
मोहन सरकार की ग़ज़ब शिक्षा व्यवस्था?
शिक्षक गायब, स्कूल बदहाल और भविष्य अंधकार में… क्या यही है विकसित मध्य प्रदेश की तस्वीर?
लेख – राजेंद्र सिंह जादौन
“शिक्षा किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी होती है।” यह वाक्य हर सरकार कहती है, लेकिन मध्य प्रदेश की मौजूदा तस्वीर कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार लगातार शिक्षा सुधार, डिजिटल क्लास, स्मार्ट स्कूल और नई शिक्षा नीति के सफल क्रियान्वयन के दावे कर रही है। दूसरी ओर वर्ष 2026 में सामने आए आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायालय में रखे गए दस्तावेज़ इन दावों की वास्तविकता उजागर कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने हाल ही में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। यह नोटिस किसी राजनीतिक आरोप के कारण नहीं, बल्कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट पर आधारित जनहित याचिका पर जारी हुआ है। याचिका में दावा किया गया है कि प्रदेश के 1,895 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है। इनमें 1,379 स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चे तो पढ़ने आते हैं, लेकिन पढ़ाने वाला एक भी शिक्षक नहीं है। हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए सरकार से जवाब तलब किया है।
यह आंकड़ा केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि शिक्षा के अधिकार पर सीधा प्रहार है। संविधान का अनुच्छेद 21(क) प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। लेकिन यदि स्कूल में शिक्षक ही नहीं होगा तो अधिकार केवल कागज पर ही रह जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा कैसे हुआ? प्रदेश में शिक्षा विभाग का बजट हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का है। नई इमारतें बन रही हैं, स्मार्ट क्लास के उद्घाटन हो रहे हैं, डिजिटल शिक्षा के विज्ञापन दिए जा रहे हैं, लेकिन जिन बच्चों के सामने शिक्षक ही नहीं है, उनके लिए यह सब किस काम का?
सीएजी की रिपोर्ट में केवल शिक्षक विहीन स्कूलों की बात नहीं कही गई। रिपोर्ट ने शिक्षा विभाग की पूरी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 435 ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है, फिर भी वहां शिक्षक पदस्थ हैं। दूसरी ओर 320 स्कूलों में स्वीकृत पद ही नहीं थे, फिर भी शिक्षकों की पदस्थापना कर दी गई। यह दर्शाता है कि प्रदेश में शिक्षक नियुक्ति और तैनाती की व्यवस्था संतुलित नहीं बल्कि अव्यवस्थित है।
सीएजी ने अपने ऑडिट में यह भी पाया कि राज्य सरकार विद्यालयों में निर्धारित प्यूपिल-टीचर रेशियो (PTR) बनाए रखने में विफल रही। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षक रिक्तियों का प्रतिशत शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक पाया गया, जिससे सबसे अधिक नुकसान ग्रामीण और आदिवासी बच्चों को हुआ।
यदि यही स्थिति बनी रही तो प्रदेश की आने वाली पीढ़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे टिकेगी? निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पास विकल्प हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब, किसान, मजदूर और आदिवासी परिवारों के बच्चों के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
2026 में जारी परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) 2.0 ने भी मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा जारी इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश देश के 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 27वें स्थान पर पहुंच गया। यानी शिक्षा सुधार के दावों के बावजूद प्रदेश लगातार पिछड़ता जा रहा है। रिपोर्ट में सीखने के परिणाम, शिक्षक उपलब्धता, बुनियादी सुविधाएं और प्रशासनिक दक्षता जैसे कई मानकों पर राज्य का प्रदर्शन कमजोर रहा।
यह स्थिति तब है जब सरकार शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बताती है। सवाल यह है कि यदि प्राथमिकता वास्तव में शिक्षा होती तो क्या हजारों स्कूल बिना शिक्षक के चलते?
जनहित याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि कई जिलों में जिला शिक्षा अधिकारियों ने निर्धारित निरीक्षण तक नहीं किए। इंदौर, मंडला और श्योपुर जैसे जिलों में निरीक्षण व्यवस्था लगभग ठप रही। शिक्षा विभाग के 14 अधिकारियों को दूसरे विभागों में संलग्न कर दिया गया जबकि उनका वेतन शिक्षा विभाग से ही दिया जाता रहा। इस पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। जब विभाग के पास स्वयं पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं तो अधिकारियों को दूसरे विभागों में भेजने का औचित्य क्या था?
सरकार अक्सर नई योजनाओं की घोषणा करती है। कभी सीएम राइज स्कूल, कभी डिजिटल एजुकेशन, कभी आधुनिक प्रयोगशालाएं। लेकिन शिक्षा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ शिक्षक होता है। शिक्षक के बिना कोई भी स्कूल केवल एक इमारत बनकर रह जाता है।
प्रदेश के गांवों में आज भी ऐसे अनेक विद्यालय हैं जहां एक ही शिक्षक पूरी प्राथमिक शाला संभाल रहा है। कहीं एक शिक्षक पांच कक्षाओं को पढ़ा रहा है तो कहीं बच्चे बिना पढ़ाई के केवल मध्यान्ह भोजन और उपस्थिति के लिए स्कूल आते हैं। यह स्थिति किसी विकसित राज्य की नहीं कही जा सकती।
मोहन सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल विज्ञापनों से मजबूत नहीं होती। शिक्षा मजबूत होती है योग्य शिक्षक, नियमित निरीक्षण, पारदर्शी भर्ती और जवाबदेह प्रशासन से। यदि शिक्षक तैनाती में ही असंतुलन रहेगा तो शिक्षा सुधार का कोई भी मॉडल सफल नहीं होगा।
हाईकोर्ट का नोटिस सरकार के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि अब शिक्षा व्यवस्था की कमियां न्यायपालिका की निगरानी में हैं। अवसर इसलिए कि सरकार चाहे तो इस पूरे तंत्र में व्यापक सुधार कर सकती है। शिक्षक रिक्तियां भर सकती है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिकता से नियुक्तियां कर सकती है और तैनाती व्यवस्था को पारदर्शी बना सकती है।
आज मध्य प्रदेश का हर अभिभावक एक ही सवाल पूछ रहा है क्या उसका बच्चा केवल स्कूल जाएगा या वास्तव में पढ़ भी पाएगा? क्या सरकार उसे शिक्षक दे पाएगी? क्या गांव का बच्चा भी वही शिक्षा पाएगा जिसका सपना संविधान ने देखा था?
शिक्षा केवल परीक्षा पास कराने का माध्यम नहीं है। शिक्षा लोकतंत्र की नींव है। यदि उसी नींव में दरार पड़ जाएगी तो भविष्य की पूरी इमारत कमजोर हो जाएगी।
आज मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़ा संकट स्कूल भवनों का नहीं, बल्कि शिक्षकों का है। जब 1,379 स्कूलों में छात्र मौजूद हों और शिक्षक न हों, जब 1,895 स्कूल शिक्षकविहीन हों, जब 435 खाली स्कूलों में शिक्षक तैनात हों, जब राज्य राष्ट्रीय शिक्षा सूचकांक में 27वें स्थान पर पहुंच जाए, तब यह मान लेना चाहिए कि समस्या छोटी नहीं बल्कि व्यवस्था के मूल में है।
मोहन सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं। पहला विज्ञापनों और दावों का सिलसिला जारी रखा जाए। दूसरा स्कूलों में शिक्षक पहुंचाए जाएं, शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय की जाए और बच्चों के भविष्य को राजनीति से ऊपर रखा जाए।
क्योंकि इतिहास सरकारों को उनके भाषणों से नहीं, बल्कि उनके स्कूलों से याद रखता है। और यदि स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे, तो आने वाली पीढ़ियां यह जरूर पूछेंगी कि आखिर उनके भविष्य का जिम्मेदार कौन था?
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