भारतीय OTT मंचों पर ऐसी वेब-श्रंखलाओं की बाढ़ है जिनमें गाली-गलौज, यौन दृश्य, नग्नता, मादक पदार्थों के सामान्यीकरण और हिंसा को लगभग अनिवार्य कलात्मक तत्व बना दिया गया है।
दूसरी ओर जब वही दर्शक पाकिस्तान के लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिक देखता है तो उसे भाषा संयमित दिखाई देती है, पारिवारिक संबंध अपेक्षाकृत मर्यादित दिखाई देते हैं, कैमरे की दृष्टि अधिक शालीन प्रतीत होती है और संवादों में घरेलू संवेदनाएँ प्रमुख दिखाई देती हैं।
तब भारतीय OTT के सामने तो पाकिस्तानी सीरियल स्वर्ग लगते हैं।
शायद उद्देश्य भी यही हो।
क्योंकि इसके भीतर समकालीन सांस्कृतिक राजनीति, बाज़ार, मीडिया-उद्योग और सॉफ्ट पावर के अनेक प्रश्न छिपे हुए हैं।
और मैं सभी सीरियलों के बारे में कोई generalisation नहीं कर रहा। कुछ उत्कृष्ट धारावाहिक भारत के OTT पर हैं।
यह भी ठीक है कि दोनों माध्यमों के नियामक ढाँचे, दर्शक-वर्ग, आर्थिक मॉडल और अभिव्यक्ति की सीमाएँ भिन्न हैं और इसलिए प्रत्यक्ष तुलना करते समय हमें इस अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।
फिर भी प्रश्न बना रहता है कि भारतीय OTT में गालियाँ इतनी अधिक क्यों हैं? क्या भारत का वास्तविक समाज इतना ही अशिष्ट हो गया है? क्या हर पुलिस अधिकारी, हर छात्र, हर पत्रकार, हर अपराधी और हर सामान्य नागरिक लगातार अपशब्दों में ही बात करता है? यदि नहीं, तो यह शैली कहाँ से आई?
इसका एक उत्तर वैश्विक स्ट्रीमिंग संस्कृति में मिलता है। पश्चिमी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्मों ने “रियलिज़्म” का एक ऐसा सौंदर्यशास्त्र विकसित किया जिसमें यह मान लिया गया कि यदि पात्र गालियाँ नहीं देंगे, यदि यौन दृश्य नहीं होंगे, यदि हिंसा अत्यधिक दृश्यात्मक नहीं होगी, तो कथा “वास्तविक” नहीं लगेगी। धीरे-धीरे भारतीय निर्माताओं ने भी इसी व्याकरण को आधुनिकता का पर्याय मान लिया।परिणाम यह हुआ कि अनेक रचनाओं में गाली चरित्र-निर्माण का उपकरण नहीं रही; वह शैलीगत फैशन बन गई।
यह कहने का औचित्य नहीं कि पाकिस्तानी धारावाहिकों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनेक मामलों में सीमित है और राजनीतिक आलोचना, धार्मिक प्रश्नों या कुछ सामाजिक विषयों पर रचनात्मक स्वतंत्रता भारत की तुलना में अधिक नियंत्रित है क्योंकि भारत को ऐसा करने से किसी ने रोका नहीं है।
उधर पाकिस्तानी सीरियल इतनी मीठी मीठी छवि बनाते हैं क्योंकि जिस बुर्के पर वहां इतना जोर दिया जाता है, वह उन सीरियल्स में कहीं दिखते नहीं। जहाँ सार्वजनिक जीवन पर इस्लामी रूढ़िवाद का गहरा प्रभाव है, और जहाँ महिलाओं के लिए बुर्के और पर्दे पर विशेष बल दिया जाता है, वहाँ के लोकप्रिय धारावाहिक देखो तो वहाँ महिला पात्र आधुनिक सलवार-कमीज़, रंगीन परिधान, खुला चेहरा, मेकअप और सामाजिक सक्रियता के साथ दिखाई देती हैं।
यही “सॉफ्ट पावर” की कूटनीति है। किसी देश की फ़िल्में, संगीत, साहित्य और धारावाहिक उसके बारे में एक सांस्कृतिक छवि निर्मित करते हैं। यदि दर्शक किसी राष्ट्र के पात्रों को संवेदनशील, सभ्य और भावनात्मक रूप से परिपक्व पाता है, तो उसके मन में उस समाज के प्रति एक प्रकार की निकटता विकसित हो सकती है। यह सांस्कृतिक आकर्षण राजनीतिक मतभेदों के रहते हुए भी कार्य करता है।
पाकिस्तानी धारावाहिकों का एक और रोचक पक्ष है। उनमें प्रायः पुरुष पात्र किसी दूसरी स्त्री के प्रति आकर्षित दिखाई देते हैं, विवाहेतर संबंधों की भावनात्मक उलझनें भी दिखाई जाती हैं और पारिवारिक तनाव भी कथा का हिस्सा बनते हैं। किंतु यह ध्यान देने योग्य है कि कथा का समाधान शायद ही कभी उस इस्लामी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जिसके अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में एक पुरुष को एक से अधिक विवाह की अनुमति है। इसके विपरीत, अधिकांश धारावाहिक आधुनिक मध्यमवर्गीय, लगभग एकपत्नी-केंद्रित पारिवारिक आदर्श को ही सामान्य मानकर चलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ धार्मिक विधि से अधिक शहरी सामाजिक यथार्थ और दर्शकों की अपेक्षाएँ कथा को संचालित करती हैं। दूसरे शब्दों में, जिस समाज की सार्वजनिक छवि अक्सर कठोर धार्मिक आग्रहों के साथ जोड़ी जाती है, उसके लोकप्रिय टेलीविजन में अनेक बार एक भिन्न, अधिक आधुनिक और भावनात्मक पारिवारिक संसार निर्मित किया जाता है।
शो-रूम का सामान ज्यादा अच्छा रखने की आवश्यकता होती है, समझ आता है। समझ आता है Potemkin village syndrome.
पर भारतीय OTT की फूहड़ता और बदतमीज़ी नहीं समझ आती।manoj shreevastava


