
ये तो हालात ऐसे हैं अन्यथा गूंगा कोई भी नहीं है…?
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#सुरेशशर्मापत्रकारभोपाल
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इन दिनों कई प्रमुख नेताओं और पत्रकारों से बात हुई। कुछ के फोन आए, कुछ को मैंने किया। सबने माखनलाल विश्वविद्यालय में चल रहे गोरखधंधे पर खुलकर बात करने के लिए बधाई दी। अधिकांश राष्ट्रवादी और ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के संगी-साथी हैं। कुछ वे जो प्रखरता से विरोध करते हैं, उनके संदेश भी आए। एक बात जो सभी की ओर से कही गई कि जिस संस्थान को देश के ख्यातिलब्ध पत्रकारों ने दिशा दी थी, वह आज निकम्मे हाथों में है? देश की और प्रदेश की भी राष्ट्रवादी सरकार ने माखनलाल के कुलगुरु का चयन मेधा पाटकर और अरुंधती राय के सहयोगी का कैसे कर लिया? उन्होंने यह भी बताया कि हरसूद पर लिखी विजय मनोहर की किताब और हरसूद को बगदाद बताती हुई अरुंधति राय की प्रस्तावना की कैसे अनदेखी चयनकर्ताओं ने कर दी। जब ऐसी मानसिकता है, ,तब कोई कितना भी राष्ट्रवादी होने का स्वांग रचा ले रचनाधर्मिता में तो उसका प्रदर्शन हो ही जाएगा? लेकिन यहां चूक तो उस महान संगठन से भी हो गई, जिसे व्यक्ति निर्माण और कार्यकर्ता परखने की सर्वोत्तम पाठशाला माना जाता है।क्या यहां पर भी घुसपैठ हो गई? योग्य कार्यकर्ता के बजाए सिफारिशी नियुक्तियां करने का दबाव बनाया जाने लग गया। यदि ऐसा होगा तो लाखों आस्थाओं और आशाओं पर तुषारापात हो जायेगा? बुनियाद हिल जाएगी?
जब दर्जनों किताबों का लेखक किसी सवाल के जवाब में व्यंग्य करते हुए भारत की सांस्कृतिक मान्यता फूफा पर प्रचलन के नैरेटिव का समर्थन करते हुए पुष्ट करे तब अयोग्यता के किसी अन्य प्रमाण-पत्र की क्या जरूरत है? वैसे भी फूफा की विवादित उपमा आयोजन में शामिल होकर रूठने पर दी जाती है? बाहर बैठे को फूफा नहीं कहा जा सकता। तब माखनलाल का कुलगुरु मानसिक रूप से अविकसित और पप्पू कैसे हो सकता है? दुखद पक्ष यह है कि न तो माखनलाल संस्थान जैसे गंभीर और पत्रकारों के भविष्य निर्माता संगठन ने मेरी उठाई बातों का जवाब दिया और ना ही सरकार की ओर से कोई एक्शन होता दिखा? एक बात यहां साफ है कि गूंगा कोई नहीं है, केवल हालात ऐसे हैं कि कोई बोलना नहीं चाहता है। इन्हीं हालात की वजह से राष्ट्रवादी विचारों और ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता को खतरा होता जा रहा है। तभी अरुंधती रॉय और मेधा पाटकर का साथी इस गंभीर पद को कब्जा कर गया।
सवाल एक बार फिर दोहरा रहा हूं। हम माखनलाल पत्रकारिता संस्थान की स्थापना का सपना देखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के संकल्प/इच्छा का उपहास नहीं होने देंगे? हम संस्थान के उन सभी साथियों का आभार मानते हैं, जिनके अथक प्रयास से संस्थान यहां तक पहुंचा है। स्व. श्री राधेश्याम शर्मा (NUJI के हमारे एक आयोजन में हरियाणा के सीएम रहे मनोहर लाल खट्टर ने उन्हें आरएसएस कहा था), श्री अच्युतानंद मिश्र और श्री बृजकिशोर कुठियाला ने जो दिशा और ऊंचाई संस्थान को दी थी, उसे कोई पप्पू मिट्टी में मिला दे, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए यह साफ करना होगा कि तीन दिनी इस प्रणाम उदंत मार्तंड के आयोजन पर कितना खर्च हुआ और आर्थिक सहभागिता किस-किस की रही? किन-किन को बुलाया गया और उनको बुलाने का आधार क्या था? उनके यहां आने पर संस्थान, छात्रों को क्या दिशा मिली? भोपाल के प्रमुख पत्रकारों, समाचार संस्थानों के संपादकों, पूर्व छात्रों को आमंत्रित क्यों नहीं किया गया? सारे मामले पर स्वार्थपूर्ति की छाया बनाये रखने के लिए भोपाल को अंधेरे में क्यों रखा गया? मेरी पहले की दो पोस्टों में महज दो-तीन छात्र ही बचाव करने आये, लेकिन उन्होंने इस आयोजन के संबंध में कुछ न कह कर संस्थान के छात्रों को मिले मामूली प्लेसमेंट की चर्चा करके संस्थान की गिरी प्रतिष्ठा की पोल खोल दी।
फिर कह रहा हूं, ये हालात ही ऐसे हैं, अन्यथा गूंगा कोई भी नहीं है? न सत्ता संगठन में काम करने वाले? न ही माखनलाल संस्थान में काम करने वाले? न ही पत्रकारिता जगत के राष्ट्रवादी विचार वाले साथी। माखनलाल संस्थान पत्र द्वारा जवाब दे सकता है। बुलाकर जानकारी दे सकता है। कुलगुरु पत्र लिख सकते हैं। उनके पास कोई और व्यंग्य है तो और सनातन मान्यताओं को फूफा की भांति कलंकित कर सकते हैं? अगले कदम से पहले अब कुछ इंतजार करते हैं!
धन्यवाद।
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