नारद जी के वंशजों पर कॉर्पोरेट घरानों,
फर्जी पत्रकारों और भ्रष्ट नौकरशाहों का कब्जा
भोपाल। कुछ लोगों ने नारद जयंती 2 मई को मना ली तो कुछ विद्वानों ने 3 मई को मनाई। भारतीय दर्शन की यह बड़ी विडंबना है की हमारे यहां जितने भी पंचांग प्रचलन में हैं, वे सब सनातन में एकरूपता की वजाय अपनी डफली अपना राग अलापने का काम करते हैं। नतीजतन अनेक हिंदू त्योहारों की तरह बुद्धिजीवियों का त्यौहार नारद जयंती भी दो दिनों में विभक्त हो गई। खैर, यहां मसला कुछ और है।
हिंदू जीवन दर्शन में नारद जी को पत्रकारों के पूर्वज के रूप में स्थापित किया गया है। एक ऐसे पत्रकार जो बगैर भय, दबाव अथवा प्रलोभान के सूचनाओं को उस गंतव्य तक पहुंचा दिया करते थे, जहां उसकी अत्यावश्यकता होती थी। इन सात्विक प्रयासों में कई बार नारद मुनि बड़े-बड़े संकटों में भी उलझे। किंतु उन्होंने अपनी कार्य पद्धति को कलंकित नहीं होने दिया। यह बात और है की लंबे समय तक दाऊद इब्राहिम जैसे अपराधियों के पैसों से पोषित होने वाला बॉलीवुड इस श्रेष्ठ चरित्र को एक मुस्टंडा, चुगलखोर, गैर जिम्मेदार, मजाकिया पात्र के रूप में ही प्रस्तुत करता रहा।
एक पत्रकार होने के नाते मैं देवर्षि नारद की उत्कृष्टताओं को उल्लिखित करने में अपने शब्द ज्ञान को अपर्याप्त ही मानता हूं। क्योंकि नारद मुनि यदि पत्रकार हैं तो ऐसे पत्रकार हैं जो देव, दानव, नाग, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य आदि समाजों के बीच कहीं मान्य तो कहीं अमान्य पहुंच बनाए रखते हैं। यूं तो सभी समाजों की सज्जन शक्ति के बीच नारद मुनि का पर्याप्त सम्मान रहा है। किंतु जो लोग अज्ञानता वश और अपने झूठे अहंकार के चलते उनकी अवमानना करते थे, नारद मुनि बलात् वहां भी पहुंच जाया करते थे। लक्ष्य एक ही होता था, संबंधित को उसके कुकर्मों से अवगत कराना और उसे सुधरने की हिदायत देना। साथ में ताकीद करना कि यदि पाप पूर्ण कृत्य बंद ना हुए तो सर्वनाश सुनिश्चित है। सत्य अर्थात धर्म के प्रति उनकी निष्ठा का यह आलम रहा की कई बार उन्हें समर्थ विभूतियां से शापित भी होना पड़ गया। किंतु नारद मुनि ना डरे ना डिगे।
लेकिन आज की पत्रकारिता के विद्रूप स्वरूप को देखकर मन क्लांत हो उठता है। क्योंकि जो निष्ठावान, संघर्षशील और शब्द सेवी पत्रकार हैं, उनमें से अधिकांश जिंदा रहने के लिए संघर्षरत ही बने हुए हैं। क्योंकि इनकी आर्थिक विपन्नता को बेईमानी के तिरस्कार से कलंकित किया जाता रहा है। मसलन – यह दो कौड़ी का पत्रकार, कुछ काम धंधा होता नहीं, सो बस कलम घिसता कागज बर्बाद करता रहता है। पत्रकारिता के धवल परिवेश पर अब कॉर्पोरेट घरानों का कब्जा है। अब महान समाचार पत्र वह है जो बहुरंगी, बहु पृष्ठीय और चमक दमक से परिपूर्ण है। प्रभावशाली पत्रकार वह है जो कम से कम चार पहिया वाहन का स्वामी तो होना ही चाहिए। यदि कार फॉर्च्यून हो फिर कहने की क्या! फिर भी एक सत्य लिखने से नहीं चूकूंगा। मैंने सत्य के प्रति समर्पित संसाधन विहीन पत्रकारों का वह आभामंडल देखा है कि उनके आगमन पर आईएएस, आईपीएस जैसे अफसर अपने कार्यालय के बाहर निकल कर उनकी सम्मानजनक अगवानी किया करते थे। किंतु आज आईएएस आईपीएस तो बहुत बड़ी हस्ती हो गए, अब तो भ्रष्ट, निकम्मे, जन विरोधी, कामचोर किस्म के छुटभैये अधिकारी कुर्सी पर बैठकर बात करते हैं और स्वयंभू वरिष्ठ पत्रकारों को उनके सामने खड़े-खड़े चिरौरी करते देखना नसीब हो जाता है।
कारण स्पष्ट है, आम आदमी के हित की आवाज उठाने वाले जो शब्द सेवी पत्रकार हैं उन्हें सदैव ही अकेला करके मारा गया। भ्रष्ट और अकर्मण्य नौकरशाही तथा पत्रकारिता के भेष में मोबाइल कैमरे लेकर पत्रकारों के बीच घुस आए धंधेबाजों के गठजोड़ ने मूल पत्रकारों को इतना प्रताड़ित किया कि कुछ हार थक कर पलायन कर गए, बाकी ने अपना सम्मान बचाए रखने के लिए विद्रूप दिखाई देने वाले इस पवित्र क्षेत्र को ही तिलांजलि दे दी।
लेकिन इस देश में लोकतंत्र जीवित है, गलत के प्रति अंदरुनी भय जीवित है, भ्रष्टाचार को ईमानदारी का जामा पहनाए जाने की विवशता बनी हुई है, इसका मतलब सच्ची पत्रकारिता अभी मरी नहीं है। कम तादाद में ही सही, वह जीवित है।
सच कहूं तो पत्रकारिता को लेकर निर्मित विडंबना पूर्ण परिस्थितियों के लिए सरकार भी कम दोषी नहीं है। बल्कि मैं शपथ पूर्वक डंके की चोट पर कहता हूं की सर्वाधिक दोष सरकारी नीतियों का ही है। सरकारों ने महिलाओं, किसानों, युवाओं, जातियों, कर्मचारियों आदि आदि वर्गों के लिए अनेक ऐसी योजनाएं बनाई हैं,जिनका सीधा-सीधा लाभ संबंधित वर्गों को मिलता है। लेकिन पत्रकारों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं है जो उसे सीधे-सीधे लाभ पहुंचती हो। जैसे अधिमान्यता – इसे प्राप्त करने के लिए चर्चित अखबार मालिक, जनसंपर्क संचालनालय अधिकारी, अथवा सरकार वाले राजनीतिक दल के सामर्थ्यवान नेता का चाटुकार होना जरूरी है। फिर भले ही अधिमान्यता से लाभान्वित व्यक्ति का पत्रकारिता के ‘प’ से भी कोई लेना-देना ना हो। नतीजतन सुदूर क्षेत्रों में जमीनी पत्रकारिता कर रहे 90% से ज्यादा कलम के असली सिपाही अधिमान्यता विलग बने हुए हैं। जबकि 10% अधिमान्यों में कबाड़ी, पान वाले, पंचर जोड़ने वाले, विशुद्ध ब्लैकमेलर, सामाजिक रूप से तरस्कृत पूरी तरह से अयोग्य लोग शोभायमान बने हुए हैं। इस तरह यह परिदृश्य ईमानदार पत्रकारिता को हतोत्साहित करता है।
देश का यही एकमात्र ऐसा वर्ग है जो प्रिंट, सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए 99% अवैतनिक रूप से कार्य कर रहा है। यदि शासन वाकई में पत्रकारों का हितैषी है तो इन्हें जिला जनसंपर्क कार्यालयों को माध्यम बनाकर, इनके द्वारा प्रकाशित निष्पक्ष समाचारों के आधार पर इन्हें अनुग्रहित कर सकता है। इनके लिए मुफ्त राशन, आश्रित परिवार का असीमित मुफ्त इलाज, बच्चों की निशुल्क शिक्षा, मुफ्त ना सही अफॉर्डेबल आवास, रेलवे प्रवास में छूट आदि योजनाएं अलग से बनाई जानीं आवश्यक हैं। खासकर सत्य निष्ठ पत्रकारों के खिलाफ शासकीय कायदों की अवहेलना करते हुए नियम विरुद्ध पुलिस प्रकरण पंजीबद्ध किये जाना आतंक का पर्याय बना हुआ है। शासन ऐसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ निलंबन और लाइन अटैच से आगे बढ़कर इन्हें व्यक्तिगत रूप से आर्थिक, शारीरिक दंड देने का प्रावधान रचे, इन्हें अदालत के हवाले करे तो कुछ बात बने। वर्ना तो शब्द सेवी पत्रकार हतोत्साहित हैं तथा पत्रकारिता के भेष में महंगे मोबाइल बेश कीमती कैमरे लेकर पत्रकारों के बीच घुस आए धंधेबाजों ने चकाचौंध का वातावरण बना रखा है। ऐसे में कोई महर्षि नारद जयंती मनाता है, वहां तक तो ठीक है। लेकिन यदि इस दौरान पत्रकारता दिवस या हिंदी पत्रकारिता दिवस के नाम पर शुभकामनाएं और बधाइयां दी जाती हैं तो यह उन 99% पत्रकारों का अपमान है, जो जमीनी स्तर पर अवैतनिक और विपन्न रहते हुए देश सेवा में समर्पित बने हुए हैं।
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Cm dubey


