
भीमनगर वाला वल्लभ भवन
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लोग कहते हैं कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल है।देखा जाए तो यह बात ग़लत नहीं है पर यह मोटा-मोटी बात है। बारीकी यह है कि राजधानी एक बिल्डिंग में है जिसे वल्लभ भवन कहते हैं। यह बात अलग है कि वह बिल्डिंग जिसमें राजधानी है भोपाल में है। इस चक्कर में पूरा भोपाल ही राजधानी कहा जाता है।
हम लोग जब गांव में थे तो अकसर सुनते थे अमुक काम सरकार ने किया, अमुक चीज सरकारी है पर हम यह नहीं जानते थे कि यह सरकार रहती कहां पर है। जब भोपाल आये तब पता चला कि सरकार वल्लभ भवन में रहती है।
तो खैर आज का किस्सा यह है कि एक पतली सी सड़क है जिसके एक तरफ वल्लभ भवन है और दूसरी तरफ भीमनगर झुग्गी बस्ती। भीमनगर भोपाल की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी झुग्गी बस्ती है।
भीमनगर और वल्लभ भवन के बीच जो पतली सी सड़क है उसपर खड़े हो जाओ तो लोकतंत्र के दर्शन होते थे। हमने लोकतंत्र का नाम खूब सुना था पर देखने का मौका इसी सड़क पर मिला।
सड़क की एक पटरी पर लोक दिखता है और दूसरी पटरी पर तंत्र
दोनों को एक साथ देख लो तो लोकतंत्र दिख जाता है
वल्लभ भवन में बहुत बड़े-बड़े लोग बैठते हैं उन्हीं को सामूहिक रूप से सरकार कहा जाता है।
हुआ यह कि एक बार एक मुख्यमंत्री जी ने घोषणा कर दी कि वल्लभ भवन में बैठने वाले बड़े बड़े लोग गांवों में जाकर रात बितायेंगे। कुल मिलाकर मतलब यह था कि जो सरकार है वह द्वार पर जायेगी। तंत्र लोक से मिलने जायेगा।
अब जो बड़े बड़े लोग हैं उनमें से एक बहुत बड़े सज्जन को भी गांव जाना पड़ा।वे बड़ों में भी बड़े थे। तो उन्होंने अपनी पावर का इस्तेमाल किया और भोपाल के आसपास का ही एक गांव खुद के लिए चुन लिया। जैसे तैसे रात बितायी। सुबह चेहरे पर हाथ फेरा तो पता चला दाढ़ी बढ़ आयी है।वे उस गांव के हेयर कटिंग करने वाले के पास गए।हेयर कटिंग करने वाले सज्जन बातूनी और मजाकिया स्वभाव के थे। शेविंग करते करते वे बोले-कहां से आये हो साहब? किसी रिश्तेदारी में आये हो क्या?
साहब ने कहा-नहीं, मैं भोपाल से आया हूं सरकारी काम से।
सज्जन बोले-भोपाल में क्या करते हो,साहब?
साहब-सरकारी नौकरी में हूं।
शेविंग वाले सज्जन-भोपाल तो पूरा मेरा देखा हुआ है। कौन से दफ्तर में नौकरी करते हो?
साहब-वल्लभ भवन में
शेविंग वाले सज्जन बोले-ये वल्लभ भवन कहां पर है?
साहब ने तरह तरह से समझाया।बिड़ला मंदिर के आगे वाला,जेल के पास वाला,बोर्ड आफिस से ऊपर चढ़ो वो वाला।शेविंग वाले सज्जन को एड्रेस समझ में नहीं आ रहा था।
थोड़ी देर बाद सोचते सोचते शेविंग करने वाले सज्जन बोले-अच्छा उस बिल्डिंग की बात तो नहीं कर रहे हो जो भीमनगर के सामने है।अरे इतना घुमा फिराकर क्यों बता रहे हो साहब।
सीधे सीधे कहो न भीमनगर वाला वल्लभ भवन।
भीमनगर तो मैं कई बार गया हूं।इस गांव के बहुत लोग हैं वहां।सामने वह बिल्डिंग भी मैंने देखी है।
वल्लभ भवन कितना भी बड़ा हो कितना भी पावरफुल हो पर वह अपनी पहचान के लिए भीमनगर का मोहताज है।
26 जनवरी 1950 को जो हमें मिला वह यही था।sudher naik


