
हर कोई आजकल भारतीय मीडिया की 157 वीं रैंकिंग की बात कर रहा है,आजकल लोग हर जगह पत्रकारों और मीडिया को कोस रहे हैं,, गालियां बक रहे हैं,, लेकिन ऐसे लोगों से मेरे कुछ सवाल है क्या ये लोग न्यूज चैनल के सब्सक्रिप्शन के लिए ठीक-ठाक मूल्य चुकाने के लिए तैयार हैं,, ये लोग जो अभी अखबार को 5 से ₹10 में खरीदने हैं इसके लिए प्रति अखबार ₹50 चुकाने के लिए तैयार हैं?
मीडिया पर बने दबाव के लिए क्या वे लोग जिम्मेदार नहीं है जो उस कार्यक्रम की टीआरपी बढ़ाते हैं जो उन्हें पसंद नहीं,, खुद ड्रेसिंग रूम में बैठकर वही चैनल देखते हैं मजे लेते हैं फिर सोशल मीडिया पर उसे ही क्रिटिसाइज करते हैं,,
क्या इसके लिए कमजोर विपक्ष जिम्मेदार नहीं है,, आज विपक्ष अपने जीते हुए उम्मीदवारों को संख्या बल होने के बावजूद राज्यसभा नहीं पहुंच पाता,, क्या इसके लिए वह अदालत जिम्मेदार नहीं है जो सीधे जरूरी फैसले तक नहीं दे पाती,, क्या इसके लिए सत्ताधारी दल जिम्मेदार नहीं है जो अपने खिलाफ आई किसी भी खबर को बर्दाश्त नहीं कर पाता,, आम जनता में से ऐसे कितने लोग हैं जो गलत बातों के खिलाफ सड़क पर आने को तैयार हैं,, पहले खुद के अंदर झांकिए,, फिर गालियां दीजिए, कम से कम महिला एंकर्स की पोस्ट पर आप लोग जो लिख रहे हैं,, वो बताता है कि आप खुद कितने कमजोर हैं.. जब किसी पत्रकार के द्वारा जनहित का मुद्दा उठाया जाता है,, और कोई अफसर या पुलिस या अदालत उसे ही शिकंजे में कस लेती है,, तो इस हेटर्स गैंग में से कौन उसके समर्थन के लिए खड़ा होता है,, और आखिर में आज भी सच यही है कि मीडिया का डर है इसीलिए अफसरशाही और नेतानगरी थोड़ी कंट्रोल में है वरना आप कल्पना भी नहीं कर पाएंगे हालातों की…


