क्षणिक होती है। चुनाव आते हैं, परिणाम बदलते हैं और पद भी बदल जाते हैं। लेकिन विचार, लेखन और बौद्धिक योगदान कहीं अधिक स्थायी होते हैं। मीनाक्षी नटराजन की पहचान एक राजनीतिक कार्यकर्ता के साथ एक ऐसी चिंतक की भी है जो इतिहास को नए प्रश्नों के साथ पढ़ती है और साहित्य को नए अर्थों के साथ रचती है। इन सब बातों के अलावा जो खास बात उन्हें राजनीतिक जमात में बाकी तमाम लोगों से अलग दिखाती है, वह यह कि वे हाथ के काते हुए सूत का बुना हुआ कपड़ा ही पहनती हैं और सूत भी खुद कातती हैं।

    पुरानी कहावत है ” यथा राजा तथा प्रजा “, लोकतंत्र में भी जैसा मतदाता होता है वैसा ही उसका नेता होता है , जिस देश की जनता अशिक्षित हो, गंवार हो, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड में आकंठ डूबी हुई हो वो तो अपने जैसा ही या उनके विचारों से निकृष्ट आदमी को ही तो अपना नेता चुनेगी ? और चुन रही है, तभी तो 143 करोड़ का देश अमेरिका के सामने गिड़गिड़ा रहा है ? क्योंकि अमेरिका में पहले सरस्वती आईं और उसके बाद लक्ष्मी का पदार्पण हुआ ! अमेरिका की 40 यूनिवर्सिटी विश्व की टॉप 100 यूनिवर्सिटी में शामिल हैं ? और भारत की एक भी यूनिवर्सिटी टॉप 200 यूनिवर्सिटी में भी शामिल नहीं है ये इस बात का सबूत है कि हमने देश जाहिलों को देश सौंप रखा है और बढ़ते समय के साथ मूर्खो का ताकत दिये जा रहे हैं !

    अमेरिका की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ है और अमेरिका में सभी प्रकार के लगभग 125,000 पुस्तकालय मौजूद हैं और 143 करोड़ जनता के देश भारत में कितनी लाईब्रेरी हैं ? कुछ अंदाज है ? 25 करोड़ की जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ 500 पब्लिक लाईब्रेरी हैं और कुल मिलाकर 2800 पुस्तकालय हैं यू पी में ? कहाँ 35 करोड़ के देश में 125000 पुस्तकालय और कहाँ 25 करोड़ की जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ 500 पब्लिक लाईब्रेरी ? और ये ही अनपढ़ – मूर्ख मतदाता अपना महामूर्ख नेता चुनते हैं और परिणाम ये है कि आजादी के 75 साल बाद हम पाकिस्तान, बँगलादेश, अफ़्ग़ानिस्तान से संघर्ष करते दिख रहे हैं चाहे वो भ्रष्टाचार हो या शिक्षा या विदेश नीति हो या आर्थिक विकास हो या उत्पादन हो या निर्यात हो या रोजगार हो या प्रति व्यक्ति आय हो ! आज दुनिया के 100 सबसे गंदे प्रदूषित शहरों में भारत के 90 शहर हैं, ना नेताओं को शर्म है ना जनता को कोई हया, सब मँदिर – मस्जिद में विकास ढूँढ रहे हैं ?

    भारत के नेताओं को आत्म विश्लेषण की जरूरत है , गरीबी , भुखमरी, कुपोषण से देश ग्रसित है और देश के नीति निर्माता एक राज्यसभा सीट के लिये देश का पैसा और अपना अमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं ? सच तो ये है कि ना तो जनता को मीनाक्षी नटराजन चाहिए और ना ही जाहिल, अनपढ़ जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों को मीनाक्षी नटराजन जैसा बुद्धिजीवी नेतृत्व चाहिए, इसलिए हर कोशिश जारी है कि कहीं भारतीय राजनीति को कोई अध्यात्मिक , बुद्धिजीवी और संजीदा नेतृत्व ना मिल जाये ??

    नमस्कार

    राजेंद्र सोनी
    संपादक, लेखक, चिंतक
    मुक्ति की उड़ान
    निष्पक्ष सत्य के लिये उत्कृष्ट पत्रिका
    भोपाल
    ईमेल : muktikiudaan@gmail.com

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