
*जनता के तीर से दो बड़े शिकार…?*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
लोकतंत्र बड़ा विचित्र खेल है। यहां जनता पांच साल तक चुपचाप सब कुछ देखती रहती है। नेता मंचों से दहाड़ते रहते हैं, समर्थक सोशल मीडिया पर विजय पताका फहराते रहते हैं, टीवी चैनल हवा का रुख बताते रहते हैं और राजनीतिक विश्लेषक आंकड़ों के सहारे भविष्य लिखते रहते हैं। लेकिन मतदान वाले दिन जनता बिना कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस किए, बिना कोई ट्वीट किए और बिना किसी नारे के ऐसा फैसला लिख देती है कि बड़े-बड़े राजनीतिक गणितज्ञों के कैलकुलेटर भी हैंग हो जाते हैं।
दतिया उपचुनाव का परिणाम भी कुछ ऐसा ही रहा। इस चुनाव ने केवल एक सीट का फैसला नहीं किया, बल्कि कई राजनीतिक मिथकों को एक साथ धराशायी कर दिया। सबसे बड़ी खबर यह नहीं रही कि कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह चुनाव जीत गए। सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह रहा कि पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के अपने बूथ से ही कांग्रेस को बढ़त मिल गई। राजनीति में इससे बड़ा प्रतीक शायद ही कोई हो सकता है।
नेता अक्सर कहते हैं कि जनता हमारे साथ है। कार्यकर्ता कहते हैं कि बूथ हमारा सबसे मजबूत है। संगठन दावा करता है कि हर घर तक हमारी पहुंच है। लेकिन जब अपने ही बूथ से जनता दूसरी दिशा में चली जाए, तब समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं संवाद टूट चुका है। अब असली मजाक चुनाव परिणाम के बाद शुरू होता है।
भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व बड़ी उलझन में दिखाई देता है। यदि हार की जिम्मेदारी तय करनी है तो किस पर की जाए? यदि अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी है तो किससे शुरू की जाए? यदि केवल नरोत्तम मिश्रा को जिम्मेदार माना जाएगा तो फिर एक नया सवाल भी खड़ा होगा।
चर्चा इस बात की भी है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के विधानसभा क्षेत्र में भी पार्टी को अपेक्षा से कहीं अधिक खराब प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। यदि पैमाना केवल हार है, तो फिर न्याय का तकाजा यही कहता है कि नियम सब पर समान रूप से लागू हों। यदि हार अपराध है तो अपराधी केवल एक कैसे हो सकता है? और यदि हार सामूहिक जिम्मेदारी है तो फिर किसी एक को बलि का बकरा क्यों बनाया जाए?
भारतीय राजनीति में हार का भी अपना अलग संविधान है। जीत मिले तो पूरा श्रेय शीर्ष नेतृत्व को जाता है। पोस्टर लगते हैं कि यह अमुक नेता की ऐतिहासिक जीत है। धन्यवाद यात्राएं निकलती हैं। विजय उत्सव मनाया जाता है। लेकिन जैसे ही हार आती है, अचानक कहा जाता है कि स्थानीय संगठन कमजोर था, उम्मीदवार ने मेहनत नहीं की, बूथ प्रबंधन ठीक नहीं था, कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं था। अर्थात जीत सामूहिक होती है और हार व्यक्तिगत।
यह राजनीति का ऐसा गणित है जिसे आज तक किसी विश्वविद्यालय ने पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया, लेकिन हर राजनीतिक दल के कार्यालय में यह नियम दीवार पर अदृश्य अक्षरों में लिखा होता है।
दतिया की जनता ने इस बार यह भी बता दिया कि चुनाव केवल भाषणों से नहीं जीते जाते। चुनाव केवल हेलीकॉप्टर से उतरकर सभा करने से नहीं जीते जाते। चुनाव केवल सोशल मीडिया के ट्रेंड से नहीं जीते जाते। चुनाव जनता के मन में जीते जाते हैं और जब मन बदल जाता है तो सबसे मजबूत माने जाने वाले किले भी ढह जाते हैं।
राजनीति में एक भ्रम बहुत तेजी से फैलता है अजेय होने का भ्रम। नेता सोचने लगता है कि उसके बिना पार्टी नहीं चलेगी। कार्यकर्ता सोचने लगते हैं कि उनका नेता कभी हार ही नहीं सकता। समर्थक मान लेते हैं कि विपक्ष का कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि वह समय-समय पर इस भ्रम को तोड़ देता है।
जनता किसी नेता से नफरत करके नहीं हराती। वह केवल यह बताती है कि अब उसे नया विकल्प चाहिए या पुराने व्यवहार में बदलाव चाहिए। जनता का फैसला भावनाओं से कम और अनुभवों से अधिक बनता है।
आज राजनीतिक दल समीक्षा बैठकों में हार के कारण तलाश रहे होंगे। कोई कहेगा टिकट गलत था। कोई कहेगा रणनीति कमजोर थी। कोई संगठन को दोष देगा। कोई स्थानीय समीकरण गिनाएगा। कोई जातीय समीकरण बताएगा। कोई बूथ मैनेजमेंट की रिपोर्ट मांगेगा। लेकिन कोई यह पूछने की हिम्मत शायद ही करेगा कि क्या जनता की नाराजगी को समय रहते समझा गया था?
नेताओं के आसपास अक्सर ऐसे लोगों की भीड़ होती है जो हर समय कहते रहते हैं “साहब, सब बढ़िया है। जनता आपके साथ है।” यही लोग सबसे खतरनाक होते हैं। ये नेता को सच से दूर रखते हैं। परिणाम यह होता है कि चुनाव आते-आते नेता को वास्तविक स्थिति का पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक ईवीएम अपना निर्णय लिख चुकी होती है।
चुनाव हारने के बाद सबसे पहले वही लोग गायब हो जाते हैं जो जीत के समय सबसे आगे दिखाई देते थे। कल तक जो नेता के साथ सेल्फी लेकर सोशल मीडिया भर रहे थे, आज उनके मोबाइल भी बंद मिलते हैं। राजनीति में मौसम विभाग की सबसे सटीक भविष्यवाणी कार्यकर्ता ही करते हैं हवा बदलते ही उनका पता भी बदल जाता है।
दतिया का परिणाम केवल दतिया की कहानी नहीं है। यह पूरे देश की राजनीति के लिए संदेश है कि लोकतंत्र में कोई स्थायी विजेता नहीं होता। जनता हर चुनाव में नई कॉपी खोलती है। पिछले चुनाव का रिपोर्ट कार्ड अगले चुनाव में बोनस अंक नहीं देता।
यदि भाजपा नेतृत्व वास्तव में हार का विश्लेषण करना चाहता है तो उसे केवल व्यक्तियों को नहीं, व्यवस्था को देखना होगा। यदि संगठन में संवाद की कमी है, यदि स्थानीय कार्यकर्ता उपेक्षित हैं, यदि जनता की शिकायतें अनसुनी रह गई हैं, यदि आत्मविश्वास अहंकार में बदल गया है, तो फिर जिम्मेदारी भी सामूहिक होगी।
और यदि अनुशासन की तलवार चलानी ही है, तो उसका पैमाना भी समान होना चाहिए। लोकतंत्र में न्याय का पहला सिद्धांत यही है कि नियम व्यक्ति देखकर नहीं बदलते। यदि एक नेता हार के लिए जिम्मेदार है तो वही कसौटी सभी पर लागू होनी चाहिए। वरना जनता यह मानने लगेगी कि राजनीति में भी कुछ लोग कानून से ऊपर हैं और कुछ केवल जवाबदेही निभाने के लिए बनाए गए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी विजेता कोई पार्टी नहीं, बल्कि जनता है। उसने फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र का अंतिम अध्याय वही लिखती है। चुनाव आयोग केवल परिणाम घोषित करता है, असली फैसला तो मतदाता पहले ही कर चुका होता है।
दतिया की जनता ने इस बार दो बड़े शिकार किए हैं। पहला शिकार चुनावी हार का है और दूसरा राजनीतिक अहंकार का। जनता ने यह संदेश दिया है कि चाहे नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी सबसे बड़ी परीक्षा उसके अपने बूथ, अपने कार्यकर्ता और अपने क्षेत्र की जनता ही लेती है।
लोकतंत्र में जनता कभी ऊंची आवाज में नहीं बोलती। वह केवल मतदान करती है। लेकिन उसका एक वोट ऐसा तीर होता है जो सत्ता के सबसे मजबूत कवच को भी भेद देता है।
इसलिए नेताओं को जनता से डरने की जरूरत नहीं, बल्कि जनता की बात सुनने की जरूरत है। क्योंकि चुनावी मंचों पर बजने वाली तालियां किराए पर मिल सकती हैं, सोशल मीडिया के ट्रेंड बनाए जा सकते हैं, भीड़ जुटाई जा सकती है, लेकिन मतदान केंद्र के भीतर खड़ा मतदाता न खरीदा जा सकता है, न डराया जा सकता है और न ही हमेशा भ्रमित रखा जा सकता है।
जनता जब फैसला करती है तो उसके तीर का निशाना केवल एक उम्मीदवार नहीं होता। वह सत्ता, संगठन, नेतृत्व, रणनीति और अहंकार सबको एक साथ भेद देता है। दतिया ने यही करके दिखाया है। अब देखना यह है कि राजनीतिक दल इस संदेश को आत्ममंथन का अवसर मानते हैं या फिर किसी एक चेहरे को दोषी ठहराकर अगले चुनाव तक खुद को संतुष्ट कर लेते हैं। क्योंकि लोकतंत्र की अदालत में अपील नहीं होती वहां केवल अगला चुनाव होता है।
*नोट: यह व्यंग्यात्मक लेख है। इसमें व्यक्त राजनीतिक टिप्पणियाँ लेखक की व्यंग्य शैली का हिस्सा हैं।*


