*अरे मोहन दायजी सा… चुनो लगावण वालां सूं बचो..!*
अरे मोहन दायजी सा, थानै कित्ती बार समझायो कि थारा ईर्द-गीर्द बैठेला लोग थारा शुभचिंतक कम, चुनो लगावण वाला जियादा है। जिको देखो ऊ थारी हाँ मं हाँ मिलावै। थूं खांसो तो कहै “वाह दायजी सा, कित्ती विद्वतापूर्ण खांसी!” थूं मुस्कराओ तो कहै “इतिहास मं ऐसी मुस्कान कोई मुख्यमंत्री की नी देखी!”
बस, यहीं सूं गड़बड़ चालू हो जावै।
दायजी सा, कागज पर लिखी पीएचडी सूं ज्ञान नी आवै। ज्ञान तो तब आवै, जब आदमी अपणी गलती मानै, साची बात सुनै अने चापलूसां सूं दूरी राखै। जिको हर बात मं “वाह-वाह” सुनै, ऊ एक दिन सच्चाई सुनण लायक भी नी रहै।
थारा दरबार मं बैठेला कई लोग रोज थानै आसमान दिखावै है, पण जमीन की खबर कोई नी देवै। जनता पानी, सड़क, अस्पताल, रोजगार अने किसान की बात करै, अने दरबार मं चर्चा चालै “दायजी सा, आज तो थारो भाषण विश्वस्तरीय हो गयो!”
अरे, भाषण सूं वोट नी मिलै, भरोसो सूं मिलै।
दायजी सा, मालवा मं एक कहावत है “जिको हर बात मं घी बतावै, समझ ल्यो ऊ रोटी अपणी सेंक रियो है।” आज थारा आसपास कई रोटी सेंकण वाला बैठा है। ऊ थारी चिंता नी करै, थारी कुर्सी की आंच पर अपणी रोटी पकावै है।
याद राखजो, राजा नै हरावण खातर दुश्मन की जरूरत नी पड़ै। दो-चार चापलूस ही काफी होवै। सांच बोलण वालो आदमी कड़वो जरूर लागै, पण वही आखरी मं काम आवै। अने जो आदमी सिर्फ तारीफ सुनै, ऊ धीरे-धीरे जनता की आवाज सुनणो भूल जावै।
दायजी सा, अभी भी बखत है। दरबार की ताली सूं बाहर निकळो अने जनता की थाली देखो। क्यूंकि ताली बजाय वाला चुनाव नी जितावै… जनता जितावै है, अने जनता ही हरावै है।
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