
सत्ताधीशों-दुखियारी गृहिणियां कब बनेंगीं लाडली..?
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मोहनजी उनके लिए कब देंगे अंतरण का विज्ञापन.?
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सुप्रीमकोर्ट ने कहा है की गृहिणियाँ सिर्फ होममेकर नही राष्ट्र निर्माता हैं,जिनके काम की कीमत ३० हजार रुपये महीना से कम नहीं होना चाहिए.हमारे ज्यादातर सत्ताधीश गृहिणी शब्द को दरकिनार कर सिर्फ बहनों को लाडली बता बतौर चुनावी मोहरा इस्तेमाल कर डेढ़ से ढाई तीन हजार दे उनमे आत्मविश्वास/आत्मनिर्भरता/स्वाभिमान आदि आदि लाने का दावा कर रहे हैं.उधर भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्यप्रदेश किसानों/विद्यार्थियों के साथ गृहिणियों की ख़ुदकुशी के मामले ने टॉप-३ राज्यों में शामिल है.
मध्यप्रदेश में गृहिणियों की अपने बच्चों के साथ ख़ुदकुशी की खौफनाक वारदातें हो रही हैं.गाँव मे इन्हें पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए कुओं में उतरना पड़ता है.हमारे लोकतंत्र मे एक दशक से बहनों आदि को बिना हाथ पैर हिलाए हर महीने बँधी बंधाई रकम देने का चलन शुरू हुआ है.सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव से पहले यह गिफ्ट देती है तो सत्ता की आकांक्षी पार्टी मेनीफेस्टो मे वायदा करती है.
इस गिफ्ट की शुरुआत करने वालों में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज भी रहे हैं.उन्होने झांसेबाजी के तहत खुद के लिए भले मामा की उपाधि चुनी थी पर पता नहीं क्यों इस गिफ्ट के लिए भांजियों के बजाए बहनों को चुना.? उनके वारिस मोहन यादव जिन्होंने खुद के लिए भैया की उपाधि चुनी है बहनों के खाते में जनधन से रकम डालने के साथ हर महीने नियम से इसका प्रचार बड़े विज्ञापन के मार्फ़त करते हैं.इनमे नजर आ रहीं लाडलियां कहीं से भी जरूरतमंद नजर नहीं आती हैं.


