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    पत्रकार का काम सवाल करना है, लेकिन फ्री की सुविधाओं का खमियाजा दूसरे पत्रकार क्यों भुगतें?

    *पत्रकार का काम सवाल करना है, लेकिन फ्री की सुविधाओं का खमियाजा दूसरे पत्रकार क्यों भुगतें?*

     

    संपादकीय – राजेन्द्र सिंह जादौन

     

    पत्रकार का काम सवाल करना है। सवाल सत्ता से हो, सरकार से हो, मुख्यमंत्री से हो या किसी मंत्री से सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार ही नहीं, उसकी जिम्मेदारी भी है। लेकिन आज देश में पत्रकारिता के सामने एक अजीब दौर खड़ा है। कहीं सवाल पूछने पर धमकी के आरोप लग रहे हैं तो कहीं पत्रकारों को सत्ता की सुविधाओं के इतने करीब कर दिया गया है कि सवाल पूछने और सत्ता की आरती उतारने के बीच का फर्क ही मिटता जा रहा है।

     

    उत्तर प्रदेश से सामने आया एक मामला इसी चिंता को और गंभीर बनाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने वाली एक पत्रकार ने आरोप लगाया है कि सवाल पूछने के बाद उसे भाजपा कार्यालय में घेरकर धमकाया गया, घर पर बुलडोजर चलाने की बात कही गई, एलआईयू के पीछे पड़ने की बात कही गई और बाद में उसे चैनल से भी निकाल दिया गया। पत्रकार ने खुद को डरा हुआ बताया है।

     

    इन आरोपों की सच्चाई जांच का विषय है और जांच होनी भी चाहिए। लेकिन यदि किसी पत्रकार को केवल सवाल पूछने के कारण डराया या धमकाया गया है तो यह सिर्फ उस पत्रकार का मामला नहीं है। यह उस पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का सवाल है जिसमें पत्रकार को जनता की ओर से सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार मिला हुआ है। लेकिन इसी देश में एक दूसरा उदाहरण मध्यप्रदेश का भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

     

    कल ही भोपाल भाजपा कार्यालय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पत्रकारों से बातचीत की। पत्रकारों ने सवाल किए और मुख्यमंत्री ने उनके जवाब दिए। इसी दौरान जब भाजपा के एक मीडिया प्रभारी ने माइक उठाकर पत्रकार को रोकने की कोशिश की तो मुख्यमंत्री ने खुद हस्तक्षेप करते हुए कह “पूछने दो।” यह छोटा-सा वाक्य पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ा संदेश है।

     

    मुख्यमंत्री को सवाल पसंद आएं या न आएं, सवाल सरकार के पक्ष में हों या विपक्ष में, सवाल तीखा हो या असहज करने वाला लोकतंत्र में पत्रकार को सवाल पूछने दिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री का काम हर सवाल से सहमत होना नहीं है, लेकिन सवाल का जवाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

     

    मध्यप्रदेश की राजनीतिक संस्कृति में यह परंपरा रही है कि मुख्यमंत्री चाहे कितना भी बड़ा राजनीतिक खिलाड़ी क्यों न हो, पत्रकारों के सवालों का सामना करते रहे हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह रहे, सरकार और मीडिया के रिश्तों में उतार-चढ़ाव भी आए, लेकिन सार्वजनिक रूप से सवाल पूछने की जगह बनी रही।

     

    मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह रहे, उमा भारती रहीं, बाबूलाल गौर रहे, शिवराज सिंह चौहान रहे और अब डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं। अलग-अलग विचारधारा, अलग-अलग राजनीतिक शैली और अलग-अलग व्यक्तित्व के बावजूद पत्रकारों से संवाद की परंपरा बनी रही है।

     

    यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

     

    मुख्यमंत्री पत्रकार के सवाल से नाराज हो सकते हैं, जवाब देने से बच सकते हैं, सवाल का राजनीतिक जवाब दे सकते हैं, आंकड़े रख सकते हैं, पत्रकार के तर्क को चुनौती दे सकते हैं लेकिन पत्रकार को सवाल पूछने से रोकना लोकतंत्र को कमजोर करता है। और यहां एक दूसरी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

     

    पत्रकारिता में सबसे बड़ा संकट सिर्फ सत्ता का दबाव नहीं है। संकट तब भी पैदा होता है जब कुछ पत्रकार सत्ता की सुविधाओं के इतने आदी हो जाते हैं कि उनकी सुविधा का खमियाजा बाकी पत्रकारों को भुगतना पड़ता है।

     

    फ्री की गाड़ी, फ्री का आवास, फ्री की यात्रा, विशेष पास, सरकारी कार्यक्रमों में विशेष महत्व, विज्ञापन की उम्मीद, सत्ता के गलियारों में सीधी पहुंच इन सुविधाओं में कोई सुविधा गलत नहीं है यदि वह नियमों के तहत सभी पात्र पत्रकारों को समान रूप से मिले। लेकिन जब सुविधा पत्रकारिता की स्वतंत्रता की कीमत बन जाए, तब समस्या शुरू होती है।

     

    जिस पत्रकार को हर सुविधा चाहिए, उससे सत्ता के खिलाफ सवाल पूछने की उम्मीद कैसे की जाए?

     

    और जब एक पत्रकार सवाल पूछता है तो बाकी पत्रकारों पर भी उसका असर पड़ता है। सत्ता को लगता है कि मीडिया का एक हिस्सा सवाल नहीं, संबंधों की भाषा समझता है। फिर ईमानदार पत्रकार भी उसी नजर से देखे जाते हैं। यही वह खमियाजा है जिसकी कीमत पत्रकारिता के ईमानदार हिस्से को चुकानी पड़ती है।

     

    पत्रकार सरकार का विरोधी नहीं होता। पत्रकार विपक्ष का कार्यकर्ता भी नहीं होता। पत्रकार का काम सत्ता और विपक्ष दोनों से सवाल करना है। लेकिन सत्ता पक्ष में बैठे लोग यदि हर आलोचना को विरोध और हर सवाल को दुश्मनी मानने लगें तो लोकतंत्र का संवाद कमजोर हो जाता है।

     

    मध्यप्रदेश की अच्छी बात यही है कि यहां अभी संवाद की खिड़की खुली हुई दिखाई देती है। भोपाल भाजपा कार्यालय में मुख्यमंत्री का पत्रकार को यह कहना कि “पूछने दो” इसी लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रतीक है।

     

    इस एक वाक्य को किसी राजनीतिक दल के प्रचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे लोकतांत्रिक व्यवहार के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए। आज देश के हर मुख्यमंत्री, मंत्री और राजनीतिक दल के पदाधिकारी को यही बात समझने की जरूरत है पत्रकार सवाल पूछेगा, आप जवाब दीजिए।

     

    पत्रकार को रोकने के लिए माइक मत छीनिए। सवाल पसंद नहीं है तो जवाब दीजिए।सवाल गलत है तो तथ्य रखिए।सवाल राजनीतिक है तो राजनीतिक जवाब दीजिए।

    लेकिन सवाल पूछने वाले पत्रकार को डराने की कोशिश मत कीजिए।

     

    क्योंकि पत्रकार का माइक बंद करने से सवाल खत्म नहीं होते। सवाल जनता के बीच चले जाते हैं और फिर सोशल मीडिया से लेकर चौराहे तक पूछे जाते हैं।

     

    मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को भी अपनी इस परंपरा को बचाए रखना होगा। सरकार से संवाद रहे, लेकिन दूरी भी रहे। सम्मान रहे, लेकिन सवाल भी रहें। सुविधाएं हों तो नियम के तहत हों, लेकिन सुविधाओं के बदले खबरों का सौदा न हो।

    क्योंकि पत्रकारिता की असली पहचान सरकारी सुविधा से नहीं, सवाल की धार से होती है।

     

    जिस दिन पत्रकार को यह डर लगने लगे कि सवाल पूछा तो सुविधा चली जाएगी, विज्ञापन बंद हो जाएगा या नौकरी चली जाएगी, उस दिन पत्रकारिता सिर्फ नाम की स्वतंत्र रह जाएगी।

     

    इसलिए मध्यप्रदेश की राजनीतिक संस्कृति में मौजूद संवाद की इस परंपरा को मजबूत करना चाहिए। मुख्यमंत्री हों या मंत्री, भाजपा हो या कांग्रेस, सत्ता में कोई भी हो पत्रकार को सवाल पूछने दिया जाना चाहिए।

     

    और पत्रकारों को भी तय करना होगा कि वे सत्ता के साथ खड़े हैं या जनता के सवाल के साथ। सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, मुख्यमंत्री बदलते रहते हैं, लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी नहीं बदलती।

     

    पत्रकार का काम सत्ता की आरती उतारना नहीं, सत्ता से जनता के सवाल पूछना है। और मध्यप्रदेश में कल मुख्यमंत्री का एक छोटा-सा वाक्य “पूछने दो” कम से कम यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने की जगह अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बस जरूरत इतनी है कि पत्रकार भी अपनी स्वतंत्रता बचाए रखेंp और सत्ता भी सवालों से डरना बंद करे।

     

    @highlight

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