⚖️ सूचना आयोगों में द्वितीय अपील का निराकरण 45 दिन के भीतर करने के 3 हाई कोर्ट्स के आदेश
⚖️ सूचना आयोगों में द्वितीय अपील का निराकरण 45 दिन के भीतर करने के 3 हाई कोर्ट्स के आदेश ⚖️
18-07-2026
आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 19(3) के तहत सूचना आयोग (केंद्रीय या राज्य) के पास दर्ज होने वाली द्वितीय अपील (Second Appeal) के निपटारे के लिए कानून में कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं लिखी गई है। हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ताओं और सूचना चाहने वालों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) ने ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। कोर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि यदि द्वितीय अपील को अनिश्चितकाल के लिए लटकाया गया, तो आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य (त्वरित सूचना) ही समाप्त हो जाएगा।
* उन 3 हाई कोर्ट्स के फैसलों का विवरण,जिनमें सूचना आयोग को द्वितीय अपील का निपटारा 45 दिनों के भीतर (या अधिकतम 45 दिनों को उचित समय मानते हुए) करने का निर्देश दिया गया है ~
1. कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) –
* केस का नाम : “अखिल कुमार रॉय बनाम पश्चिम बंगाल सूचना आयोग और अन्य” (Akhil Kumar Roy v. The West Bengal Information Commission & Ors.)
* रिट याचिका संख्या :
W.P. No. 11933(W) of 2010
* फैसले की तारीख :
7 जुलाई 2010
* कोर्ट का निर्देश :
इस मामले में याचिकाकर्ता की द्वितीय अपील आयोग के पास लंबे समय से लंबित थी। न्यायमूर्ति जयंत कुमार बिस्वास की एकल पीठ ने कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम की विभिन्न धाराओं में ‘तेजी (Speed)’ का जो ताना-बाना बुना गया है, वह द्वितीय अपील में आकर अचानक गायब सा हो जाता है।
हाई कोर्ट ने माना कि भले ही अधिनियम में द्वितीय अपील के निराकरण के लिए अवधि तय नहीं है, लेकिन आयोग इसे असीमित समय तक लंबित नहीं रख सकता। कानून की मंशा को देखते हुए 45 दिनों की अवधि को ही द्वितीय अपील के निपटारे के लिए एक ‘तार्किक और उचित समय (Reasonable Period)’ माना जाना चाहिए।
आयोग को इसी समय-सीमा में फैसला करना चाहिए।
* इसी फैसले के आधार पर बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ‘आलोक पटवारी बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त’ [2010] मामले में भी 45 दिनों के भीतर अपील तय करने का आदेश दोहराया।
2. कर्नाटक हाई कोर्ट (Karnataka High Court)-
* केस का नाम : “जयप्रकाश रेड्डी बनाम केंद्रीय सूचना आयोग और अन्य” (Jayaprakash Reddy v. Central Information Commission & Anr.)
* रिट याचिका संख्या :
W.P. No. 47124/2015
* कोर्ट का निर्देश :
इस मामले में याचिकाकर्ता की द्वितीय अपील एक साल से अधिक समय से केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष लंबित थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने माना कि आरटीआई अधिनियम की धारा 19(6) के तहत प्रथम अपीलीय अधिकारी (FAA) के लिए 30 से 45 दिनों के भीतर अपील का निपटारा करना अनिवार्य है। अदालत ने तार्किक सिद्धांत (Logical Consistency) अपनाते हुए व्यवस्था दी कि चूंकि प्रथम अपील के लिए एक समय-सीमा निर्धारित है, इसलिए यह निष्कर्ष निकालना पूरी तरह सुरक्षित और न्यायसंगत है कि द्वितीय अपील का निपटारा करने के लिए भी वही 45 दिनों की अवधि (या उससे कम) लागू मानी जाएगी।
यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो यह सूचना के अधिकार के मूल सिद्धांतों की विफलता होगी।
3. बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) –
* केस का नाम : “शैलेश गांधी और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग” (Shailesh Gandhi v. Maharashtra State Information Commission)
* जनहित याचिका संख्या : PIL No. 2325 of 2025
* फैसले की तारीख :
11 जून 2025
* कोर्ट का निर्देश :
पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और अन्य आरटीआई कार्यकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग को द्वितीय अपीलों और शिकायतों का निपटारा 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही मूल अधिनियम में द्वितीय अपील के निपटारे के लिए कोई वैधानिक समय सीमा दर्ज नहीं है, फिर भी संवैधानिक और प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार किसी भी प्राधिकारी को एक ‘उचित समय’ (Reasonable Time) के भीतर ही निर्णय लेना होता है।
कोर्ट ने सूचना आयोग को कड़े निर्देश दिए कि वह आरटीआई आवेदनों की पेंडेंसी को समाप्त करने के लिए ठोस प्रयास करे और द्वितीय अपीलों व शिकायतों का निपटारा यथासंभव शीघ्र (As Expeditiously As Possible) यानी उसी 45 दिनों की तार्किक भावना के तहत करने का प्रयास (Endeavour) करे।
> इन तीनों उच्च न्यायालयों के फैसलों का मुख्य निचोड़ यह है कि आरटीआई अधिनियम, 2005 की अपील संबंधी धारा 19(6) में जो 45 दिनों की अधिकतम सीमा प्रथम अपील के लिए तय की गई है,
उसी समयावधि की कानूनी भावना और ‘उचित समय के सिद्धांत’ को आधार बना कर, सूचना आयोगों को भी अपनी कार्यप्रणाली तय करनी चाहिए,
ताकि नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।
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18-07-2026
आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 19(3) के तहत सूचना आयोग (केंद्रीय या राज्य) के पास दर्ज होने वाली द्वितीय अपील (Second Appeal) के निपटारे के लिए कानून में कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं लिखी गई है। हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ताओं और सूचना चाहने वालों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts) ने ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। कोर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि यदि द्वितीय अपील को अनिश्चितकाल के लिए लटकाया गया, तो आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य (त्वरित सूचना) ही समाप्त हो जाएगा।
* उन 3 हाई कोर्ट्स के फैसलों का विवरण,जिनमें सूचना आयोग को द्वितीय अपील का निपटारा 45 दिनों के भीतर (या अधिकतम 45 दिनों को उचित समय मानते हुए) करने का निर्देश दिया गया है ~
1. कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) –
* केस का नाम : “अखिल कुमार रॉय बनाम पश्चिम बंगाल सूचना आयोग और अन्य” (Akhil Kumar Roy v. The West Bengal Information Commission & Ors.)
* रिट याचिका संख्या :
W.P. No. 11933(W) of 2010
* फैसले की तारीख :
7 जुलाई 2010
* कोर्ट का निर्देश :
इस मामले में याचिकाकर्ता की द्वितीय अपील आयोग के पास लंबे समय से लंबित थी। न्यायमूर्ति जयंत कुमार बिस्वास की एकल पीठ ने कानून की व्याख्या करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम की विभिन्न धाराओं में ‘तेजी (Speed)’ का जो ताना-बाना बुना गया है, वह द्वितीय अपील में आकर अचानक गायब सा हो जाता है।
हाई कोर्ट ने माना कि भले ही अधिनियम में द्वितीय अपील के निराकरण के लिए अवधि तय नहीं है, लेकिन आयोग इसे असीमित समय तक लंबित नहीं रख सकता। कानून की मंशा को देखते हुए 45 दिनों की अवधि को ही द्वितीय अपील के निपटारे के लिए एक ‘तार्किक और उचित समय (Reasonable Period)’ माना जाना चाहिए।
आयोग को इसी समय-सीमा में फैसला करना चाहिए।
* इसी फैसले के आधार पर बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ‘आलोक पटवारी बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त’ [2010] मामले में भी 45 दिनों के भीतर अपील तय करने का आदेश दोहराया।
2. कर्नाटक हाई कोर्ट (Karnataka High Court)-
* केस का नाम : “जयप्रकाश रेड्डी बनाम केंद्रीय सूचना आयोग और अन्य” (Jayaprakash Reddy v. Central Information Commission & Anr.)
* रिट याचिका संख्या :
W.P. No. 47124/2015
* कोर्ट का निर्देश :
इस मामले में याचिकाकर्ता की द्वितीय अपील एक साल से अधिक समय से केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के समक्ष लंबित थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने माना कि आरटीआई अधिनियम की धारा 19(6) के तहत प्रथम अपीलीय अधिकारी (FAA) के लिए 30 से 45 दिनों के भीतर अपील का निपटारा करना अनिवार्य है। अदालत ने तार्किक सिद्धांत (Logical Consistency) अपनाते हुए व्यवस्था दी कि चूंकि प्रथम अपील के लिए एक समय-सीमा निर्धारित है, इसलिए यह निष्कर्ष निकालना पूरी तरह सुरक्षित और न्यायसंगत है कि द्वितीय अपील का निपटारा करने के लिए भी वही 45 दिनों की अवधि (या उससे कम) लागू मानी जाएगी।
यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो यह सूचना के अधिकार के मूल सिद्धांतों की विफलता होगी।
3. बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) –
* केस का नाम : “शैलेश गांधी और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग” (Shailesh Gandhi v. Maharashtra State Information Commission)
* जनहित याचिका संख्या : PIL No. 2325 of 2025
* फैसले की तारीख :
11 जून 2025
* कोर्ट का निर्देश :
पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और अन्य आरटीआई कार्यकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की थी कि महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग को द्वितीय अपीलों और शिकायतों का निपटारा 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया जाए।
मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही मूल अधिनियम में द्वितीय अपील के निपटारे के लिए कोई वैधानिक समय सीमा दर्ज नहीं है, फिर भी संवैधानिक और प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार किसी भी प्राधिकारी को एक ‘उचित समय’ (Reasonable Time) के भीतर ही निर्णय लेना होता है।
कोर्ट ने सूचना आयोग को कड़े निर्देश दिए कि वह आरटीआई आवेदनों की पेंडेंसी को समाप्त करने के लिए ठोस प्रयास करे और द्वितीय अपीलों व शिकायतों का निपटारा यथासंभव शीघ्र (As Expeditiously As Possible) यानी उसी 45 दिनों की तार्किक भावना के तहत करने का प्रयास (Endeavour) करे।
> इन तीनों उच्च न्यायालयों के फैसलों का मुख्य निचोड़ यह है कि आरटीआई अधिनियम, 2005 की अपील संबंधी धारा 19(6) में जो 45 दिनों की अधिकतम सीमा प्रथम अपील के लिए तय की गई है,
उसी समयावधि की कानूनी भावना और ‘उचित समय के सिद्धांत’ को आधार बना कर, सूचना आयोगों को भी अपनी कार्यप्रणाली तय करनी चाहिए,
ताकि नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।


