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    “जीते-जी, भाई साहब को श्रद्धांजलि”

    “जीते-जी, भाई साहब को श्रद्धांजलि”

     

    यह घटना आज से लगभग 25 साल पहले की है, जब आधी रात के सन्नाटे को मेरे लैंडलाइन फोन की बेल ने मुझे उठा दिया। घड़ी में रात के 12:30 बज रहे थे। दूसरी तरफ ऑफिस के शर्मा जी थे, जिनकी आवाज में भारी दुख और कंपकपी थी।

    शर्मा जी ने कांपते हुए कहा, “जयदीप भाई, बहुत बुरी खबर है! हमारे साथी मेहरा जी का हार्ट अटैक से स्वर्गवास हो गया है। बॉडी हमीदिया अस्पताल में है। सुबह 8 बजे घर लाएंगे।”

    उस पल मेरा मन भारी हो गया। मेहरा जी के साथ मेरे पारिवारिक संबंध थे, मेरे पिता उन्हें छोटे भाई जैसा मानते थे। वन विभाग में जब मैंने पहली बार जॉइन किया था, तो उन्होंने मुझे गले लगाकर ‘वाहे गुरु’ के उद्घोष के साथ स्वागत किया था। मैं पूरी रात सो नहीं पाया, बस उनकी यादों में डूबा रहा।

     

    अगली सुबह, दुख के बोझ तले दबा मैं सुबह 6:30 बजे ही न्यू मार्केट की पहली खुली दुकान पर पहुंच गया। वहां से दो भारी-भरकम गुलाब की मालाएं खरीदीं और एक बड़ी पॉलिथीन में ढेर सारी गुलाब की पंखुड़ियां भरवा लीं—ताकि शवयात्रा के दौरान उन पर पुष्प वर्षा कर सकूं।

     

    ठीक 7 बजे मैं कोटरा सुल्तानाबाद स्थित उनके सरकारी निवास पर पहुंचा। वहां सन्नाटा था। शायद बॉडी अभी नहीं आई थी। मैंने धीरे से दरवाजा खटखटाया। भाभी जी बाहर निकलीं, आंखें सूजी हुई थीं। मैंने नमस्ते किया, पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और बिना कुछ कहे अंदर चली गईं। मैं भरे मन से ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठ गया।

     

    तभी, ड्राइंग रूम का पर्दा हिला और मेहरा भाई साहब साक्षात सामने खड़े थे! उन्होंने मुझे देखते ही कहा, “अरे जयदीप, इतनी सवेरे-सवेरे? सब ठीक तो है?” फिर वे पीछे मुड़कर भाभी जी से बोले, “अरे! जयदीप आये है, चाय-बिस्किट लाओ!”

    मैं हतप्रभ था, मेरी आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। मैंने उन्हें जीवित देखा तो जान में जान आई। मेहरा भाई साहब ने मेरा हाथ थामकर कहा, ” बड़े भाई का घर है, कभी भी आ सकते हो, लेकिन ये इतनी सारी मालाएं और पॉलिथीन भरकर फूल किसलिए?”

    मैंने निरुत्तर होकर कहा, “भाई साहब, अगर सच बता दिया तो आपके घर में मेरा चाय-नाश्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। चलिए, चौराहे तक चलिए, वहीं बताऊंगा।”

    चौराहे पर जाकर जब मैंने उन्हें रात वाली फोन कॉल और शर्मा जी के ‘गलत संदेश’ की कहानी सुनाई, तो वे ठहाका मारकर हंस पड़े। बोले, “अरे जयदीप! शर्मा जी ने ‘मेहता’ की जगह ‘मेहरा’ सुन लिया। ऑफिस वाले मेहता जी का निधन हुआ है, मुझे भी वहां जाना है!”

     

    आज 25 साल बाद भी जब हम मिलते हैं, तो इस ‘जीवित अंतिम संस्कार’ वाली घटना को याद कर खूब हंसते हैं। श्री जी.पी. मेहरा जी वन विभाग से लेखा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होकर आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं। ईश्वर उन्हें शतायु करें, ताकि हम ऐसी ही गलतफहमियों पर साथ मिलकर जोरदार ठहाके लगा सकें!

     

    — जयदीप सिंह चौहान,

    भोपाल, मध्य प्रदेश

    🙏🙏🌹🙏🙏

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