नरोत्तम का पानी उतरा, और पार्टी ने साफ़-साफ़ बता दिया — समंदर भी लौटकर किनारे आता है।
दतिया से टिकट कटते ही नरोत्तम मिश्रा तेवर में निकले। भोपाल पहुँचे तो तूफान शांत हो चुका था। सीएम हाउस में बैठक हुई — CM, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री के साथ। दिल्ली का संदेश साफ़ था: टिकट नहीं बदलेगा। पार्टी की लाइन में रहो, लक्ष्मण रेखा पार मत करना। साथ में हिंसक प्रदर्शन पर नाराजगी भी दर्ज कर दी गई।
जो नेता कल तक “मेरा पानी उतरता देखकर मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना, मैं समंदर हूँ” वाला डायलॉग मारते थे, उसी पानी को पार्टी ने चुपचाप सोख लिया। “मैं हूँ तो दतिया है” का दंभ, क्रीम-पाउडर वाला हरा-भरा लुक — सब बंजर हो गया। न संगठन बचा, न सरकार में जगह। पार्टी ने एकदम साफ़ कर दिया — कोई सीट किसी की बपौती नहीं। कोई खुद को पार्टी से बड़ा मत समझ बैठे। पार्टी है तो सब कुछ है, नहीं तो कुछ भी नहीं।
दरअसल, नरोत्तम के जरिए BJP ने अपने सारे दिग्गजों को एक ही चिट्ठी पढ़ा दी है।
नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, राकेश सिंह, भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव — ये सब अब अपनी आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं।
आने वाले दिनों में कई राज्यों में ऐसे “नरोत्तम प्रकरण” देखने को मिलेंगे। पार्टी ने 45 साल के नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सिग्नल दे दिया है — पीढ़ीगत बदलाव अब रुकने वाला नहीं। लंबे समय से जमे हुए चेहरों को नए लोगों के लिए जगह खाली करनी पड़ेगी। मोह छोड़ो, रास्ता दो।
टिकट तो नरोत्तम का कटा, पर सूखकर काँटा बन रहे हैं कई दिग्गज।
आज कोई, कल कोई। बारी-बारी से सबकी पारी आएगी।
पार्टी का गणित सरल है — संगठन सबसे ऊपर है। बाकी सब आते-जाते रहते हैं। कुमार राजेश


