
पत्रकारिता में भरे पड़े केकड़े?
लेख– राजेन्द्र सिंह जादौन
केकड़ा एक ऐसी प्रजाति है, जो अगर एक बाल्टी में डाल दी जाए तो उसे ढकने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वजह साफ है जैसे ही कोई एक ऊपर चढ़ने की कोशिश करता है, बाकी सब मिलकर उसकी टांग खींच लेते हैं। यह दृश्य देखने में भले ही जीवविज्ञान का एक छोटा-सा प्रयोग लगे, लेकिन असल में यह हमारे समाज के कई हिस्सों की गहरी सच्चाई भी है। और अगर थोड़ा ध्यान से देखा जाए, तो पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा आज इसी “केकड़ा सिद्धांत” पर चलता हुआ नजर आता है।
पत्रकारिता, जिसे कभी समाज का आईना कहा गया, जहाँ सच को सामने लाने का जुनून हुआ करता था, आजकल कई जगहों पर एक अलग ही खेल में उलझी हुई दिखाई देती है। यहाँ खबरों की दौड़ से ज्यादा खबरनवीसों की खींचतान चल रही है। एक पत्रकार अगर मेहनत करके कोई अच्छी खबर निकाल भी ले, तो उसके साथी उसे सराहने से पहले यह सोचते हैं कि “यह आगे कैसे निकल गया?” और बस यहीं से शुरू होता है खींचतान का खेल।
न्यूज़रूम अब कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य प्रतियोगिता चल रही हो जहाँ पुरस्कार किसी को ऊपर उठाना नहीं, बल्कि किसी को नीचे गिराना होता है। सामने से मुस्कान, पीछे से वार यहाँ यह कला इतनी परिपक्व हो चुकी है कि नया पत्रकार इसे सीखने में ज्यादा वक्त नहीं लगाता। आपके साथ बैठकर आपकी तारीफ करने वाला, आपकी लेखनी को “लाजवाब” बताने वाला वही साथी, कब आपके खिलाफ माहौल बना देता है, आपको भनक भी नहीं लगती।
“मुँह में राम, बगल में छुरी” यह कहावत पत्रकारिता के कुछ हिस्सों में अब चरित्र का हिस्सा बन चुकी है। यहाँ भाषा जितनी मीठी होती है, इरादे उतने ही तीखे हो सकते हैं। कोई आपकी खबर की तारीफ करता है, तो आप खुश हो जाते हैं, लेकिन आपको यह नहीं पता होता कि उसी वक्त कहीं और आपकी खबर की “कमियों” का विश्लेषण भी चल रहा है। तारीफ और आलोचना का यह दोहरा खेल इतना महीन है कि पहचानना मुश्किल हो जाता है कि असली चेहरा कौन सा है।


