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    देर आये पर दुरुस्त नहीं आये।

    जंतर मंतर :

    देर आये पर दुरुस्त नहीं आये।

     

    आषाढ़ समाप्ति की ओर है । देश के बहुत क्षेत्रों में बाढ़ की तबाही देखने में आ रही है। उधर अमरनाथ की यात्रा चल रही है। मणिपुर अभी शान्त नहीं है।राजनीति का मौसम सावन की प्रतिक्षा में है। बहुत प्रयासों के बाद भी अधिकांश प्रांतों के चुनावों में विपक्ष सत्ता हासिल करने में सफल नहीं रहा है। इन दशकों में क्षाम ,दाम, दंड ,भेद से बहुमत के आंकड़े को बरकरार रखने की परंपरा बढ़ती जा रही है।आया राम ,गया राम से मतदाता अपने मत से चुने गये नेता के द्वारा ठगा महसूस कर रहा है। लेकिन धर्म , जाति, भाषा का लेमन चूस मुंह में आ गया तो ये छोटे बच्चों की तरह उसी में उलझी रहती है।

    युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। एक राज्य का मैं आंकड़ा पढ़ रहा था कि 10 चपरासी के पदों‌के लिए 1.2 लाख बेरोजगार युवकों ने आवेदन दिया था। हाली PLFS आँकड़ों के अनुसार अनुमानतः लगभग 3.2 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। यह आंकड़ा 5 करोड़ का भी हो सकता है।‌ एक जानकारी के अनुसार केन्द्र और विभिन्न राज्यों में लगभग 35-40 लाख पद रिक्त हैं। परीक्षाओं के आयोजन में निरन्तरता नहीं है। कहीं विज्ञापन निकल भी जायें तो पेपर लीक बड़ी समस्या है। पेपर लीक से बच गये तो तंत्र में रिजर्वेसन और अन्य अनियमितताओं का हवाला देकर कुछ लोग कोर्ट से स्टे ले आते हैं।‌ अगर निरनतर रिक्त पदों के विज्ञापन निकलते रहें और परीक्षाएं निर्विघ्न होती रही तो युवा इंगेज रहते हैंऔर नौकरी भी पाते रहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता भी रोजगार परक कम है। लोगों का भरोसा भी शिक्षण संस्थाओं से उठ रहा है। 3 दिन पहले भोपाल का ही एक समाचार था कि 10 या 12 इंजिनियरिंग कालेजों में जीरो एडमिशन हुए हैं। इस बीच जो आंकड़े मीडिया में तैर रहे हैं उसके अनुसार लगभग 150 पेपर केन्द्र और राज्यों की परीक्षाओं के लीक हुए हैं।‌

    एक विश्लेषण के अनुसार 2002-2025 के बीच कम से कम 45 बड़े पेपर लीक/परीक्षा घोटाले सामने आए। 2013–15 के बीच मध्य प्रदेश में व्यापम (भर्ती व प्रवेश) का घोटाला सामने आया था उसकी जांच CBI को सौंपी गयी थी। यह बहुत बड़ा धोटाला था। यह अकेला नहीं 2006 हरियाणा न्यायिक सेवा, 2009 में राजस्थान लोक सेवा परीक्षा, 2015 आल इंडिया पीएमटी , 2022 बीपीएससी प्रिलिमिनरी और 2018 सीबीएससी 10वी और 12वी के पेपर लीक हुए थे । श्रंखला बहुत लंबी है…..।

    सबसे ज्यादा आक्रोश 3 मई 2026 को आयोजित नीट यूजी परीक्षा पेपर के लीक होने से उत्पन्न‌ हुआ । लगभग 9 दिन बाद

    राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) को इस परीक्षा को आधिकारिक तौर रद्द करना पड़ा। यहां यह उल्लेखनीय है कि 2024 में भी नीट यूजी (NEET-UG) परीक्षा का पेपर लीक हुआ था। मई 2026 में नीट परीक्षा के निरस्तीकरण की घोषणा के बाद मानसिक तनाव के कारण लगभग 12-15 अभ्यार्थियों ने आत्म हत्या कर ली। इन आत्महत्याओं ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी को और कटधरे में खड़ा कर दिया। अनुसंधान में एनटीए से जुड़े प्रोफेसरों की संलिप्तता और गिरफ्तारी से छात्रों का आक्रोश और बढ़ गया।

    ऐसा नहीं कि सरकार ने कुछ कदम नहीं उठाये। 2024 के बाद केंद्र सरकार ने Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act लागू किया लेकिन पेपर लीक होना बंद नहीं हुआ।

    इसी बीच बेरोज़गारी, परीक्षा प्रणाली पर अविश्वास ,युवाओं की निराशा और राजनीतिक जवाबदेही की आवश्यकता को देखते हुए सोसल मीडिया से सीजेपी की शुरुआत एक व्यंग्यात्मक और आंदोलन-आधारित मंच के रूप में हुई । जबावदेही सुनिश्चित करने जंतर-मंतर पर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके के नेतृत्व में 6 जून को धरना प्रदर्शन शुरू हुआ था।पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने भी 28 जून से इस मंच पर अनशन किया था, जो सरकार से वार्ता के बाद में समाप्त हो गया। यह तो मानना पड़ेगा कि अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे युवाओं ने नए डिजिटल और मैदानी नेतृत्व का मॉडल पेश किया। 39 दिवस तक चले इस आंदोलन को सरकार ने शायद पहले सहजता में लिया हो लेकिन शैने -शैने भीड़ बढ़ती गयी ।भोजन पानी की सप्लाई के पांडाल लगने लगे।देश विदेश से 24×7 उनके भोजन -पानी की व्यवस्था होने लगी।छात्रों की जगह युवाओं की भागीदारी बढ़ने लगी। प्रदर्शन में आपराधिक गतिविधियां भी परिलक्षित होने लगी। विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस ने भी इस यज्ञ में अपनी आहुतियां डालनी प्रारंभ कर दी। यह सही भी है नेता प्रतिपक्ष सामने रखे पकवान कैसे छोड़ते।सीजेपी के प्रदर्शन को पर्दे के पीछे के हजारों आयोजक / मार्गदर्शक धार देते रहे।

    जंतर मंतर में प्रदर्शन और अनशन के दौरान कई बार पुलिस को उग्र प्रदर्शन कारियों को खदेड़ते हुए देखा गया साथ ही पुलिस पर पथराव हुआ, वाहनों में तोड़फोड़ हुई ।लगभग डेढ़ सौ पुलिसकर्मी और उनके अधिकारी घायल भी हुए। प्रदेश के कई राज्यों में भी कानून व्यवस्था के विकट स्थिति देखने को मिली।अन्ततः आंदोलन के 38 दिन बाद शिक्षा मंत्री धर्मेन्र्द प्रधान के इस्तीफे और अन्य 4 मांगें पूरी होने के बाद 25 जुलाई 2026 को CJP ने आंदोलन समाप्त करने की आधिकारिक घोषणा कर दी।

    अब प्रश्न ये है कि क्या कानून व्यवस्था की दृष्टि से यह सब सही हुआ?

    सरकार और सीजेपी में समझौते के अनुसार सारे आंदोलनकारियों के खिलाफ पंजीवद्ध प्रकरणों को वापस लिया जाएगा। सीजेपी और विपक्ष के इस प्रदर्शन ने दिल्ली में 75 सालों से धरने, प्रदर्शनों हेतु निर्धारित सारे प्रोटोकाल तोड़ दिये। प्रदर्शन कारी पुलिस की सुरक्षा को अंगुठा दिखा कर संसद भवन तक पहुंच गये। सुरक्षा कर्मियों को प्रवेशद्वार बंद करने पड़े। प्रधानमंत्री आवास पर प्रदर्शन के लिए नेता प्रतिपक्ष अपने दल-बल के साथ आ धमके। अब प्रश्न उठता है अगर आज सीजेपी के प्रदर्शनकारियों के सारे तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट, गोदी मीडिया के नाम पर पत्रकारों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार, प्रदर्शन में अश्लील प्रदर्शन, अश्लील नारों के प्रकरण वापस ले ले जाते हैं तो आगे देश के आंदोलनों को पुलिस कैसे हैंडिल करेगी और रोकेगी कैसे । यूं तो दिल्ली पुलिस ने इस दशक में शाहीनबाग देखा है और किसान आंदोलन‌ के नाम पर लाल किले की प्राचीर पर चढ़े तथाकथित किसान आंदोलनकारियों के हमले को भी झेला है।

    भारत में अकेले सीजेपी के लोग आंदोलनकारी नहीं है विभिन्न राज्यों में विभिन्न मुद्दों को लेकर छात्र, किसान,अलगागाववादी, अतिवादी और मजदूर आंदोलनरत रहते हैं। लोकशाही है तो धरना, प्रदर्शन और आन्दोलन तो होंगे ही। पिछले आंदोलनों का इतिहास बताता है कि उनके बीच भी पर कुछ अवांछित तत्व हिंसा ,तोड़फोड़, शासकीय संपत्ति का नुकसान, आगजनी यहां तक की हत्या, हत्या के प्रयास जैसे अपराधों में शामिल होने से बाज नहीं आते। सरकार का कहना है यह विद्यार्थियों का हित का मामला है इसलिए सारे प्रकरण वापस किए जाएंगे। लेकिन इस निर्णय पर मुझे भविष्य की समस्या परिलक्षित हो रही है।

    भारत में छात्र , किसान, मजदूर और सीमा क्षेत्र में अलग तरह के अलगाव वादी प्रदर्शन चलते रहते हैं । इनके पीछे मजबूत हित समूह , दबाव समूह,राजनीतिक विपक्ष और आर्थिक शक्तियां काम करती हैं।‌जम्मू-कश्मीर , उत्तर पूर्व , लेह लद्दाख की आंतरिक सुरक्षा भी पुलिस ही देखती है।

    कहीं ऐसा न हो कि क्रिमिनल केसेज की वापसी नज़ीर बन जाये। केंद्रीय शिक्षा मंत्री सॉरी धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा कदापि अनुचित नहीं है लेकिन ऐसे अराजक और आपराधिक तत्व जिन्होंने शासकीय संपत्ति का नुकसान किया पुलिस पर हमला किया उनके विरुद्ध पंजीबद्ध प्रकरणों की वापसी अथवा प्रकरणों की समाप्ति से पुलिस का मनोबल टूटेगा। भविष्य में भारत के भीतर कानून व्यवस्था की को बनाए रखने वाली संस्थायें कैसे इसका सामना करेंगे ? भारत में हर राज्य का अपना स्वरूप है । हर राज्य की अपनी समस्याएं हैं। हर राज्य में अलग-अलग समस्याओं को लेकर विभिन्न तरह के लोग हमेशा आंदोलनरत रहते हैं उसमें कुछ शांतिपूर्ण आंदोलन करते हैं और कुछ उग्र। आगजनी, तोड़फोड़ ,हत्या जैसे अपराध भी होते हैं। सीजेपी आंदोलनकारयों ने एक सिलेक्टिव एजेंडा चलाया इसी बीच में केरल ,कर्नाटक ,पंजाब, उत्तराखंड में भी पेपर लीक हुए लेकिन इस पर सीजेपी जंतर मंतर पर मौन रही ।

    लगता है सरकार ने बहुत देर में आंदोलनकारियों से बात की ।समझौता हुआ।तात्कालिक समाधान भी निकाला और आंदोलन भी समाप्त किया लेकिन कानून व्यवस्था की दृष्टि से सरकार का यह निर्णय दुरुस्त नहीं कहा जा सकता है। यहां प्रश्न सीजेपी, बीजेपी,कांग्रेस , आप, सपा,बसपा, का नहीं है यह निर्धारित कानून व्यवस्था का प्रश्न है। लोकतंत्र में छात्र, कर्मचारी, किसान, मजदूर सब राजनीतिक दलों से जुड़े होते हैं। हित समूह और दबाव समूह भी राजनीति का हिस्सा होते हैं।छात्र संगठन भी राजनीतिक दलों से जुड़े रहते हैं भारतीय लोकतंत्र में अपराधी भी राजनीति से जुड़े रहते हैं। यहां अपराधी और बाहुबली भी संसद और विधान सभाओं की सीढ़ायां सम्मान से चढ़ते हैं। 2024 में उपलब्ध चुनावी शपथपत्रों के विश्लेषण के अनुसार

    कुल 543 सांसदों में से 251 (लगभग 46%) ने अपने शपथपत्र में आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें 170 (लगभग 31%) पर हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसे में कानून व्यवस्था का क्या होगा।

    सरकार देर से जागी सीजेपी से समझौता किया लेकिन सारे प्रकरण वापसी का निर्णय कल की चिंता बढ़ाने वाला है। सरकारें आती हैं जाती हैं संस्थाएं अपना काम करती हैं। देश सिस्टम से चलता है

    ।कानून व्यवस्था देश की रीढ़ है। देश‌ का विकास भी कानून व्यवस्था से जूड़ा है। कानून व्यवस्था संस्था में दीर्ध अनुभव के आधार पर मैं इस निर्णय को दुरुस्त नहीं मानता हूं। कभी ला इन्फोर्समेंट संस्था भी सुरक्षा की गुहार लगायेगी तो फिर क्या होगा।सुप्रीम कोर्ट कहता है निहत्थे लोगों पर लाठी चार्ज न किया जाये यह सही है। लेकिन भीड़ निर्धारित रेखा पार कर जाती है तो क्या करना होगा। यह भी कोर्ट बता दें। कैसे रोकेंगे भीड़ को ? क्या अनुनय विनय से लोग मान जायेंगे ? भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस एक्ट 1861 , बीएनएस-2023 और राज्यों के पुलिस रेगुलेशन हैं। सिपाही से लेकर डीजीपी तक एक वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। यदाकदा कर्मचारी निर्धारित प्रोटोकाल का उंलंधन करते हैं तो दण्ड और जवाबदेही का भी प्राविधान है। इसी कानून और प्रोटोकाल से पुलिस भीड़ नियंत्रित करती है। अगर संसद यह कानून बना दे कि संसद पर प्रदर्शनकारियों का प्रवेश‌ वैध रहेगा तो पुलिस उनको सम्मान से जाने ही देगी !! यह संस्था का दुर्भाग्य है लोकशाही में जो राजनीतिक दल सत्ता में रहता है पुलिस एक्ट को सपोर्ट करता है और जो सत्ता के बाहर है वह अपेक्षित बल प्रयोग को निर्मम घोषित करता है।कुल मिला कर दशकों से पुलिस को सत्ता के खेल का टूल किट बनाया जा रहा है। शेष इस तरह के निर्णय के दीर्घकालीन परिणाम क्या होंगे ? इसका प्रभाव कानून व्यवस्था को लागू करने वाली एजेंसियों पर भविष्य में किस तरह पड़ेगा यह समय तय करेगा।

    डां. गिरिजा किशोर पाठक

    भापुसे (सेनि) ,

    28 जुलाई 26

    भोपाल –

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