
सावन मास का सोमवार भगवान शिव के साथ सभी शिव भक्तों को नमन 🙏
सावन में शिव पूजा—
ॐ विशुद्ध ज्ञान देहाय त्रिवेदी दिव्य चक्षुषे ।
श्रेय: प्राप्ति निमित्ताय नम: सोमार्द्ध धारिणे ।।
अर्थात्- मैं सिर पर अर्द्ध चन्द्र को धारण करने वाले भगवान शंकर को नमस्कार करती हूँ जिनका पूर्ण शरीर ही विशुद्ध ज्ञान है, तीनों वेद ही जिनके दिव्य नेत्र (आँखें) हैं और जो कल्याण प्राप्त करने के साधन हैं ।
यह श्लोक दुर्गा सप्तशती में आता है ।
भगवान शिव ( कल्याण) और शक्ति स्वरूप हैं । इसीलिए अर्द्ध नारीश्वर भी उनका एक रूप है ।
शिव कल्याणकर्ता हैं, उनकी आराधना कभी भी करें कल्याणकारी है । इनका एक नाम आशुतोष है, जिसका अर्थ है शीघ्र और थोड़े में जो प्रसन्न हो जाय । सोम धारण करने से उनकी पूजा का विशेष दिन सोमवार कहते हैं । सावन माह ही शिव पूजा के लिए विशेष रूप से चुना गया , इसके कई कारण हैं ।
प्रथम- भगवान शिव माँ पार्वती के साथ पृथ्वी पर रमण के लिए आते हैं ।(धार्मिक मत)
द्वितीय- सावन मास चारों तरफ़ हरियाली और ख़ुशियों से भरा रहता है । जीव- जंतु और पेड़ – पौधों की वृद्धि का समय है ।( अधिकतर लोग इसी कारण सावन मास में मांसाहार और शाक पत्तों को नहीं खाते)।
सावन सोमवार पूजा करने वाले निर्जल या फलाहार रहकर उपवास करते हैं । भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए, उनकी प्रिय वस्तुओं को ( गंगाजल, बेलपत्र, मंदार और धतूरे का पुष्प, कनेर और भांग आदि) उनपर अर्पण करते हैं ।
इस माह में प्रायः लोग रूद्राभिषेक करते हैं ।
स्थापित शिव या पार्थिव शिवलिंग निर्माणकर रूद्राभिषेक करते हैं । श्रृंगी या किसी पात्र से जल, दूध, मधु या गन्ने का रस की धारा लगातार शिवलिंग पर रूद्राष्टाध्यायी मंत्रों के साथ गिराते हैं । ब्राह्मणों द्वारा निरंतर पाठ होता है । इस रुद्राष्टाध्यायी में कुल १०० मंत्रों का पाठ होता है ।
प्रतिदिन की पूजा में ‘शिवप्रात:स्मरण स्त्रोत ‘ का पाठ करना चाहिए । महेश शिव से बड़ा कोई नहीं है ऐसा’शिवमहिम्न स्त्रोत’ में है-
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुति:।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्वं गुरो: परम्।।
अर्थात्— महेश से बड़ा कोई देव नहीं, महिम्नस्त्रोत से बड़ी कोई स्तुति नहीं,अघोर से बड़ा कोई मंत्र नहीं और गुरु से बड़ा कोई तत्व नहीं है ।( अघोर शिव है,इनकी पूजा रुद्र मंत्रों से ( जिनका वर्णन मैं पहले कर चुकी हूँ ) की जाती है ।
बहुत स्थानों पर विशेष नदियों का जलभरकर कांवड़ द्वारा शिव मंदिर ले जाकर जल -अर्पित करते हैं । इन्हें ‘कांवड़िये ‘ कहते हैं ।
सबसे प्रसिद्ध यात्रा सुल्तान गंज से वैद्यनाथधाम की है । लगभग १०० किमी की नंगे पाँव यह यात्रा होती है । दो पात्रों में यह जल होता है । एक वैद्यनाथधाम पर और दूसरा वहाँ से लगभग ४० किमी दूर ‘वासुकीनाथ’ पर चढ़ता है ।
शिव भगवान का विशेष वैदिक मंत्र—
ॐ तत् पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् ।
या
ॐ पंचवक्त्राय विद्महे , सहस्त्राक्षाय महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्र प्रचोदयात्।
जय महादेव 🙏🌷


