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    Homeप्रदेश*आखिर भोपाल की जनता को कब मिलेगा नया मास्टर प्लान?*

    *आखिर भोपाल की जनता को कब मिलेगा नया मास्टर प्लान?*

    *आखिर भोपाल की जनता को कब मिलेगा नया मास्टर प्लान?*

    *कमलनाथ ने दी थी राजधानी को बेहतर मास्टर प्लान की योजना*

    *कमलनाथ होते तो तीन साल पहले लागू हो चुका होता राजधानी का मास्टर प्लान*

    *मास्टर प्लान रुका, भोपाल के विकास की रफ्तार भी थमी*

    *विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन*
    भोपाल जैसे तेजी से विस्तार करते शहर के लिए मास्टर प्लान महज एक सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के विकास की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण रोडमैप है। सड़कें कहां बनेंगी, बाजार किस क्षेत्र में विकसित होंगे, आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियों का स्वरूप क्या होगा, यातायात का दबाव कैसे नियंत्रित किया जाएगा और शहर का विस्तार किस दिशा में होगा, इन सभी सवालों का जवाब एक प्रभावी मास्टर प्लान में छिपा होता है। लेकिन राजधानी भोपाल में यही मास्टर प्लान लंबे समय से इंतजार का विषय बना हुआ है। नया मास्टर प्लान कब लागू होगा, इसकी स्पष्टता अब भी जनता के सामने नहीं है। दूसरी ओर, 15 सितंबर की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, व्यापारियों और आम नागरिकों की चिंता बढ़ती जा रही है। वर्षों से चल रहे कारोबार पर सीलबंदी और तालेबंदी की आशंका ने राजधानी के व्यापारिक वर्ग के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सवाल सीधा है जब शहर वर्षों से बिना नये मास्टर प्लान के विस्तार करता रहा, तब प्रशासन ने समय रहते इसकी जरूरत क्यों नहीं समझी? और यदि शहर की मौजूदा वास्तविकता पुराने नियमों से अलग हो चुकी है, तो उसका समाधान केवल कार्रवाई और सीलबंदी ही क्यों माना जा रहा है?

    *कमलनाथ की सोच में था भविष्य का भोपाल*
    भोपाल के मास्टर प्लान पर चर्चा करते समय पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के कार्यकाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कमलनाथ लंबे समय से शहरी नियोजन, औद्योगिक विकास और अधोसंरचना को एक-दूसरे से जोड़कर देखने की सोच के लिए जाने जाते हैं। उनके समर्थकों का तर्क है कि यदि उनकी सरकार का प्रस्तावित दृष्टिकोण और शहरी नियोजन की दिशा आगे बढ़ती, तो भोपाल को आज की तरह अनिश्चितता के दौर से नहीं गुजरना पड़ता। कमलनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान छिंदवाड़ा के विकास मॉडल से जोड़ी जाती है। जिस तरह छिंदवाड़ा में सड़क, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरी सुविधाओं को एक व्यापक विकास दृष्टि से जोड़ने की कोशिश की गई, उसी सोच को भोपाल जैसे बड़े शहर में लागू करने की आवश्यकता थी। यही कारण है कि मास्टर प्लान को केवल जमीन के उपयोग का नक्शा मानने के बजाय उसे शहर की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों से जोड़कर देखने की जरूरत है।

    *कमलनाथ मॉडल की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?*
    कमलनाथ के समर्थक यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि उनके समय में भोपाल के लिए प्रस्तावित शहरी नियोजन को आगे बढ़ाया गया होता, तो क्या आज की स्थिति पैदा होती? इसका निश्चित उत्तर राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है, लेकिन इतना जरूर है कि किसी भी सरकार के लिए दीर्घकालिक शहरी योजना को समय पर लागू करना प्राथमिकता होनी चाहिए। भोपाल आज जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए पुराने नियमों के आधार पर नये शहर का निर्माण संभव नहीं है। राजधानी में आबादी बढ़ रही है, वाहन बढ़ रहे हैं, व्यापार बढ़ रहा है और नई कॉलोनियां विकसित हो रही हैं। ऐसे में मास्टर प्लान जितना देर से लागू होगा, जमीन पर उतनी ही ज्यादा जटिलताएं पैदा होंगी। यही वह जगह है जहां कमलनाथ की शहरी विकास की सोच को राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। एक ऐसी सोच, जिसमें विकास को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि समग्र शहरी नियोजन के रूप में देखा जाए।

    *देश ने देखा है छिंदवाड़ा का विकास*
    कमलनाथ ने जिस तरह छिंदवाड़ा के विकास को व्यापक दृष्टि से देखा, उसी तरह की सोच भोपाल को भी चाहिए। भोपाल को ऐसा अर्बन प्लानर चाहिए जो केवल नक्शे पर लाइनें खींचने के बजाय शहर की धड़कन समझे। अब जरूरत है कि सरकार अपनी ‘कुंडी’ खोले, जनता और व्यापारियों के बीच आए और स्पष्ट रोडमैप सामने रखे। क्योंकि मास्टर प्लान विकास की सीढ़ी होना चाहिए, जनता की आजीविका पर लटकती तलवार नहीं। और भोपाल अब यह सवाल पूछने के लिए मजबूर है आखिर नया मास्टर प्लान कब आएगा?

    *गलती जनता की या सिस्टम की?*
    यदि कोई व्यक्ति वर्षों से एक दुकान चला रहा है, टैक्स दे रहा है, बिजली का बिल भर रहा है और अपनी रोजीरोटी उसी कारोबार से चला रहा है, तो अचानक उसके सामने सीलबंदी का खतरा खड़ा हो जाए तो उसका सवाल स्वाभाविक है आखिर गलती किसकी है? व्यवस्था की यह जिम्मेदारी थी कि वह समय रहते यह तय करती कि कौनसा क्षेत्र आवासीय रहेगा, कहां व्यावसायिक गतिविधियां होंगी और कहां मिश्रित भूमि उपयोग की अनुमति होगी। यदि प्रशासन ने वर्षों तक स्थिति को स्वीकार किया और अब अचानक कठोर कार्रवाई शुरू कर दी, तो इसका सबसे बड़ा असर छोटे और मध्यम व्यापारियों पर पड़ेगा। कमलनाथ के पक्ष में खड़े राजनीतिक तर्क का एक महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि शहर नियोजन में केवल नियम लागू करना पर्याप्त नहीं होता। नियमों को शहर की वास्तविक जरूरतों के साथ जोड़ना पड़ता है। यही व्यावहारिक शहरी नियोजन की पहचान है।

    *भोपाल को चाहिए व्यावहारिक मास्टर प्लान*
    आज जरूरत ऐसे मास्टर प्लान की है जो भोपाल की मौजूदा वास्तविकता को स्वीकार करे। दिल्ली और देश के दूसरे बड़े शहरों की तरह भोपाल में भी मिश्रित भूमि उपयोग यानी मिक्स्ड लैंड यूज जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है। जहां कोई क्षेत्र वर्षों से व्यावसायिक केंद्र बन चुका है, वहां केवल दुकानों को हटाना समस्या का समाधान नहीं है। इसके बजाय वहां पार्किंग की व्यवस्था की जाए, यातायात का प्रबंधन सुधारा जाए, पैदल चलने वालों के लिए बेहतर स्थान बनाए जाएं, अग्निशमन और आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ते सुनिश्चित किए जाएं और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत किया जाए। शहर को व्यवस्थित करने का मतलब शहर की आर्थिक गतिविधियों को खत्म करना नहीं हो सकता।

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