More
    Homeप्रदेशअवैध कॉलोनियों का सच गलती किसकी, सज़ा किसे?

    अवैध कॉलोनियों का सच गलती किसकी, सज़ा किसे?

     

    अवैध कॉलोनियों का सच गलती किसकी, सज़ा किसे?

    अवैध कॉलोनियों का सच गलती किसकी, सज़ा किसे?

     

    राजेन्द्र सिंह जादौन

     

    शहरों का फैलता दायरा, बढ़ती आबादी और अपने घर का सपना इन तीनों के बीच एक ऐसा जाल बुना गया है, जिसमें सबसे ज़्यादा फंसता है आम आदमी। वह आदमी जो जीवन भर की कमाई जोड़कर एक छोटा सा प्लॉट खरीदता है, ईंट-ईंट जोड़कर अपना घर बनाता है और फिर एक दिन अचानक प्रशासन का नोटिस उसके दरवाज़े पर आकर खड़ा हो जाता है। सवाल उठता है क्या वाकई गलती उसी की है?

    सबसे पहले मूल प्रश्न पर आते हैं कॉलोनी वैध है या अवैध, इसकी जांच करना किसकी जिम्मेदारी है? स्पष्ट रूप से यह काम प्रशासन का है। जब कोई व्यक्ति जमीन खरीदने जाता है, तो वह यह मानकर चलता है कि यदि रजिस्ट्री हो रही है, नामांतरण हो रहा है, बैंक लोन भी मिल रहा है, तो सब कुछ नियमों के तहत ही होगा। लेकिन यहीं सबसे बड़ा भ्रम छुपा है रजिस्ट्री सिर्फ जमीन के लेन-देन का प्रमाण है, यह कॉलोनी की वैधता की गारंटी नहीं देती।

    यानी एक तरफ सरकार का तंत्र रजिस्ट्री करके राजस्व कमा रहा है, स्टांप ड्यूटी वसूल रहा है, और दूसरी तरफ वही तंत्र कुछ वर्षों बाद यह कहता है कि यह कॉलोनी अवैध है। यह विरोधाभास ही आम आदमी की सबसे बड़ी परेशानी है। उसे न तो यह बताया जाता है कि वैध कॉलोनी की पहचान कैसे करें, न ही खरीद-फरोख्त के लिए कोई प्रशिक्षण या मार्गदर्शन दिया जाता है। परिणामस्वरूप, वह भरोसे के आधार पर निर्णय लेता है और वही भरोसा बाद में उसके लिए संकट बन जाता है।

    अवैध कॉलोनियों को broadly दो हिस्सों में समझा जा सकता है पहली, कच्ची या डायवर्सन कॉलोनी, और दूसरी, पूर्ण अवैध कॉलोनी।

    कच्ची कॉलोनी वह होती है, जहां जमीन का डायवर्सन तो हो चुका होता है, यानी कृषि भूमि को आवासीय उपयोग के लिए बदल दिया गया है। यहां रजिस्ट्री भी हो जाती है, नामांतरण भी हो जाता है, और लोग वैध तरीके से प्लॉट खरीद लेते हैं। लेकिन कॉलोनी के विकास के लिए जरूरी अनुमतियां—जैसे टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TNCP) से लेआउट पास कराना, नगर निगम से अनुमति लेना, सड़कों, नालियों, पार्क, ओपन स्पेस जैसी बुनियादी सुविधाओं का प्रावधान ये सब अक्सर नहीं किए जाते। यानी जमीन तो वैध है, लेकिन कॉलोनी का विकास अधूरा और नियमों के विपरीत है।

    यही कारण है कि ऐसी कॉलोनियां “अवैध” की श्रेणी में आ जाती हैं, जबकि वहां रहने वाले लोग पूरी तरह से खुद को वैध मानते हैं। क्योंकि उनके पास रजिस्ट्री है, बैंक लोन है, और वर्षों से वे वहां रह भी रहे हैं।

    दूसरी तरफ, पूर्ण अवैध कॉलोनियां हैं जहां मामला कहीं अधिक गंभीर होता है। ये कॉलोनियां सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाई जाती हैं, या फिर आरक्षित भूमि, ट्रस्ट, मंदिर की जमीन पर अवैध तरीके से प्लॉट काट दिए जाते हैं। कई बार नोटरी के जरिए फर्जी दस्तावेज़ बनाकर लोगों को प्लॉट बेच दिए जाते हैं। यहां न कोई वैधता होती है, न भविष्य में वैध होने की कोई ठोस संभावना।

    अब सवाल यह उठता है कि कार्रवाई किस पर होनी चाहिए? व्यवहार में देखा जाए तो प्रशासन अक्सर कॉलोनाइजर के बजाय सीधे आम नागरिक पर कार्रवाई करता है नोटिस, जुर्माना, और कभी-कभी ध्वस्तीकरण तक। यही वह बिंदु है जहां आम आदमी को यह पूरी प्रक्रिया “ब्लैकमेलिंग” जैसी लगती है।

    सोचिए एक व्यक्ति जिसने अपनी जिंदगी की पूंजी लगाकर घर बनाया, उसे अचानक यह कहा जाए कि उसका घर अवैध है, तो उसके लिए यह सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक संकट भी है। घर सिर्फ चार दीवारें नहीं होता, वह सुरक्षा का अहसास होता है, परिवार का आधार होता है।

    हालांकि, यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि प्रशासन के पास मकान तोड़ने का अधिकार नहीं है। यदि निर्माण पूरी तरह अवैध है जैसे सरकारी जमीन पर अतिक्रमण, या कोर्ट के आदेश के खिलाफ निर्माण तो कानून प्रशासन को कार्रवाई का अधिकार देता है। लेकिन न्यायालय अक्सर यह भी देखता है कि खरीदार “बोना फाइड” है या नहीं, यानी उसने धोखे में खरीदारी की या जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किया।

    यही कारण है कि कच्ची कॉलोनियों में रहने वाले लोगों को अक्सर राहत मिलती है और सरकारें समय-समय पर ऐसी कॉलोनियों को नियमित (regularize) करती रही हैं। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में वर्षों से यह प्रक्रिया चलती रही है कभी 2016 तक की कॉलोनियों को वैध किया गया, तो कभी 2022 तक की कॉलोनियों को प्रक्रिया में लिया गया। यह दर्शाता है कि सरकार भी यह मानती है कि इन कॉलोनियों में बड़ी आबादी बस चुकी है और इन्हें हटाना व्यावहारिक नहीं है।

    इसके अलावा, राजनीतिक पहलू भी इसमें जुड़ा हुआ है। जनप्रतिनिधि चाहे विधायक हों या सांसद अपनी निधि से इन कॉलोनियों में सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। यानी एक तरफ कॉलोनी अवैध मानी जाती है, और दूसरी तरफ उसमें विकास कार्य भी किए जाते हैं। यह दोहरा रवैया ही पूरे सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी है।

    अगर आंकड़ों की बात करें, तो बड़े शहरों जैसे भोपाल में 80-90 प्रतिशत आबादी ऐसी ही डायवर्सन या कच्ची कॉलोनियों में रहती है। यानी जो “अवैध” कहा जा रहा है, वही असल में शहर का सबसे बड़ा हिस्सा है। ऐसे में सवाल उठता है क्या इतने बड़े हिस्से को अवैध कहकर छोड़ देना संभव है?

    असल समस्या यह है कि कानून और जमीन की हकीकत के बीच बड़ा अंतर है। एक तरफ नियम इतने जटिल हैं कि छोटे डेवलपर उन्हें पूरा नहीं कर पाते, दूसरी तरफ आम आदमी के पास इतना बजट नहीं होता कि वह पूरी तरह विकसित, महंगी वैध कॉलोनी में प्लॉट खरीद सके परिणामस्वरूप, वह सस्ती कच्ची कॉलोनी की ओर आकर्षित होता है जो उसकी पहुंच में होती है।

    इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशासन की बनती है। यदि शुरुआत में ही सख्ती बरती जाए यानी बिना सभी अनुमतियों के कॉलोनी काटने पर रोक लगे, रजिस्ट्री से पहले कॉलोनी की वैधता की अनिवार्य जांच हो, और सारी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो तो समस्या काफी हद तक हल हो सकती है।

    साथ ही, कॉलोनाइजर पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि असल में वही व्यक्ति है जो नियमों को तोड़कर कॉलोनी विकसित करता है और मुनाफा कमाता है। आम खरीदार तो सिर्फ एक उपभोक्ता है, जो भरोसे के आधार पर निवेश करता है।

    जनता को भी जागरूक करने की जरूरत है। जैसे बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट या मतदान के लिए अभियान चलाए जाते हैं, वैसे ही रियल एस्टेट खरीद-फरोख्त के लिए भी जागरूकता अभियान चलने चाहिए। लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि TNCP की स्वीकृति क्या होती है, नगर निगम की अनुमति क्यों जरूरी है, और किन दस्तावेजों की जांच करना आवश्यक है।

    यह कहना गलत नहीं होगा कि अवैध कॉलोनियों का मुद्दा सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। जब तक सिस्टम खुद स्पष्ट और पारदर्शी नहीं होगा, तब तक आम आदमी इसी तरह फंसता रहेगा।

    अगर जवाब ईमानदारी से दिया जाए, तो यह साफ दिखता है कि गलती व्यवस्था की खामियों में है, लेकिन उसकी सजा आज भी सबसे कमजोर व्यक्ति आम नागरिकको ही भुगतनी पड़ रही है।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Must Read

    spot_imgspot_imgspot_imgspot_img