मोदी जी आपसे भी आगे निकल गए हमारे दायजी सा ?
हम मालवा के लोग हैं साहब, यहाँ रिश्तों में भी मिठास होती है और राजनीति में भी नमकीन ?
हम अपने बड़े भैया को प्रेम से “दायजी सा” कहते हैं। कल हमारे दायजी सा सिंगरौली पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने ऐसा आर्थिक और सांस्कृतिक संदेश दिया कि पूरा मध्यप्रदेश भावुक भी हो गया और मुस्कुरा भी पड़ा।
घटना बड़ी साधारण थी, लेकिन संदेश बहुत बड़ा। दायजी सा ने 10 रुपये का समोसा भी लिया…आधा लिया । यानी कुल उपभोग हुआ 5 रुपये का।
लेकिन भुगतान किया पूरे 500 रुपये।
अब इसे कोई अर्थशास्त्र कहे, कोई समाजवाद कहे, कोई चुनावी आत्मीयता कहे या मालवा की परंपरा… पर हम तो इसे “दिलदार मालवापन” कहेंगे।
प्रधानमंत्री जी ने कुछ दिन पहले बंगाल में 10 रुपये की झालमुढ़ी खाकर उसकी चर्चा पूरे देश में करवा दी थी। फिर इटली में 1 रुपये वाली मेलोडी ने भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में मिठास घोल दी। लेकिन हमारे दायजी सा ने तो इन सबको पीछे छोड़ दिया।
मोदी जी ने 10 की झालमुढ़ी खाई और 10 ही दिए।
यह तो सीधा गुजरती व्यापार हुआ।
लेकिन मालवा का आदमी व्यापार नहीं करता, वह भावनाओं में निवेश करता है।
हमारे यहाँ आधा समोसा खाने के बाद 500 रुपये देना केवल भुगतान नहीं होता, यह संदेश होता है कि “भैया पेट से ज्यादा दिल से खाते हैं।”
गुजरात का व्यापारी हिसाब में तेज होता है वहाँ 10 का मतलब 10। लेकिन मालवा का आदमी भाव में जीता है।
यहाँ 5 रुपये की चीज़ पर 500 खर्च कर देना कोई घाटा नहीं, “इज्जत का ब्याज” माना जाता है।
अब सोशल मीडिया पर लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।
कोई कह रहा है कि यह गरीब दुकानदार के सम्मान का प्रतीक था।
कोई कह रहा है कि यह मालवा की उदारता है। और कुछ विपक्ष वाले इसे “समोसा मॉडल ऑफ इकोनॉमी” बता रहे हैं।
लेकिन सच पूछिए तो इस देश की राजनीति अब भाषणों से कम और नाश्तों से ज्यादा चलने लगी है।
कभी चाय पर चर्चा, कभी झालमुढ़ी संवाद, कभी मेलोडी कूटनीति और अब आधा समोसा दर्शन।
देश का आम आदमी पेट्रोल, गैस और महंगाई के बीच अपने पूरे महीने का हिसाब नहीं बना पा रहा…?
और नेता लोग आधे समोसे में पूरा राजनीतिक संदेश दे रहे हैं।
वैसे दायजी सा ने आधा समोसा खाकर एक और बड़ा संदेश दिया है “त्याग।”
मतलब सत्ता में रहकर भी पूरा समोसा नहीं खाना। संयम रखना। बाकी आधा शायद जनता के लिए छोड़ देना।
यह दृश्य देखकर सिंगरौली का समोसे वाला भी सोच में पड़ गया होगा कि “इतना मुनाफा तो मैंने दिवाली में भी नहीं कमाया।”
मालवा की संस्कृति यही है साहब…यहाँ आदमी अगर प्रेम में आ जाए तो आधे समोसे के बदले पूरा दिल दे देता है।
अब मोदी जी को भी समझना चाहिए कि राजनीति केवल ब्रांडेड सूट और झालमुढ़ी तक सीमित नहीं है।
कभी मालवा आइए, यहाँ लोग आधा खाते हैं और पाँच गुना लौटा देते हैं।
यही मालवा है… जहाँ स्वाद से ज्यादा सम्मान परोसा जाता है।
Rajendra singh jadon


