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    जंतर-मंतर आंदोलन पर हुए हमले के बाद से अपना दाना-पानी और बोलचाल बंद है?

    *जंतर-मंतर आंदोलन पर हुए हमले के बाद से अपना दाना-पानी और बोलचाल बंद है?*

     

    लेख राजेंद्र सिंह जादौन

     

    ईधर देश का युवा पेपर लीक मामले को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर अड़ा हुआ है और गोदी मीडिया पिट रही है। भाई साहब, इसका असर मैंने अपने ही घर में देख लिया है। मुझे ऐसे-ऐसे ताने झेलने पड़े हैं कि बोलचाल बंद है और खाना भी बाहर होटल में या ठेले पर खाना पड़ रहा है।

     

    मेरे बच्चों का कहना है कि आप पत्रकार हो और देश के बच्चों के साथ नहीं हो, इसलिए आपसे बात नहीं करनी। उधर श्रीमती जी को पता है कि मैं संघ और भाजपा का पुराना कार्यकर्ता हूँ, तो उन्होंने भी तवा हड़ताल जारी कर दी है। खाना देने की शर्त यह है कि भाजपा का राग न अलापूं और संघ की चर्चा बिल्कुल नहीं हो। इधर बच्चों ने भी अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो उधर या इधर। मतलब सरकार के मुखिया की तरह अपने आपको “रंडवा” घोषित कर दो, नहीं तो सब छोड़कर बच्चों का साथ दो।

     

    अब आप ही बताइए, एक पत्रकार आखिर जाए तो जाए कहाँ? बाहर सरकार सवालों से घिरी हुई है और घर के अंदर मैं। देश में प्रेस कॉन्फ्रेंस कम हो रही हैं, लेकिन मेरे घर में रोज शाम सात बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हो जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां पत्रकार सवाल पूछते हैं और यहां मुझसे सवाल पूछे जाते हैं। जवाब अगर सरकार जैसा घुमा-फिराकर दे दिया तो समझ लीजिए रात का भोजन स्वतः स्थगित।

     

    पहले घर पहुंचते ही पूछा जाता था, “चाय बनाऊँ?” अब पूछा जाता है, “आज किसके पक्ष में लिखकर आए हो?” मैंने एक दिन मजाक में कह दिया कि “मैं तो निष्पक्ष पत्रकार हूँ।” बस फिर क्या था। बच्चों ने हँसते हुए कहा, “आजकल निष्पक्ष वही होता है, जिसे दोनों पक्ष अपना नहीं मानते।” मैं उनकी बात सुनकर मुस्कुरा तो दिया, लेकिन भीतर ही भीतर सोचने लगा कि नई पीढ़ी सवाल बहुत कठिन पूछने लगी है।

     

    उधर श्रीमती जी ने भी घर में नई नीति लागू कर दी है। अब रसोई में प्रवेश करने से पहले वैचारिक जांच होती है। अगर दिनभर में दो बार सरकार की तारीफ कर दी तो सब्जी में नमक कम मिलेगा और अगर तीन बार कर दी तो दाल ही नसीब नहीं होगी। मैंने पूछा कि यह कौन-सा लोकतंत्र है? बोलीं, “इसे गृहतंत्र कहते हैं, यहां संविधान मैं हूँ।”

     

    अब मेरी हालत उस नेता जैसी हो गई है जिसकी पार्टी में ही उसके खिलाफ बगावत हो गई हो। बच्चे विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, श्रीमती जी चुनाव आयोग बनी बैठी हैं और मैं बिना बहुमत का मुख्यमंत्री बना घूम रहा हूँ। विश्वास मत की नौबत रोज आती है और हर शाम मैं अल्पमत में पाया जाता हूँ।

     

    जंतर-मंतर पर युवाओं की आवाज उठी तो उसका असर मेरे ड्राइंग रूम तक पहुँच गया। बच्चों का कहना है कि अगर लाखों छात्र सड़कों पर उतर सकते हैं तो पत्रकारों को भी खुलकर सवाल पूछने चाहिए। मैंने कहा कि सवाल तो पूछते हैं। बोले, “पूछते होंगे, लेकिन सुनाई नहीं देते।” अब मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि आजकल सवाल पूछने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि सवाल किससे पूछा गया है।

     

    गोदी मीडिया पर भी घर में खूब चर्चा होती है। पहले बच्चे कार्टून देखते थे, अब प्राइम टाइम देखकर हँसते हैं। कहते हैं कि एंकर कम और प्रवक्ता ज्यादा दिखाई देते हैं। मैंने कहा कि हर मीडिया संस्थान की अपनी संपादकीय नीति होती है। बोले, “ठीक है, लेकिन दर्शकों की भी अपनी समझ होती है।” अब मैं चुप रह जाता हूँ, क्योंकि बहस जीतने से ज्यादा जरूरी उस दिन की रोटी होती है।

     

    सबसे बड़ा संकट तो तब आया जब मोहल्ले के ठेले वाले ने भी पूछ लिया, “साहब, आज भी घर से निकाले गए क्या?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “नहीं भाई, लोकतंत्र बचाने निकला हूँ।” वह बोला, “लगता है लोकतंत्र रोज बचाना पड़ता है, तभी तो रोज यहीं खाना खाते हो।”

     

    अब होटल वाला मुझे नाम से नहीं, टेबल नंबर से पहचानने लगा है। कहता है, “साहब, आज वही दाल-फुल्का या फिर घर में माहौल थोड़ा सुधरा?” मैंने कहा, “माहौल सुधरने के लिए पहले राजनीति सुधरनी पड़ेगी।” वह हँस पड़ा और बोला, “तो फिर आप यहीं के स्थायी ग्राहक समझिए।”

     

    सच कहूँ तो इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे एक बात जरूर सिखा दी है कि राजनीति का सबसे बड़ा असर संसद से पहले परिवार पर पड़ता है। जब विचारधाराएँ घर की डाइनिंग टेबल तक पहुँच जाती हैं, तब रोटी भी वैचारिक हो जाती है। फिर दाल में सिर्फ तड़का नहीं लगता, उसमें बहस भी पकती है।

     

    आज देश का युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। पेपर लीक का दर्द सिर्फ परीक्षा देने वाला छात्र नहीं समझता, बल्कि उसका पूरा परिवार समझता है। वर्षों की मेहनत जब कुछ लोगों की बेईमानी की वजह से बेकार चली जाती है, तब गुस्सा स्वाभाविक है। इसी गुस्से की गूंज जंतर-मंतर तक पहुँची है और शायद उसी की प्रतिध्वनि मेरे घर की रसोई तक भी आ गई है।

     

    फिलहाल मेरी स्थिति यह है कि मैं पत्रकारिता भी बचाना चाहता हूँ, परिवार भी और भोजन भी। लेकिन तीनों को एक साथ बचाना आजकल किसी गठबंधन सरकार चलाने से कम कठिन नहीं है। इसलिए मैंने फिलहाल एक नई नीति बना ली है घर में राजनीति पर कम, मौसम पर ज्यादा बात करूंगा। हालांकि डर इस बात का है कि कहीं बारिश पर चर्चा करते-करते कोई यह न पूछ बैठे कि बादल भी सत्ता पक्ष के हैं या विपक्ष के।

     

    देश में आंदोलन चलता रहेगा, सरकार अपना पक्ष रखती रहेगी, विपक्ष अपना विरोध करता रहेगा और मीडिया अपनी-अपनी लाइन पर चलता रहेगा। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा राष्ट्रीय संकट अभी भी यही है कि आज रात का खाना घर में मिलेगा या फिर लोकतंत्र की रक्षा करते-करते एक बार फिर ठेले वाले की दाल ही मेरी किस्मत में लिखी है।

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