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    गटरछाप का ज्ञान और संस्कारों की ठेकेदारी!

     

    गटरछाप का ज्ञान और संस्कारों की ठेकेदारी!

     

    व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

     

    हमारा देश बड़ा अद्भुत है। यहां हर चुनाव के बाद नेताओं की संख्या नहीं बढ़ती, बल्कि संस्कारों के स्वयंभू ठेकेदारों की फसल लहलहाने लगती है। जिसे देखो वही समाज सुधारक बना घूम रहा है। कोई युवाओं को पहनावे का पाठ पढ़ा रहा है, कोई महिलाओं को आदर्श बहू बनने का कोर्स करा रहा है और कोई लोकतंत्र में विरोध करने वालों के चरित्र का प्रमाणपत्र बांट रहा है।

     

    सबसे मजेदार बात यह है कि जिन लोगों का पूरा जीवन कैमरों की रोशनी, फिल्मों, विज्ञापनों, मंचों और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बीता हो, वही आज दूसरों को संस्कारों का आईना दिखा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे इतिहास की किताब का पहला पन्ना फाड़कर सीधे आखिरी अध्याय पढ़ लिया गया हो।

     

    लोकतंत्र में विरोध करना कोई अपराध नहीं है। जंतर-मंतर हो, विश्वविद्यालय हो या गांव का चौपाल, असहमति लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन हमारे यहां विरोध करने वालों की मांगों पर चर्चा कम और उनके कपड़े, हेयर स्टाइल, भाषा और व्यक्तित्व पर बहस ज्यादा होती है। मुद्दे गायब हो जाते हैं और चरित्र प्रमाणपत्रों की दुकान खुल जाती है।

     

    आजकल एक नया फैशन चल पड़ा है। किसी को “देशभक्त” घोषित करना हो तो तालियां बजा दीजिए और किसी को “गटरछाप” कहना हो तो माइक उठा लीजिए। न कोई अदालत, न कोई सबूत, न कोई तर्क। बस बयान दीजिए और अगले दिन टीवी की बहस में पहुंच जाइए।

     

    विडंबना यह है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग शायद यह भूल जाते हैं कि डिजिटल दुनिया कुछ नहीं भूलती। इंटरनेट के पास सबका इतिहास सुरक्षित रहता है। पुराने इंटरव्यू, पुराने बयान, पुरानी तस्वीरें और पुराने विचार सब वहीं पड़े रहते हैं। इसलिए जब कोई दूसरों को संस्कारों का ज्ञान देता है तो सोशल मीडिया तुरंत उसका पुराना एल्बम खोल देता है। फिर जनता तय करती है कि असली बदलाव विचारों में आया है या सिर्फ राजनीतिक सुविधा में।

     

    हमारे यहां महिलाओं को लेकर सबसे ज्यादा चिंता उन्हीं लोगों को रहती है जिनकी चिंता महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और समान अवसरों के समय दिखाई नहीं देती। लेकिन जैसे ही कोई लड़की अपनी बात खुलकर कह दे, आंदोलन में शामिल हो जाए या सरकार से सवाल पूछ ले, अचानक समाज की संस्कृति खतरे में पड़ जाती है।

     

    यह भी कम दिलचस्प नहीं कि वही समाज, जो फिल्मों में आधुनिक किरदारों पर तालियां बजाता है, वास्तविक जीवन में आधुनिक सोच रखने वाली लड़कियों से असहज हो जाता है। पर्दे पर आधुनिकता मनोरंजन है और सड़क पर वही आधुनिकता संस्कारों पर हमला बन जाती है। यह दोहरा मापदंड भी कमाल का है।

     

    लोकतंत्र में किसी से असहमति रखना पूरी तरह स्वाभाविक है। किसी आंदोलन का समर्थन या विरोध भी किया जा सकता है। लेकिन पूरे युवा वर्ग या किसी समूह की महिलाओं को अपमानजनक विशेषणों से नवाज देना न तो लोकतांत्रिक परंपरा है और न ही स्वस्थ संवाद का तरीका। विचारों का जवाब विचारों से दिया जाता है, विशेषणों से नहीं।

     

    राजनीति का एक पुराना नियम है आज जो बयान आप दूसरों के लिए देंगे, कल वही आपके सामने खड़ा मिलेगा। इसलिए शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। आखिर जनता की याददाश्त भले कमजोर कही जाती हो, लेकिन सोशल मीडिया की याददाश्त गजब की होती है। वहां न कुछ मिटता है और न ही कुछ छिपता है।

     

    आज की Gen Z पहले वाली पीढ़ी नहीं है। यह सवाल भी पूछती है, जवाब भी मांगती है और अपनी बात रखने से डरती भी नहीं। उसे उपदेश कम और सम्मान ज्यादा चाहिए। उसे यह बताने की जरूरत नहीं कि अच्छी बेटी, बहू या पत्नी कौन होती है। वह अपने जीवन के फैसले खुद लेने की क्षमता रखती है। संविधान ने भी उसे बराबरी का अधिकार दिया है।

     

    असल चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि कोई लड़की कैसी दिखती है, क्या पहनती है या किस मंच पर विरोध करती है। असली चिंता यह होनी चाहिए कि क्या उसके सवालों का जवाब दिया गया? क्या उसकी बात सुनी गई? क्या लोकतंत्र में उसके अधिकारों का सम्मान हुआ?

     

    हमारे नेताओं और सार्वजनिक जीवन के लोगों को शायद यह भी याद रखना चाहिए कि सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है। और सम्मान देने की शुरुआत भाषा से होती है। जब भाषा गरिमामय होगी तो बहस भी गरिमामय होगी। अन्यथा हर बयान के बाद सोशल मीडिया अदालत लगेगी, पुराने वीडियो चलेंगे, पुरानी तस्वीरें निकलेंगी और फिर वही कहावत दोहराई जाएगी दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने दामन में भी झांक लेना चाहिए।

     

    लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां जनता अंतिम निर्णायक होती है। नेता आते-जाते रहते हैं, बयान बदलते रहते हैं, लेकिन जनता हर शब्द का हिसाब अपने तरीके से रखती है। इसलिए बेहतर यही है कि राजनीति में मुद्दों पर बहस हो, व्यक्तियों पर नहीं; विचारों का मुकाबला तर्कों से हो, विशेषणों से नहीं; और संस्कारों की परिभाषा दूसरों पर थोपने के बजाय अपने आचरण से प्रस्तुत की जाए।

     

    वरना जिस लोकतंत्र में हर कोई दूसरों को “गटरछाप” बताने निकल पड़े, वहां एक दिन जनता यह पूछने लगेगी कि आखिर असली गटर किसके विचारों में है।

     

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