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    *घोषणाओं का साम्राज्य?*

    *घोषणाओं का साम्राज्य?*

     

    लघुकथा -राजेन्द्र सिंह जादौन

     

    बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल और समृद्ध देश था। उस देश का एक राजा था, जो स्वयं को संसार का सबसे महान शासक मानता था। उसके दरबारियों का दावा था कि उसके जैसा बुद्धिमान, दूरदर्शी और युगपुरुष राजा न कभी पैदा हुआ था और न कभी होगा। राजा को यह सुनना बहुत अच्छा लगता था। धीरे-धीरे उसने यह मान भी लिया कि वह वास्तव में विश्वगुरु है और उसकी हर बात इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।

     

    राजा की एक विशेषता थी। उसे शासन चलाने से अधिक अपने प्रचार-प्रसार की चिंता रहती थी। राज्य में सड़कों का क्या हाल है, किसानों की फसल कैसी है, मजदूरों को रोजगार मिल रहा है या नहीं, इससे उसे उतना सरोकार नहीं था जितना अपनी तस्वीरों, भाषणों और प्रशंसा के गीतों से था।

     

    राजधानी में विशाल भवन बने हुए थे। हर चौराहे पर राजा की तस्वीरें लगी थीं। समाचार पत्रों में राजा की महानता के लेख छपते थे। दरबार के कवि, गायक, लेखक और पत्रकार दिन-रात राजा की प्रशंसा में नए-नए विशेषण खोजते रहते थे।

     

    एक दिन एक पत्रकार राजा के दरबार में पहुंचा। वह कई वर्षों से पत्रकारिता कर रहा था। उसने सोचा कि शायद राजा से मिलने पर उसे कुछ सम्मान, पुरस्कार या सुविधा मिल जाए।

     

    राजा ने उसे देखते ही पूछा,

     

    “बताओ पत्रकार, तुम मेरी प्रशंसा में कितने कसीदे पढ़ सकते हो?”

     

    पत्रकार ने अवसर पहचान लिया।

     

    वह बोला, “महाराज, आपके जैसा महान शासक इस धरती पर कभी नहीं हुआ। आपके नेतृत्व में सूरज भी अधिक चमकता है और चांद भी अधिक उजला दिखाई देता है।”

     

    राजा प्रसन्न हो गया।

     

    “बहुत खूब! तुम्हें चांदी का हार दिया जाता है।”

     

    पत्रकार के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

     

    उसने सोचा कि यदि थोड़ी प्रशंसा पर चांदी का हार मिल सकता है तो अधिक प्रशंसा पर शायद और बड़ा पुरस्कार मिल जाए।

     

    वह फिर बोला,

     

    “महाराज, आपकी नीतियां इतनी महान हैं कि आने वाली हजार पीढ़ियां भी उनका गुणगान करेंगी। दुनिया के सारे राजा आपके सामने विद्यार्थी जैसे हैं।”

     

    राजा भाव-विभोर हो गया।

     

    “अद्भुत! तुम्हें सोने का हार दिया जाता है।”

     

    अब पत्रकार पूरी तरह उत्साहित हो चुका था।

     

    वह बोला,

     

    “महाराज, इतिहास आपके नाम से शुरू होगा और भविष्य आपकी प्रेरणा से चलेगा। यदि देवता भी चुनाव लड़ें तो आपकी लोकप्रियता के सामने हार जाएं।”

     

    यह सुनकर राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ।

     

    “वाह! तुम्हें एक विशाल महल दिया जाता है।”

     

    दरबार तालियों से गूंज उठा।

     

    पत्रकार प्रसन्न होकर घर लौट आया। उसने अपने मित्रों को बताया कि अब उसका भाग्य बदलने वाला है। जल्द ही चांदी का हार, सोने का हार और महल उसके पास होगा।

     

    लेकिन दिन बीत गए।

     

    फिर सप्ताह बीत गए।

     

    फिर महीने बीत गए।

     

    न कोई हार आया, न महल।

     

    शुरुआत में पत्रकार ने सोचा कि शायद राजकीय प्रक्रिया में समय लगता होगा। लेकिन जब चार महीने गुजर गए तो उसकी बेचैनी बढ़ गई।

     

    आखिरकार वह फिर राजा के दरबार में पहुंचा।

     

    उसने विनम्रता से कहा,

     

    “महाराज, आपने जो चांदी का हार, सोने का हार और महल देने की घोषणा की थी, वह आज तक मुझे प्राप्त नहीं हुआ।”

     

    राजा ने उसकी ओर देखा और जोर से हंस पड़ा।

     

    पूरा दरबार भी हंसने लगा।

     

    पत्रकार कुछ समझ नहीं पाया।

     

    राजा बोला,

     

    “तुमने मेरे कानों को सुख पहुंचाया था। तुम्हारी प्रशंसा सुनकर मुझे आनंद मिला था। बदले में मैंने भी तुम्हारे कानों को सुख पहुंचाया। जब मैंने चांदी, सोना और महल देने की घोषणा की थी, तब तुम्हें भी आनंद मिला था। हिसाब बराबर हो गया।”

     

    पत्रकार स्तब्ध रह गया।

     

    “लेकिन महाराज, घोषणा और वास्तविक उपहार में अंतर होता है।”

     

    राजा मुस्कुराया।

     

    “तुम कितने भोले हो। मेरे राज्य में घोषणाएं ही सबसे बड़ा उपहार हैं। यहां लोग घोषणा सुनकर ही खुश हो जाते हैं। उन्हें परिणाम की आदत नहीं है।”

     

    पत्रकार ने साहस जुटाकर पूछा,

     

    “महाराज, फिर जनता का क्या?”

     

    राजा ने कहा,

     

    “जनता भी वही सुनती है जो सुनना चाहती है। उन्हें नई योजनाओं की घोषणाएं मिलती हैं, नए वादों की घोषणाएं मिलती हैं, नए सपनों की घोषणाएं मिलती हैं। जब तक लोग घोषणा सुनकर ताली बजाते रहेंगे, तब तक उन्हें वास्तविकता दिखाने की आवश्यकता ही क्या है?”

     

    पत्रकार का सिर झुक गया।

     

    तभी राजा ने एक और रहस्य खोला।

     

    “और सुनो, जिस बनिए के यहां तुम पत्रकारिता करते हो, उसका अखबार और चैनल भी मेरी कृपा से ही चल रहा है।”

     

    पत्रकार चौंक गया।

     

    “कैसे महाराज?”

     

    राजा ने उत्तर दिया,

     

    “जिस दिन उसने मेरे गुणगान शुरू किए थे, उसी दिन मैंने उसे भी अनेक उपहारों की घोषणाएं कर दी थीं।”

     

    “क्या उसे सब मिल गया?”

     

    पत्रकार ने पूछा।

     

    राजा फिर हंस पड़ा।

     

    “उसे भी वही मिला जो तुम्हें मिला है घोषणाएं।”

     

    पूरा दरबार ठहाकों से गूंज उठा।

     

    अब पत्रकार को सब समझ में आने लगा था।

     

    उसे एहसास हुआ कि इस राज्य में घोषणाएं मुद्रा बन चुकी थीं। यहां वादे ही पुरस्कार थे, भाषण ही विकास थे और प्रचार ही उपलब्धि था।

     

    जो जितना बड़ा गुणगान करता था, उसे उतनी बड़ी घोषणा मिलती थी। और जो सवाल पूछता था, उसे देशद्रोही, नकारात्मक या विरोधी घोषित कर दिया जाता था।

     

    उस दिन पत्रकार भारी मन से दरबार से बाहर निकला।

     

    उसने पहली बार देखा कि महलों की चमक के पीछे जनता की आंखों में निराशा थी। बड़े-बड़े होर्डिंगों के पीछे अधूरे काम थे। भाषणों की गूंज के पीछे सन्नाटा था।

     

    उसे समझ आ गया कि जब पत्रकारिता सत्ता से पुरस्कार मांगने लगे और सत्ता प्रशंसा के बदले घोषणाएं बांटने लगे, तब सच सबसे पहले मरता है।

     

    और जिस दिन सच मर जाता है, उस दिन लोकतंत्र केवल एक विशाल मंच बनकर रह जाता है, जहां अभिनेता बदलते रहते हैं लेकिन नाटक वही चलता रहता है।

     

    राजा आज भी अपने दरबार में बैठा है।

     

    पत्रकार भी मौजूद हैं।

     

    कसीदे भी पढ़े जा रहे हैं।

     

    घोषणाएं भी हो रही हैं।

     

    बस फर्क इतना है कि अब लोगों ने घोषणाओं को ही उपलब्धि मानना शुरू कर दिया है।

     

    @all

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