
1989 में मैंने आरक्षण के विरुद्ध सवर्ण संघर्ष मोर्चे का गठन किया और गांधी वादी तरीके से आंदोलन की शुरुआत की । धीरे धीरे पूरे मध्य प्रदेश और देश के अन्य राज्यों से भी युवाओं ने जुड़ना शुरू कर दिया।
मेरा मक़सद शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना और युवा छात्रों के अभिभावकों भी इस आंदोलन से जोड़ना था ।
फिर सबकी मदद से संविधान में आरक्षण सम्बंधी प्रावधानों में संशोधन करवाना था । इसके लिए पीयूसीएल के श्री कुलदीप नैयर, श्री रजनी कोठारी, श्री लज्जाशंकर हरदेनिया और सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने वकीलों व सेवानिवृत्त न्यायाधीशों का सहयोग लेकर एक ज्ञापन तैयार कर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सोंपना था ।
लेकिन जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ता गया और युवा इससे जुड़ते गए मामला उलझता गया ।
भोपाल में धनवंतरी पार्क में एक मीटिंग आयोजित की गई जिसमें लगभग 500 छात्र सम्मिलित हुए।
जब मैंने अपना भाषण शुरू किया और आंदोलन की रुपरेखा बताना शुरू की तो छात्र उत्तेजित होते हुए डिग्रियां जलाने, सड़कों पर जाम लगाने और आग लगाने जैसी बातें करने लगे। मैंने अपनी तरफ़ से समझाने की बहुत कोशिश की पर युवा भड़क गये। बसों को फूंक दो, चक्का जाम कर दो, डिग्रियां जला दो जैसे नारे लगने लगे ।
मैंने उसी दिन अपनी कोर कमेटी के सदस्यों के साथ मीटिंग कर आंदोलन समाप्त कर दिया ।
इस समय समाचार पत्रों की कटिंग्स के साथ इस पोस्ट को डालने का उद्देश्य यह है कि युवा छात्र यदि भड़क जाते हैं तो उन्हें सम्हालना मुश्किल हो जाता है।
और ऐसे युवाओं को जिनका सीजेपी या कांग्रेस या अन्य किसी दल से कोई सम्बंध नही है। उनका नेतृत्व करने वाला भी कोई नही है। वो तो अचानक दो से चार , चार से चालीस और चालीस से चार सौ हो गये ।
अब इन्हें कौन और कैसे समझायेगा?
@highlight. assrm diney


