मध्यप्रदेश में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 लागू क्यों नहीं है—यह प्रश्न केवल एक कानून के लागू न होने का नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सत्ता–व्यवसाय के रिश्तों को उजागर करता है। यह अधिनियम भारत की संसद द्वारा वर्ष 2010 में पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य देश भर के अस्पतालों, क्लिनिकों, नर्सिंग होम और डायग्नोस्टिक सेंटरों को एक समान न्यूनतम मानकों के दायरे में लाना था, ताकि मरीजों को सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें। परंतु यह कानून स्वतः पूरे देश में लागू नहीं हुआ; संविधान के अनुच्छेद 252 के अंतर्गत राज्यों की सहमति से इसे अपनाया जाना था। यही वह संवैधानिक मार्ग है, जिस पर मध्यप्रदेश सरकार आज तक या तो कदम नहीं बढ़ा सकी, या बढ़ाना नहीं चाहा।
तथ्य यह है कि मध्यप्रदेश ने अब तक इस अधिनियम को न तो औपचारिक रूप से विधानसभा में स्वीकार किया है और न ही इसके स्थान पर कोई प्रभावी वैकल्पिक कानून लागू किया है। सरकार समय-समय पर यह तर्क देती रही है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है और प्रदेश अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अलग नियम बनाएगा। लेकिन प्रश्न यह है कि पंद्रह वर्ष बीत जाने के बाद भी वे “अलग नियम” आखिर कहाँ हैं? न तो कोई व्यापक और सख्त नियामक ढाँचा सामने आया, न ही निजी अस्पतालों पर पारदर्शी नियंत्रण की कोई मजबूत व्यवस्था बनी। परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश में निजी स्वास्थ्य सेवाएँ आज भी पुराने, बिखरे और प्रायः कमजोर नियमों के सहारे संचालित हो रही हैं।
जहाँ भी क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट लागू हुआ है, वहाँ निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा है। प्रत्येक अस्पताल और क्लिनिक का पंजीकरण अनिवार्य होता है, न्यूनतम आधारभूत संरचना और स्टाफ के मानक तय होते हैं, रिकॉर्ड संधारण और डेटा साझा करने की बाध्यता आती है तथा सबसे महत्वपूर्ण—निरीक्षण और दंड की एक स्पष्ट, संस्थागत व्यवस्था बनती है। यही वह बिंदु है, जहाँ मध्यप्रदेश में राजनीतिक असहजता दिखाई देती है।
प्रदेश में यह चर्चा लंबे समय से प्रचलित है कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में राजनीति की गहरी पैठ है। यह कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में कही जाने वाली बात है कि बड़े शहरों में संचालित कई निजी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और डायग्नोस्टिक चेन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों या उनके निकट संबंधियों से जुड़े बताए जाते हैं। चिकित्सा संगठनों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने भी विभिन्न मंचों पर स्वीकार किया है कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव उल्लेखनीय है। जब किसी क्षेत्र में सत्ता और पूँजी का इतना घनिष्ठ संबंध बन जाता है, तब वहाँ कड़े कानून लागू करना स्वाभाविक रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “प्रदेश में 60 प्रतिशत अस्पताल किसी विशेष राजनीतिक दल के नेताओं से जुड़े हैं” जैसे कथन राजनीतिक आरोप की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि इसकी पुष्टि किसी आधिकारिक दस्तावेज से नहीं होती। फिर भी यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि निजी अस्पतालों के स्वामित्व में राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है। यदि यह अधिनियम लागू होता है, तो केवल छोटे क्लिनिक ही नहीं, बल्कि बड़े और प्रभावशाली अस्पताल भी समान जाँच और मानकों के दायरे में आएँगे—यही स्थिति सरकार के लिए असुविधाजनक बन जाती है।
मध्यप्रदेश सरकार की मौजूदा नीति प्रायः यह रही है कि निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के नाम पर कभी-कभार छापेमारी, नोटिस या जाँच कर दी जाए। परंतु यह कार्रवाई चयनात्मक और अस्थायी होती है। कोई स्थायी, कानून आधारित तंत्र नहीं है जो यह तय करे कि किस अस्पताल ने कौन-सा मानक तोड़ा और उस पर क्या दंड होगा। जब नियम अस्पष्ट होते हैं, तो प्रशासनिक विवेक और राजनीतिक दबाव—दोनों को खुली छूट मिल जाती है। क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट इस विवेकाधिकार की जगह कानून आधारित व्यवस्था स्थापित करता है, और यही बात कई सरकारों को असहज करती है।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इस अधिनियम के लागू होने पर स्टेट काउंसिल फॉर क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स का गठन करना पड़ता है, जिसमें चिकित्सा व नर्सिंग काउंसिलों के प्रतिनिधि तथा स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इसका अर्थ है कि निर्णय केवल विभागीय या राजनीतिक स्तर पर नहीं होंगे, बल्कि एक संस्थागत ढाँचे के माध्यम से लिए जाएँगे। यह व्यवस्था राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित कर सकती है, और संभवतः यही कारण है कि कई राज्य इसे अपनाने से हिचकते रहे हैं।
मध्यप्रदेश में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों और चिकित्सकों की कमी के कारण जनता का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र पर निर्भर हो गया है। ऐसे में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का नियमन और भी आवश्यक हो जाता है। विडंबना यह है कि जिस समय रेगुलेशन की सबसे अधिक जरूरत है, उसी समय सरकार सबसे अधिक निष्क्रिय दिखाई देती है।
सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि सख्त कानून से छोटे डॉक्टर और क्लिनिक प्रभावित होंगे। यह आशंका आंशिक रूप से सही हो सकती है, पर इसका समाधान कानून को लागू न करना नहीं, बल्कि उसे व्यावहारिक और न्यायसंगत बनाना है। जिन राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार—ने यह अधिनियम अपनाया है, वहाँ भी प्रारंभिक विरोध हुआ, किंतु समय के साथ व्यवस्था संतुलित हो गई और अस्पतालों को मानकों के अनुरूप ढलना पड़ा।
मध्यप्रदेश में ऐसा क्यों संभव नहीं हो पाया, इसका कोई ठोस प्रशासनिक उत्तर सरकार के पास नहीं है। वस्तुतः इस अधिनियम का लागू न होना प्रदेश की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यहाँ स्वास्थ्य को अब भी सामाजिक दायित्व से अधिक राजनीतिक और आर्थिक अवसर के रूप में देखा जाता है। जब तक निजी स्वास्थ्य क्षेत्र सत्ता के प्रभाव से मुक्त नहीं होगा, तब तक ऐसे कानूनों को लागू करने की वास्तविक इच्छाशक्ति पैदा नहीं होगी। मरीज की सुरक्षा, पारदर्शिता और अधिकार की बातें भाषणों तक सीमित रहेंगी, कानून की किताबों में साकार नहीं होंगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने कई बार इस अधिनियम पर अध्ययन और विचार-विमर्श के लिए समितियाँ गठित कीं, पर उनकी रिपोर्टें या तो सार्वजनिक नहीं हुईं या फाइलों में दबकर रह गईं। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या जानकारी या कानूनी प्रावधानों की नहीं, बल्कि निर्णय लेने की इच्छा की है।
मूल प्रश्न केवल इतना नहीं है कि मध्यप्रदेश में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट लागू है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वास्तव में पारदर्शी और जवाबदेह बनाना चाहती है। यदि उत्तर हाँ है, तो इस अधिनियम को लागू करने से बेहतर कोई विकल्प नहीं है; और यदि उत्तर नहीं है, तो मानना पड़ेगा कि इसे लागू न करने के पीछे प्रशासनिक से अधिक राजनीतिक और आर्थिक कारण प्रभावी हैं।
आज मध्यप्रदेश का मरीज इलाज से पहले यह सोचने को विवश है कि अस्पताल सुरक्षित है या नहीं, बिल उचित बनेगा या नहीं, और शिकायत करने पर सुनवाई होगी या नहीं। क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट इन प्रश्नों का संस्थागत उत्तर दे सकता है। लेकिन जब तक सत्ता और स्वास्थ्य व्यापार के बीच उचित दूरी स्थापित नहीं होती, तब तक यह अधिनियम प्रदेश में केवल चर्चा का विषय बना रहेगा—कानून का नहीं।


