
जब एक ‘गोपनीय खबर’ से थर्राया न्यूज़ रूम, सिटी डेस्क से सीधे ‘संदर्भ विभाग’ का वो डिमोशन
(नैवेद्य पुरोहित)
साहब, इस ग्रंथ की पिछली किस्त में आपने पढ़ा कि कैसे दैनिक भास्कर इंदौर के डमी कालखंड के दौरान हमारे गुमनाम नायक प्रदीप जी ने अपनी पैनी सूझबूझ से पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के कान में फुसफुसाकर ‘इंदौर-दिल्ली ट्रेन’ की वो ऐतिहासिक सुर्खी निकाली थी, जिसने पूरे मालवा के मीडिया जगत को हिलाकर रख दिया था। लेकिन उस वक्त किसे पता था कि एक निर्भीक पत्रकार की यही बेबाक रफ़्तार, आगे चलकर न्यूज़ रूम की अंदरूनी सियासत का सबसे बड़ा शिकार बन जाएगी।
आज मैं नैवेद्य पुरोहित, आपके सामने साल 1983 का वो सबसे संवेदनशील, गोपनीय और नाटकीय अध्याय खोलने जा रहा हूँ जहाँ दैनिक भास्कर की चढ़ती सफलता के बीच एक ऐसी खबर ने कदम रखा, जिसने प्रेस रूम की ऑफसेट प्लेटों तक को बदलवा दिया था! आइए, मेरे साथ अटूट विश्वास के ज़रिए 1983 के उस ऐतिहासिक बवंडर में उतरते हैं, जहाँ सत्य की कीमत एक होनहार रिपोर्टर को अपने डिमोशन से चुकानी पड़ी थी।
1983 का वो दौर: डाक डेस्क का परचम और भोपाल तक थरथराता साम्राज्य
साहब, बात 1983 की है दैनिक भास्कर इंदौर ने पूरे मालवा में वो तहलका मचाया था जिसकी गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी। डाक डेस्क पर सागरमल मौला और ऋषि कुमार शुक्ला की पकड़ इतनी मजबूत और अभेद्य हो चुकी थी कि दैनिक भास्कर की प्रसार संख्या ने देखते ही देखते शहर के तमाम स्थापित और पुराने अखबारों के छक्के छुड़ा दिए थे। आसपास के प्रमुख नगरों देवास, रतलाम, धार, खंडवा, महेश्वर, मंदसौर, नीमच और उज्जैन में दैनिक भास्कर का एक अलग ही जलवा और रौब कायम हो चुका था। न्यूज़ रूम से रोज़ एक से बढ़कर एक विस्फोटक खुलासे हो रहे थे। महज़ तीन-चार महीनों के भीतर ही दैनिक भास्कर इंदौर के इस जन-सरोकारी प्रचार-प्रसार के भूकंप की लहरें राजधानी भोपाल के राजनीतिक गलियारों तक को थरथराने लगी थीं।
उज्जयिनी से आई वो ‘विस्फोटक खबर’ और 4-कॉलम की लीड
इसी ज़बरदस्त माहौल के बीच, एक दिन उज्जैन से प्रदीप जी के कुछ बेहद खास और रसूखदार दोस्त इंदौर भास्कर के दफ़्तर आ पहुँचे। उन दोस्तों में एक प्रोफ़ेसर थे, एक एक्साइज़ इंस्पेक्टर थे और कुछ अन्य साथी थे ये वो लोग थे जो आगे चलकर शासन-प्रशासन में बहुत बड़े-बड़े ओहदों पर पहुँचे। उन्होंने दफ़्तर आते ही प्रदीप जी से कहा, “प्रदीप, हम उज्जैन से एक बेहद बिंदास और एक्सक्लूसिव खबर लाए हैं! अगर तुम इसे भास्कर में छपवा दो तो पूरे मध्य प्रदेश में धूम मच जाएगी!”
प्रदीप जी पहले तो समझ नहीं पाए। उन्होंने न्यूज़ डेस्क के एक-दो वरिष्ठ साथियों को वह खबर दिखाई, तो उन्होंने तुरंत अपने हाथ ऊपर कर लिए और कहा, “भाई, यह बेहद खतरनाक पॉलिटिकल मैटर है, सीधे प्रधान संपादक से बात करो!”
उस खबर का मसौदा लेकर प्रदीप जी सीधे प्रधान संपादक यतीन्द्र भटनागर जी के केबिन में पहुँचे। उन्होंने अपने मोटे चश्मे के पीछे से प्रदीप जी को घूरा और तुरंत स्थानीय संपादक गोकुल शर्मा जी को अपने केबिन में बुलवाया। दोनों संपादकों के बीच बंद कमरे में काफी देर तक गहन गुफ़्तगू हुई। यतीन्द्र जी ने प्रदीप जी की ओर देखते हुए बेहद गंभीरता से कहा, “देखो प्रदीप, यह बहुत ही रिस्की और खतरनाक खबर है। इसके छपने से कुछ भी हो सकता है, और फिलहाल इसका कोई पक्का प्रामाणिक आधार भी हमारे हाथ में नहीं है।”
लेकिन खबर में इतनी जान और सच्चाई थी कि हमारे गुमनाम नायक के अटूट विश्वास और दावे पर संपादकों ने जोखिम लेने का फैसला किया। तय हुआ कि यह खबर अगले दिन के अखबार में चार कॉलम में प्रथम पृष्ठ पर लीड हेडलाइन के रूप में लगाई जाएगी!
रात के सन्नाटे में तांडव: जब रमेशचंद्र अग्रवाल जी ने रुकवा दी छपाई
काम तेज़ी से शुरू हुआ।खबर की कंपोज़िंग हुई, चार कॉलम का भव्य लेआउट बना, ऑफसेट की प्लेट मेकिंग तैयार हो गई और प्रेस रूम में प्रिंटिंग मशीन का हरा बटन पुश होने ही वाला था कि अचानक देर रात रमेशचंद्र अग्रवाल जी सीधे प्रेस रूम में आ पहुँचे!
रमेश जी का नियम था कि अखबार छपने से ठीक पहले वे खुद प्रेस में जाकर प्लेटों और लेआउट को देखा करते थे। जैसे ही रमेश जी की पैनी नज़र उस विस्फोटक खबर की सुर्खी पर पड़ी जो उज्जैन से लीड बनकर जा रही थी और जिसका सीधा विनाशकारी असर राजधानी भोपाल की सरकार पर गिरने वाला था। वे आगबबूला हो गए। प्रेस रूम के सन्नाटे में उनकी कड़क आवाज़ गूँजी, “भटनागर भाई सा! यह क्या है? इसे अभी, इसी समय हटवाइए! प्लेट बदलवाइए!”
दैनिक भास्कर के इतिहास में यह पहली बार हुआ था जब छपने के लिए पूरी तरह तैयार फ्रंट पेज को रातों-रात रिजेक्ट कर दिया गया। जल्दबाज़ी में नई ऑफसेट प्लेट तैयार की गई और फ्रंट पेज दोबारा डिज़ाइन हुआ। इसके बाद न्यूज़ रूम में शुरू हुआ असली तांडव! रमेश जी बेहद गुस्से में लाल-पीले होते हुए चिल्लाए, “किसने दी यह खबर? बुलाओ उसे!”
सत्य का पक्ष और ‘संदर्भ विभाग’ में देश निकाला
प्रदीप जी अपनी कुर्सी से उठे और सीना ठोककर रमेश जी के सामने खड़े हो गए। उन्होंने बहुत ही सादगी और स्वाभिमान से कहा, “भाई साहब, यह खबर मैंने दी है.”
रमेश जी ने कड़क लहज़े में कहा, “आपको मुझसे पूछना चाहिए था कि यह खबर छापना उचित है या नहीं!”
प्रदीप जी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए नम्रता से कहा, “जी भाई साहब, मुझे पूरा भरोसा था, इसीलिए मैंने यह खबर दी।”
हालाँकि, उन दोस्तों ने प्रदीप जी को उस खबर से जुड़े कुछ बेहद संवेदनशील फोटोग्राफ्स भी दिए थे, जिन्हें प्रदीप जी ने बुद्धिमानी दिखाते हुए पहले ही अपने पास छुपाकर रख लिया था। माहौल को बिगड़ता देख गोकुल शर्मा जी ने चुपके से प्रदीप जी का हाथ दबाया और इशारे से चुप रहने को कहा।
अगले दिन, वही खबर उज्जैन के एक स्थानीय अखबार में छपी और पूरे प्रदेश में बड़ा राजनीतिक बवंडर उठ खड़ा हुआ। लेकिन दैनिक भास्कर के भीतर इसकी गाज हमारे बेबाक गुमनाम नायक पर गिर चुकी थी। प्रदीप जी को रातों-रात सिटी रिपोर्टिंग की मुख्यधारा से हटा दिया गया और डिमोशन करके ‘संदर्भ विभाग’ की धूल भरी फाइलों के बीच बैठा दिया गया!
अपमान का घूँट और स्वाभिमान का वो मार्ग
साहब, जो रिपोर्टर शहर की नब्ज़ जानता था, उसे अचानक संदर्भ विभाग में बैठकर पेपर कटिंग काटते देखना बेहद दुखद था। प्रदीप जी का मन अंदर से पूरी तरह टूट चुका था, लेकिन घर में पेट और परिवार का सवाल था, इसलिए उन्होंने इस अपमान का घूँट पीकर भी संदर्भ विभाग में पूरी लगन से काम किया।
न्यूज़ रूम के कई सच्चे साथियों ने उनके प्रति गहरी संवेदना जताई। कीर्ति राणा जी ने उन्हें संभाला, ऋषि कुमार शुक्ला, रोमेश जोशी, अशोक कुमट सर और रतलाम से आए रमेश मिश्रा जी ने भी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “प्रदीप, चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन प्रदीप जी के छटपटाते और व्याकुल मन को गोकुल शर्मा जी ने भांप लिया था। उन्होंने एकांत में बुलाकर प्यार से कहा, “प्रदीप, तुम्हारे जैसा तेवर यहाँ घुट जाएगा। जैसे ही तुम्हें बाहर कहीं भी कोई अच्छा अवसर मिले, तुम बिना झिझक यहाँ से निकल जाना!”
साहब, आज दशकों बीत जाने के बाद भी वह विस्फोटक खबर आखिर क्या थी, उसे इतिहास के पन्नों में आज भी ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ और पूरी तरह गोपनीय रखना ही उचित है, क्योंकि पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांत यही कहते हैं। लेकिन इस खबर ने दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम के उस सबसे कर्मठ नायक को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया था, जहाँ से उनकी ज़िंदगी एक बिल्कुल नए और अकल्पनीय सफर की ओर मुड़ने वाली थी!
(अगली किस्त में पढ़िएगा: जब संदर्भ विभाग की खामोशी के बीच अचानक डाकिया एक ऐसा टेलीग्राम लेकर आया जिसने प्रदीप सिंह राव जी की पूरी ज़िंदगी बदल दी! बस्तर के सुदूर बीहड़ जंगलों से शासकीय कॉलेज का वो बुलावा, परिवार का रोना, और इंदौर-बिलासपुर एक्सप्रेस के पायदान पर खड़े होकर रोते हुए इंदौर को अलविदा कहने का वो मर्मस्पर्शी सच! जानने के लिए पढ़ते रहिए इस महागाथा की अगली किस्त तब तक इंतज़ार कीजिए अगली कड़ी का…!)
Rao Pradeep Singh Dainik Bhaskar Kirti Rana Ramesh Mishra Chanchal
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