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    प्रोपेगेंडा की राजनीति और युवा आबादी की बढ़ती बेचैनियों के बीच जो अंतर्विरोध हैं

    प्रोपेगेंडा की राजनीति और युवा आबादी की बढ़ती बेचैनियों के बीच जो अंतर्विरोध हैं वे अब सतह पर आ चुके हैं। अब नरेंद्र मोदी के लिए अपनी ही शैली में राज करते रहना कठिन हो जाएगा क्योंकि उन्होंने महसूस कर लिया है कि उनका कोर वोटर अब जरूरी मुद्दों की ओर रुख कर रहा है। दिक्कत यह होगी कि अपनी शैली में राजनीति करते और राज करते मोदी इतना आगे बढ़ चुके हैं कि उनके लिए कुछ समय के लिए ठिठकना तो संभव है किंतु मुड़ना आसान नहीं। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक तरह से मोदी का ठिठकना है क्योंकि अब तक तो वे अपनी ही रौ में सरकार को और देश को हांके जा रहे थे।

     

    इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान ने दिया किंतु इस आंदोलन के दौरान छवि मोदी की ध्वस्त हुई है। बारह वर्षों में पहली बार नजर आया कि लोगों का डर खत्म हो रहा है और इस निडरता की मुखर अभिव्यक्ति जेन जी कही जा रही युवा आबादी के माध्यम से हुई।

     

    आंदोलन के दौरान जो एक बात खास तौर पर नजर आई कि मोदी के दौर के सत्ता प्रतिष्ठान के पैंतरों को आंदोलनकारी समझ रहे थे और इसके लिए तैयार भी थे। वे जानते थे कि बड़े मीडिया चैनल आंदोलन की धार को अपने प्रपंचों से भोथरा करने की हर कोशिश करेंगे। उन्होंने इन चैनलों को कोई स्पेस तो नहीं ही दिया बल्कि बेइज्जत करके, लानत भेज भेज कर उनके रिपोर्टर्स को अपने बीच से भगाना शुरू किया। उन्होंने आंदोलन स्थल के पास ट्रक पर रखे पत्थर, तोड़ ताड़ कर रखवा दी गई कार को आगे बढ़ कर एक्सपोज किया और थोड़ी भी देर के लिए इस भ्रम या संदेह को जिंदा नहीं रहने दिया कि ऐसा आंदोलन में शामिल अराजक बन चुके युवाओं ने किया है।

     

    अरब स्प्रिंग की तरह सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को भी रफ्तार दी, गहराई दी और सबसे बड़ी बात,…व्यापकता दी। युवा आबादी की बेचैनियां देशव्यापी हैं तो आंदोलन की लपट भी देश के अनेक हिस्सों में उठी।

     

    पेपर लीक के माध्यम से अवसरों पर माफियाओं की कुदृष्टि, शिक्षा के सवाल, रोजगार के सवाल इस आंदोलन के केंद्र में रहे और यही कारण था कि सत्ता प्रतिष्ठान या उसके अनुचर की भूमिका निभाते मीडिया के लिए यह संभव ही नहीं था कि वह देशद्रोह, हिंदू मुसलमान आदि जैसे प्रोपेगेंडा पसार कर लोगों को भ्रमित कर पाता।

     

    मुख्य रूप से शहरी मध्यवर्ग और गांवों से शहरों में आकर पढ़ने के लिए या रोजगार के लिए रहती नौजवान आबादी का यह आंदोलन धीरे धीरे देश भर का ध्यान खींचने लगा था और जेन जी कही जा रही पीढ़ी की अभिव्यक्ति भावनात्मक स्तरों पर उग्र से उग्रतर होती जा रही थी। लड़कियों की बेखौफ और बिंदास भागीदारी ने आंदोलन को मजबूत किया जबकि जंतर मंतर पर अभिभावकों की बढ़ती उपस्थिति ने अहसास कराया कि बात जब बच्चों के भविष्य की हो तो शहरी मिडिल क्लास की आंखों पर से भी सांप्रदायिकता, हिंदू राष्ट्रवाद आदि आदि का चश्मा उतरने लगा है। वे भी अब सवाल पूछने लगे हैं और सार्वजनिक तौर पर पूछने लगे हैं।

     

    सवाल…

    इनसे तो नरेंद्र मोदी को सबसे अधिक डर लगता है और इस आंदोलन के माध्यम से उनके बारह वर्षों के राज पर सवालों की बौछार होनी शुरू हो गई थी। ऐसी अनपेक्षित स्थिति में स्थितियों को संभालने के लिए और सांस लेने के लिए कुछ मोहलत पाने की खातिर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कोई महंगा सौदा नहीं था। तो, ज़िद और अहंकार को परे झटक प्रधान का इस्तीफा ले लिया गया।

     

    अब…आगे नरेंद्र मोदी क्या करेंगे?

     

    यही तो सबसे बड़ी दिक्कत आ खड़ी हुई है मोदी के सामने। वे अब वह सब नहीं कर सकते जो वे करते आ रहे हैं…यानी प्रोपेगेंडा की राजनीति, नैरेटिव सेट कर लोगों को भरमाए रखने की राजनीति, झूठ और मिथ्या से भरी हुई राजनीति। उन्होंने देख लिया कि धुरंधर जैसी प्रोपेगेंडा फिल्मों ने पैसा तो खूब बनाया, झूठ और भ्रम का वितान रच कर उनकी छवि के चारों ओर बने छद्म के आभामंडल को तो खूब विस्तार दिया किंतु जब सवालों से लबरेज किसी बेचैन आंदोलन से सामना हुआ तो इनमें से कुछ काम नहीं आया। एक से एक शब्दों से, व्यंग्य भरे मीम्स से, आक्रोश भरे नारों से मोदी के बारह सालों की, उनकी राजनीतिक शैली की ऐसी बखिया उधड़ती दिखी जिसकी कल्पना अभी कुछ महीने पहले तक कोई नहीं कर सका था। एकबारगी सारा आभामंडल तिरोहित होता नजर आने लगा है।

     

    चुनौतियां कई हैं सामने और मोदी के लिए इनसे बच कर, साइड लेकर निकलना आसान नहीं।

     

    राम मंदिर के चढ़ावों की लूट, पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट, पेपर लीक की तह तक पहुंच कर दोषियों की तफ्तीश, रोजगार के सवाल और महंगी होती शिक्षा के सवाल…ये मुद्दे उन्हें जरा भी मोहलत देने वाले नहीं। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लेने से मोदी कोई हीरो नहीं बन गए हैं और जेन जी की नजरों में तो कतई नहीं जो इस अहसास से लबरेज हैं कि उन्होंने नरेंद्र मोदी के अहंकार को तोड़ दिया।

     

    युवा आबादी के बीच मोदी की छवि का कमजोर होना उनके नायकत्व की सबसे बड़ी क्षति है और उनके पास ऐसा कुछ नहीं कि वे दोबारा इस नायकत्व को हासिल कर सकें। उन्हें अब अपनी ध्वस्त हो चुकी छवि के बोझ को ढोते हुए राज करना है और उनकी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए उनके ही कुनबे की आंतरिक राजनीति में उनके विरोधियों के दबाव अब बढ़ते जाएंगे, घेरे अब सिमटते जाएंगे। विपक्ष की घेरेबंदी तो होगी ही।

     

    नरेंद्र मोदी की सरकार के नैतिक बल का ह्रास हो चुका है और कमजोर नैतिक बल के साथ लप्पेबाजी आधारित राजनीति अब अधिक दिनों तक नहीं चल सकती।

     

    विदेश नीति के स्तर पर जितने भी नैरेटिव्स सेट किए जाते रहे उनको तो तितर बितर करने में अकेले जितना योगदान डोनाल्ड ट्रंप की अक्खड़ और अपमानजक हरकतों और टिप्पणियों ने दिया उसे देश और दुनिया ने देखा, लोग हैरान हुए, लोग हँसे और लोगों ने वास्तविकता को स्वीकार कर नैरेटिव्स की भ्रामकता को स्वीकार भी किया

     

    अब, हर आने वाला दिन मोदी को चुनौती देगा। वे अब दिग्विजयी की भूमिका में नहीं हैं, अपनी ही नौजवान पीढ़ी के द्वारा तोड़े गए अहंकार, अपनी ही बिखरी हुई छवि के साथ हैं। उन्हें अब कोई भी सांस लेने तक की मोहलत देने को तैयार नहीं। एक डर और भय का जो घेरा था। जिसे अमित शाह की कथित चाणक्यबुद्धि सघन बनाती रही थी…वह सब कुछ अब विच्छिन्न होता नजर आएगा।

     

    दिल्ली टैक्सी और ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट के मुद्दे पर संसद की ओर मार्च करने की बात कर रहा है। इथेनॉल का मुद्दा कोई आसान नहीं। इसके पीछे उद्योगपतियों की एक मजबूत लॉबी है जो सरकार को पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट के लिए तर्क देने को न सिर्फ प्रेरित, बल्कि कई मायनों में विवश भी कर रही है। अभी तक मोदी की राजनीति यही रही है कि वे करते कॉरपोरेट के लिए हैं लेकिन नैरेटिव सेट कर मुद्दे को लोगों की नजरों से ओझल कर जनप्रिय नेता की अपनी छवि को बनाए रखने का सफल उपक्रम करते रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर अब उन्हें दोधारी तलवार का सामना है। इथेनॉल मिलावट से शहरी मध्यवर्ग आशंकाओं से घिर गया है और ट्रांसपोर्टर्स एसोसिएशन के आंदोलन से वह भी अधिक चौकन्ना होगा। हितों की टकराहटों के बीच मोदी जी सैंडविच बने नजर आएंगे और यह देश देखेगा।

     

    शीराजा बिखरने लगा है और अब नरेंद्र मोदी इसके मलबों को ही समेट सकते हैं, कोई नई इमारत खड़ी नहीं कर सकते। उन्होंने, उनके सलाहकारों ने 145 करोड़ की आबादी वाले इस देश के हर जरूरी सवाल का जवाब अपनी झोली में होने के दावे के साथ सत्ता हासिल की, फिर इतनी बड़ी आबादी के मनोविज्ञान को समझने में इतनी होशियारी दिखानी शुरू की, सत्ता प्रतिष्ठान में महत्वपूर्ण बने उनके लोगों ने इतनी अकुशलता दिखानी शुरू की, इतना निश्चिंत अहंकार दिखाना शुरू किया कि एक दिन ऐसी स्थिति आनी ही थी जब खुद मोदी की छवि बिखरती नजर आने लगे और सत्ता प्रतिष्ठान के ढहने की स्थिति आने लगे। वह स्थिति आ चुकी है। राम मंदिर और अयोध्या की विकास प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के निडर भ्रष्टाचार और चढ़ावा चोरी ने उस राजनीतिक समूह के खिलाफ लोगों को संदेह और आक्रोश से भर दिया है जो शुचितावादी होने के दावों के साथ लोगों के बीच खुद के अलग होने का संदेश देता रहा था। शुचिता के भ्रम की वह पूंजी भी लुप्त हो चुकी।   बच गए हैं तो सिर्फ सवाल…जिनसे मोदी जी को डर लगता है, जिनसे बचने में मोदी जी अब तक जैसे तैसे सफल होते रहे हैं और सबसे बड़ी बात…जिन सवालों के जवाब मोदी जी के पास हैं ही नहीं। कभी थे भी नहीं।hament kumar jha

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