कुछ झुकें, कुछ स्वीकारें, कुछ मानें, कुछ मनाएं….।
तो विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आ ही गई। बिहार और मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ दल को करारी हार देखनी पड़ी। न तो सत्ता, शासन प्रशासन काम ही आया ना ही इमोशन ही। उल्टे मध्यप्रदेश में तो मिश्रा जी का रोना उल्टा असर कर गया। बिहार में विधानसभा में बुरी तरह नकारे गए चुनाव विशेषज्ञ प्रंशात किशोर इस बार जनता द्वारा स्वीकार लिए गए। हां, गुजरात में जरूर कुछ ठीक रहा। इन परिणामों में अगर देखें तो हाल के घटनाक्रमों का खासा असर रहा है। खासकर छात्रों का, साथ ही अचानक प्रयोगवादी राजनीति का और किसी वर्ग विशेष को नीचा दिखाने के खिलाफ। मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां पर तय था कि नरोत्तम मिश्रा जिन्होंने कमलनाथ की सरकार का पतन कराकर प्रदेश में फिर से कमल खिलाने का मार्ग प्रशस्त किया था और जिन्होंने उपचुनाव को लेकर तैयारियां शुरु कर दी थीं उन्हें अचानक बदल दिया गया। दरअसल नरोत्तम मिश्रा प्रदेश में न सिर्फ ब्राम्हण वर्ग बल्कि पूरी भाजपा में एक कद्दावर नेता के रूप में माने जाते रहे हैं लेकिन अचानक एक छोटे कद के कार्यकर्ता से उन्हें रिप्लेस करना लोगों को खासा नागवार गुजरा। कहीं न कहीं यह संदेश गया कि जिसे बाम्हन बनियों की पार्टी कहा जाता था वो अब वैसी नहीं रही। इसके साथ ही अचानक से उम्मीदवार बदलने का फैसला और पर्ची सिस्टम पर भी मतदाताओं ने नकारात्मकता की मुहर लगाई है। जैसा कि बीते वर्षों में होता आया है। अचानक से एक छोटा सा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री बन जाता है और जनस्वीकार्य और बीते कई दशकों से पार्टी की विजयपताका को गढ़ने वाला नाम अचानक से ही नेपथ्य में चले जाता है। ऐसा शिवराज के साथ हुआ। वो तो गनीमत है कि पांव पांव वाले भैया ने हालात से समझौता कर लिया और किताब लिख डाली। राजस्थान, दिल्ली … लगभग सभी राज्यों में यही हाल हैं।
चलिए आज की हार को देखते हैं। भाजपा को भरोसा था कि राज्य में सरकार होने का फायदा उसे मिलेगा। मुख्यमंत्री से लेकर मिश्राजी तक भले ऊपरी मन से लेकिन लगातार दतिया में कमल खिलाने के प्रयास में लगे रहे। वहीं बिहार में भी हाल में ही नितीशवा की बयार को हटाकर आई भाजपा सरकार को भरोसा था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट तो बच ही जाएगी। उपचुनावों को वैसे भी हल्के में ही लिया जाता है। और फिर जब मुकाबला हाल के चुनाव में नकारे गए प्रशांत किशोर के साथ हो तो फिर तो कहने ही क्या। ऐसे में अतिउत्साह में थी पार्टी। लेकिन परिणाम आए उल्टे। अब। अब क्या अब करना चाहिए आत्ममंथन कि कैसे कार्यकर्ता आधारित पार्टी को करारी हार मिली। हार को स्वीकारना चाहिए लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री दतिया परिणामों को लेकर कह रहे हैं कि कांग्रेस की सीट कांग्रेस के ही पास है। हां, हमने जरूर 1700 वोट अधिक पाए हैं पिछली सीट के मुकाबले।
और भी बयान आए कि अब ईवीएम को नहीं कोसा जा रहा, प्रशासन को नहीं कोसा जा रहा। जबकि होना यह चाहिए था कि पूरी विनम्रता के साथ परिणामों को स्वीकारा जाता और उसके हिसाब से आगे की रीति-नीति बनाने की बात कही जाती। हाल के घटनाक्रमों को देखा जाए तो वो भी इन परिणामों के पीछे हैं। जंतर-मंतर का छात्रों काआंदोलन। जिसे जिस तरह से खत्म करने की कोशिश की गई वो जनता को पंसद नहीं आई। आज वो दौर नहीं रहा कि अभी दिल्ली दूर है…। अब तो दिल्ली हाथों में रखे मोबाइल तक ही दूर है। ऐसे में वहां पड़ने वाली एक लाठी यहां पर असर करती है। छात्रों ने परीक्षा परिणाम और पढ़ाई को लेकर ही तो सवाल किए थे। जाहिर है कि सत्ता को अब ये समझना होगा कि पांच किलो राशन से संतुष्ट नहीं होने वाली है। बल्कि युवाओं को उनकी आंखों में पलने वाले सपनों को हकीकत में बदलने की चाहत है। वे न सिर्फ नीट-क्लीन शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं बल्कि वे चाहते हैं कि पढ़ाई का सिस्टम भी सुधरे। योग्य को सराहा जाए। दिल्ली में हुए आंदोलन को पहले तो समाज के कथित निम्न वर्ग का आंदोलन कह कर बदनाम करने की कोशिश की गई लेकिन छात्रों ने दिखा दिया कि धर्म, जाति अपनी जगह है और पढ़ाई अपनी जगह। इसके अलावा हाल के दिनों में आए बड़बोलेपन के बयानों में भी लोगों में नाराजगी है। राममंदिर पिछली कई पीढ़ियों से लोगों की भावनाओं से जुड़ा रहा है। राम मंदिर में चंदा चोरी की घटना पर लोगों में खासा आक्रोश और मायूसी है। ऐसे में इस तरह के बयान देना कि क्या तुमने चंदा दिया था जो सवाल उठा रहे हो जैसे बयान गलती नहीं छिपा सकते। विनम्रता राजनीति का गुण रहा है। पेड़ फलदार हो तो उसे झुकना आना चाहिए। एक बात और ध्यान रखनी होगी कि अब राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने के लिए न हो बल्कि जनता के लिए हो। राज के लिए नीति बनें। धर्म को लेकर भी इस तरह का बर्ताव न किया जाए कि पूरे समाज के रक्षक केवल आप ही हो और आपके अलावा किसी को इस पर बात करने का हक नहीं है। अध्यक्ष जी की रैली में जो नाच रहे थे वो बजरंग बली नहीं बल्कि अंगद थे जैसी बातों से बचना होगा।
कांग्रेस में राहुल गांधी जिस तरह से लोगों से मिल रहे हैं, प्रेस से मिल रहे हैं और लगभग सभी सवालों का जवाब दे रहे हैं वह धीमी गति का समाचार बुलेटिन जरूर लग रहा है लेकिन धीरे-धीरे ही सही एक जगह तो बना ही रहा है। वहीं पीके की बात करें तो पीके ने दिखा दिया है कि जिस दौर में क्षेत्रीय दल खत्म होते माने जा रहे थे वह दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। पीके के जैसा रणनीतिकार कोई नहीं हुआ है और उसने इन परिणामों के जरिए दिखा दिया है कि जनता की नब्ज पकड़ने में वे काफी कुशल हैं। बिहार में नीतीश कुमार, लालू परिवार के बाद अब उन्हे हासिए में करने के लिए प्रंशात किशोर आ गए हैं। आने वाले दिनों में बिहार में विधानसभा में काफी अच्छी सकारात्मक बहसें देखी जा सकती हैं।
एक बात और अब हमें यह स्वीकार करना होगा कि युवा इस देश की राजनीति में काफी अहम योगदान रखता है। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। ऐसे में युवाओं की जरूरतों, मंशाओं को आप नकार नहीं सकते हैं। युवाओं के योगदान को स्वीकारना होगा। उनकी असीमित ऊर्जा का सदुपयोग करना ही होगा। यह जो नई पीढ़ी है उसे नौकरी चाहिए, शिक्षा चाहिए। अच्छा वातावरण चाहिए। उसे हासिए में नहीं ढकेला जा सकता। इमोशनल राजनीति आप नहीं कर सकते और नफरत की राजनीति भी काफी हुई। अब भारत माता को धरती की रानी बनाने और सच में विश्वगुरू बनने के लिए सही अर्थों में कदम उठाने होंगे। अब रोने-धोने की राजनीति नहीं चलेगी। वो पीढ़ी जिसने इमरजेंसी देखी थी, वो पीढ़ी जिसने कांग्रेस के काल के गड्ढे देखे थे वो अब अंतिम पड़ाव की ओर जा रही है। नई पीढ़ी ने इसी सरकार को देखा है। तभी तो 35 साल से चली आ रही सीट पर हार हुई है। अब मीडिया के जरिए इकतरफा प्रचार नहीं किया जा सकता। हमें समझना होगा कि आज हर युवा के हाथ में मोबाइल है और आप मानो या न मानो, किसी भी चैनल में बैठे आईटी एक्सपर्ट, एंकर, विश्लेषक से अधिक जानकारी इन युवाओं के पास है और इन्हें अपनी जानकारी को साझा करना भी आता है। रही सही कसर जैमिनाई, चैट जीपीटी आदि ने पूरी कर दी है।
इतिहास का रोना भी नहीं चलेगा। यदि नेहरू ने कुछ गलत किया, इंदिरा ने इमरजेंसी लगाई, मनमोहन के राज में घोटाले हुए तो आज वे उसका खामियाजा भुगत रहे हैं। उन पर दोष कब तक डाला जाए। बिना जनता को भरोसे में लिए एथेनाल वाले पेट्रोल जैसे फैसले, सड़कों के उद्धाटन के कुछ दिनों के भीतर बह जाना जैसी बातों पर गंभीरता सेसोचना होगा। साथ ही अब्राहम लिंकन के जनता के, जनता द्वारा, जनता का शासन की अवधारणा को स्वीकार करते हुए जनता को हर फैसले में सहभागी बनाना होगा। थोपा जाना सही नहीं होगा। अब अर्बन नक्सल, पाकिस्तानी, देशद्रोही, खालिस्तानी जैसी राजनीति से ऊपर उठना होगा। ये सही है कि भाजपा ने तुष्टीकरण की राजनीति को खत्म किया है। अब हिंदुओं को नकारा नहीं जा सकता लेकिन यही सबकुछ नहीं है। अब फैसले थोपे न जाएं बल्कि उनपर बहस हो और नीर क्षीर का विवेक अपनाकर लागू किए जाएं। चलते-चलते विनोबा भावे का एक कथन कि अगर संसार सरकार को अनुशासन मानकर चलेगा तो कभी शांति और संतोष से नहीं रहेगा।manish tewari


