*गटर छाप का ‘गटर ज्ञान’, चड्ढी का ‘गोली फरमान’ और लोकतंत्र की जवान औलाद!*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
लोकतंत्र बड़ा अजीब जीव है। चुनाव के मौसम में यह जवान हो जाता है, हाथ जोड़कर घर-घर घूमता है, युवाओं के कंधों पर हाथ रखता है और कहता है “देश तुम्हारे भरोसे है।” लेकिन जैसे ही चुनावी बुखार उतरता है, वही लोकतंत्र अचानक बुढ़ापे की छड़ी पकड़ लेता है और युवाओं को देखकर बड़बड़ाने लगता है “ये नई पीढ़ी बिगड़ गई है… ये जनरेशन गटर है… और अगर ज्यादा बोले तो गोली ही इलाज है!”
वाह! क्या शानदार लोकतांत्रिक विकास है। लगता है संविधान का नया संस्करण छप चुका है, बस जनता को अभी उसकी प्रति नहीं मिली है।
पहले नेताओं की जुबान पर “युवा शक्ति” हुआ करती थी। अब “युवा समस्या” सुनाई देने लगी है। पहले कहा जाता था कि “युवा देश का भविष्य हैं।” अब लगता है भविष्य का भी चरित्र प्रमाणपत्र बनने लगा है। जो सरकार की तारीफ करे, वह राष्ट्रनिर्माता। जो रोजगार मांगे, वह व्यवस्था विरोधी। जो परीक्षा में धांधली पर सवाल उठाए, वह राजनीतिक एजेंट। और जो सड़क पर उतर जाए, उसे पहले “गटर” घोषित कर दो, फिर जरूरत पड़े तो “गोली” की भाषा में लोकतंत्र समझा दो।
देश का युवा भी बेचारा क्या करे? बचपन से उसे यही पढ़ाया गया “मेहनत का फल मीठा होता है।” उसने मेहनत की। रातें जागकर पढ़ा। माता-पिता ने जमीन गिरवी रखकर कोचिंग कराई। किसी ने खेत बेचे, किसी ने मां के गहने गिरवी रखे। लाखों युवाओं ने प्रतियोगी परीक्षाएं दीं। फिर खबर आई पेपर लीक हो गया। परीक्षा रद्द। भर्ती स्थगित। परिणाम अदालत में। अगली परीक्षा की तारीख अनिश्चित।
अब बताइए, अगर इतना सब होने के बाद भी कोई युवा मुस्कुराते हुए सेल्फी ले, तभी उसे आदर्श नागरिक माना जाएगा क्या? अगर वह पूछ बैठे कि “साहब, हमारी गलती क्या है?” तो जवाब मिलेगा “बहुत बोलते हो… तुम लोग गटर जनरेशन हो!”
कमाल की बात यह है कि राजनीति की स्मृति भी मौसम के साथ बदलती है। चुनाव आते ही यही युवा अचानक “देश का भविष्य” बन जाता है। तब भाषणों में कहा जाता है “युवाओं के सपने हमारे सपने हैं।” लेकिन सरकार बनते ही सपने सरकारी फाइलों में चले जाते हैं और युवा सोशल मीडिया पर ट्रोल बनने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।
मुझे तो लगता है कि आने वाले समय में राजनीतिक विज्ञान की किताबों में लोकतंत्र की नई परिभाषा लिखी जाएगी “जनता वह प्राणी है जो पांच साल में एक बार बहुत सम्मानित होती है और बाकी समय उसे समझाया जाता है कि चुप रहना भी राष्ट्रसेवा है।”
आजकल कुछ लोगों की भाषा सुनकर ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र नहीं, फौजी परेड चल रही हो। असहमति दिखाई नहीं कि आदेश “लाइन में लगो।” सवाल पूछ लिया तो “राष्ट्रहित समझो।” फिर भी न माने तो “गोली…”।
शब्दों की हिंसा भी हिंसा ही होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें खून दिखाई नहीं देता, लेकिन लोकतंत्र का चेहरा जरूर घायल हो जाता है।
मजेदार बात यह है कि वही लोग, जो कभी अंग्रेजों के लाठीचार्ज और गोलीकांड का उदाहरण देकर स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियां सुनाते हैं, आज अपने ही युवाओं के विरोध को राष्ट्रविरोध बताने में देर नहीं लगाते। इतिहास पढ़ाते समय भगत सिंह अच्छे लगते हैं, लेकिन वर्तमान में सवाल पूछता हुआ छात्र नहीं।
अब तो ऐसा लगता है कि देश में दो तरह के युवा हैं। पहला वह, जो मंच पर ताली बजाए, झंडा लहराए, नारे लगाए वह राष्ट्रभक्त। दूसरा वह, जो नियुक्ति पत्र, पारदर्शी परीक्षा और रोजगार मांगे वह संदिग्ध। यानी योग्यता नहीं, उपयोगिता देखी जा रही है।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज विपक्ष नहीं होता, सवाल होता है। क्योंकि विपक्ष तो चुनाव हार सकता है, लेकिन सवाल कभी नहीं हारता। वह बार-बार लौटकर आता है। बेरोजगारी का सवाल, शिक्षा का सवाल, महंगाई का सवाल, भ्रष्टाचार का सवाल। इन सवालों को गोली से नहीं, नीति से जवाब देना पड़ता है। लेकिन जब नीति कमजोर पड़ जाए, तब भाषा मजबूत कर दी जाती है।
अब नई राजनीतिक डिक्शनरी भी तैयार हो चुकी है। उसमें “संवाद” शब्द का अर्थ बदल गया है। संवाद का मतलब सिर्फ हमारी सुनो। बहस का अर्थ हम सही हैं। आलोचना का अर्थ षड्यंत्र। और विरोध का अर्थ राष्ट्रद्रोह की तैयारी।
सवाल यह नहीं कि किसी ने “गटर” कहा या किसी ने “गोली” की बात की। सवाल यह है कि क्या हमारी राजनीतिक संस्कृति इतनी असहिष्णु हो चुकी है कि असहमति सुनते ही शब्दों का स्तर सड़क पर उतर आता है? क्या लोकतंत्र अब तर्क से नहीं, तंज से चलेगा?
युवाओं को अपमानित करना आसान है। क्योंकि वे सत्ता में नहीं हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर सत्ता से बड़ा युवा होता है। आज का छात्र ही कल का वैज्ञानिक, सैनिक, न्यायाधीश, पत्रकार, किसान, उद्योगपति और सांसद बनता है। जिस पीढ़ी को आज गाली दी जाएगी, उसी के हाथ में कल देश की कमान होगी।
कभी-कभी लगता है कि नेताओं के लिए युवाओं का सबसे आदर्श रूप वह है जो चुनावी रैली में सेल्फी ले, सोशल मीडिया पर जय-जयकार करे और पांच साल तक कोई सवाल न पूछे। लेकिन लोकतंत्र में नागरिक का काम ताली बजाना नहीं, जवाब मांगना भी है।
अगर युवाओं को गटर कहने से बेरोजगारी खत्म हो जाती, तो शायद देश में अब तक पूर्ण रोजगार हो चुका होता। अगर गोली की भाषा से परीक्षाएं पारदर्शी हो जातीं, तो किसी अदालत में भर्ती घोटालों की फाइलें न होतीं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि न अपमान से रोजगार मिलता है और न धमकी से भविष्य बनता है।
इस देश ने गांधी को भी देखा है और भगत सिंह को भी। दोनों की राह अलग थी, लेकिन दोनों ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार कभी नहीं छोड़ा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि सरकार कितनी मजबूत है, बल्कि यह है कि नागरिक बिना डर के सवाल पूछ सकता है।
आज जरूरत युवाओं को भाषण देने की नहीं, भरोसा देने की है। उन्हें “गटर” नहीं, अवसर चाहिए। उन्हें “गोली” नहीं, नौकरी चाहिए। उन्हें अपमान नहीं, सम्मान चाहिए। उन्हें ट्रोल नहीं, पारदर्शी व्यवस्था चाहिए।
लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में नहीं, सड़क पर होती है। वहां यह तय होता है कि सरकार विरोध सुनती है या विरोधियों को सुनाती है। वहां यह पता चलता है कि संविधान किताब में है या व्यवहार में।
और अंत में सत्ता के हर रंग, हर विचारधारा और हर भाषणवीर के लिए एक छोटी-सी सलाह याद रखिए, युवा वोट भी है, नोट भी है, श्रम भी है, विज्ञान भी है और भविष्य भी। उसे अपमानित करके कोई राष्ट्र महान नहीं बनता।
हो सकता है आज कुछ लोग शब्दों की बंदूक लेकर बहुत बहादुर महसूस कर रहे हों, लेकिन इतिहास हमेशा बंदूक वालों को नहीं, सवाल पूछने वालों को याद रखता है।
इसलिए लोकतंत्र को अगर सचमुच मजबूत बनाना है तो युवाओं को गटर मत कहिए, उन्हें सुनिए। उन्हें गोली मत दिखाइए, उन्हें अवसर दीजिए। क्योंकि जिस दिन देश का युवा उम्मीद छोड़ देगा, उस दिन लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ भी भीतर से खोखला हो जाएगा।
और तब इतिहास की किताबों में शायद यही लिखा जाएगा “जब नौजवान रोजगार मांग रहे थे, तब सत्ता के कुछ दरबारों में उन्हें ‘गटर’ कहा जा रहा था और कुछ मंचों से ‘गोली’ की भाषा बोली जा रही थी। लोकतंत्र बचा रहा, लेकिन उसकी गरिमा बार-बार घायल होती रही।”


