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    भोपाल का कोई नेता ही नहीं है। कोई जन प्रतिनिधि नेता बनना ही नहीं चाहता

    भोपाल का कोई नेता ही नहीं है। कोई जन प्रतिनिधि नेता बनना ही नहीं चाहता। नेता को नेतृत्व देना होता है। नेतृत्व देने का समय जन प्रतिनिधियों के पास नहीं है। कारण, जन प्रतिनिधि जनता के मुद्दे उठाकर नहीं बने। धर्म के आधार पर लोगों को बांटकर बने हैं। इस कारण पूरा समय राम- राम करके निकाल देते हैं। नया भोपाल जिसमें तुलसी नगर शिवाजी नगर और चार इमली जैसे इलाके आते हैं वहां चार दिन से नगर निगम पानी की सप्लाई नहीं कर पा रहा है। बड़े-बड़े अफसरों की गाड़ियां मिनरल वाटर की बोतल तलाश कर रही हैं। बड़े अफसर हैं तो मिनरल वाटर खरीदकर पी सकते हैं। एक तो मंहगाई की मार उस पर पानी भी खरीदना पडे तो सोचिए क्या गुजर रही होगी गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार पर। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार में बैठकर नीति बनाने वालों को भी नहीं। शहर में एक नेता होता तो जनता हैंडपंप पर लाइन लगाए नहीं खड़ी होती। जी हां भोपाल हैंड पंप युग में आ गया है। भोपाल का नेता होता तो जनता के घर के बाहर पानी के टैंकर खड़े होते। क्या से क्या हो गया भोपाल। नर्मदा के पानी के नाम पर छला गया। सबसे मंहगा पानी शहर पी रहा। व्यक्तिगत नल कनेक्शन मिलता नहीं है, बल्क कनेक्शन देते ही इसलिए है कि नगर निगम अफसरों का सिर बचा रहे। अपने शहर को बचाइए। कोई नेता नहीं है तो‌ आप खुद नेता बनिए। मीडिया के भरोसे न रहिए। अब यह समाज का दर्पण नहीं है। सत्ताधीश अखबार आपका हाल जानने नहीं पढ़ते। अपनी तस्वीर और चापलूसी भरे अल्फ़ाज़ उन्हें दिल्ली शुकून देते हैं। दिनेश गुप्ता

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