More
    Homeप्रदेश"मैं 100 रुपये कमाती हूँ, 30 रुपये टैक्स देती हूँ…

    “मैं 100 रुपये कमाती हूँ, 30 रुपये टैक्स देती हूँ…

    *”मैं 100 रुपये कमाती हूँ, 30 रुपये टैक्स देती हूँ… मेरे ही पैसे से वेतन लेकर मेरे ही बच्चों को मारोगे?” जंतर-मंतर से उठी एक आवाज़ और लोकतंत्र से जुड़े सवाल?*

     

    दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान भीड़ में खड़ी एक महिला की आवाज़ अचानक पूरे माहौल का केंद्र बन गई। उसने भावुक होकर कहा, “मैं 100 रुपये कमाती हूँ तो 30 रुपये टैक्स देती हूँ। तनख्वाह से पैसा तो कटता है ना? तुम मेरे ही पैसे से वेतन लेकर मेरे ही बच्चों को मारोगे?” यह वाक्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और इसके साथ देशभर में बहस शुरू हो गई। यह केवल एक महिला की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था से जुड़े सवालों की अभिव्यक्ति थी जिसे लोकतंत्र की नींव माना जाता है।

     

    भारत में हर नौकरीपेशा व्यक्ति, व्यापारी और उपभोक्ता किसी न किसी रूप में टैक्स देता है। आयकर, जीएसटी, पेट्रोल-डीजल पर कर, बिजली बिल, संपत्ति कर और अनेक प्रकार के अप्रत्यक्ष कर सरकार के खजाने में जाते हैं। इन्हीं करों से सरकारें सड़कें बनाती हैं, अस्पताल चलाती हैं, स्कूल संचालित करती हैं, सेना और पुलिस का वेतन देती हैं तथा प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखती हैं। इसलिए जब कोई करदाता यह कहता है कि “मेरे पैसे से व्यवस्था चलती है”, तो उसके पीछे एक वास्तविक आर्थिक आधार भी होता है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि सरकारी कर्मचारी और सुरक्षा बल किसी एक व्यक्ति के नहीं, बल्कि पूरे संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह होते हैं।

     

    जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रतीक रहा है। यहाँ देश के विभिन्न हिस्सों से लोग अपनी मांगें लेकर आते हैं। कई बार ऐसे प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहते हैं और कई बार परिस्थितियाँ तनावपूर्ण हो जाती हैं। जब प्रशासन को लगता है कि कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, तब पुलिस हस्तक्षेप करती है। इसी हस्तक्षेप के दौरान कभी-कभी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जिन पर सवाल उठते हैं कि क्या बल प्रयोग आवश्यक था या उससे बचा जा सकता था।

     

    महिला का बयान इसी संदर्भ में सामने आया। उसके शब्दों में गुस्सा था, पीड़ा थी और व्यवस्था से शिकायत भी थी। उसने महसूस किया कि जिन संस्थाओं को नागरिकों की सुरक्षा करनी चाहिए, वही उनके खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही हैं। लोकतंत्र में इस प्रकार की भावनाएँ असामान्य नहीं हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी जनता और सत्ता के बीच संवाद कमज़ोर पड़ता है, तब ऐसे तीखे प्रश्न सामने आते हैं।

     

    हालाँकि किसी भी घटना को केवल एक पक्ष से देखना भी उचित नहीं होगा। पुलिस और प्रशासन का अपना दायित्व होता है। यदि किसी क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू हो, हिंसा की आशंका हो या सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने का खतरा हो, तो कानून के अनुसार कार्रवाई करना उनकी जिम्मेदारी होती है। कई बार पुलिस का दावा होता है कि उसने न्यूनतम बल का प्रयोग किया, जबकि प्रदर्शनकारी अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाते हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, वीडियो फुटेज और न्यायिक प्रक्रिया ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है।

     

    महिला के बयान में प्रयुक्त “मोदी की सेना” शब्द भी चर्चा का विषय बना। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह उस महिला की व्यक्तिगत राजनीतिक अभिव्यक्ति या आरोप है। इसे किसी तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियाँ संवैधानिक संस्थाएँ हैं और उनका दायित्व कानून के अनुसार कार्य करना है, न कि किसी राजनीतिक दल के निर्देशों पर।

     

    इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र जनता की आवाज़ सुनने, असहमति का सम्मान करने और संवाद बनाए रखने से मजबूत होता है। जब नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, तब असंतोष बढ़ता है। वहीं यदि विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो जाएँ या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाएँ, तो प्रशासन के सामने भी कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि संविधान और कानून की मर्यादा के भीतर रहकर अपने-अपने दायित्व निभाएँ।

     

    महिला के शब्दों ने इसलिए भी लोगों का ध्यान खींचा क्योंकि वे केवल टैक्स की बात नहीं कर रही थीं, बल्कि जवाबदेही की बात कर रही थीं। लोकतंत्र में करदाता केवल पैसा नहीं देता, बल्कि सरकार को अधिकार भी देता है कि वह उस धन का उपयोग जनता के हित में करे। बदले में नागरिक यह अपेक्षा रखते हैं कि शासन पारदर्शी होगा, कानून सब पर समान रूप से लागू होगा और किसी भी कार्रवाई में मानवाधिकारों तथा संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाएगा।

     

    जंतर-मंतर की वह आवाज़ आज भी कई लोगों के मन में गूंज रही है। कोई उसे एक आक्रोशित नागरिक की पुकार मान रहा है, तो कोई उसे राजनीतिक बयान कह रहा है। लेकिन इतना निश्चित है कि उसने शासन, पुलिस, करदाता और लोकतंत्र के रिश्ते पर एक गंभीर चर्चा शुरू कर दी है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसमें सवाल पूछने की जगह होती है और उन सवालों का उत्तर भी संविधान तथा कानून के दायरे में ही तलाशा जाता है।

     

    आख़िरकार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होती है कि सरकार, प्रशासन और नागरिक एक-दूसरे को विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक साझेदार मानें। असहमति का सम्मान, कानून का पालन और जवाबदेही यही वे तीन आधार हैं जिन पर एक मजबूत लोकतंत्र खड़ा रहता है। जंतर-मंतर पर उस महिला द्वारा उठाया गया प्रश्न भावनात्मक अवश्य था, लेकिन उसने यह याद दिलाया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को सुनना भी उतना ही आवश्यक है जितना कानून-व्यवस्था बनाए रखना।rajendra jadon

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Must Read

    spot_imgspot_imgspot_imgspot_img