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    वृक्ष देवताओं की भावुक विदाई

    “वृक्ष देवताओं की भावुक विदाई”
    “अलविदा मूक वृक्ष मित्रों”

    आज हमारे अवधपुरी, भोपाल स्थित निवास के समीप से गुजरने वाले नवनिर्मित फोरलेन मार्ग—
    जो भविष्य में भोपाल- कानपुर -लखनऊ इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से जुड़ने वाला है,का निर्माण कार्य एक जटिल मोड़ पर पहुँचा। इस विकास पथ के साये में हमारे 62 पूजनीय वृक्षों का अस्तित्व संकट में था। किंतु, हम वृक्ष-प्रेमी नागरिकों की सजगता और पर्यावरण के प्रति अगाध निष्ठा ने एक सकारात्मक संघर्ष को जन्म दिया। सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप, मार्ग के एलाइनमेंट (Alignment) में परिवर्तन संभव हुआ, जिससे 52 जीवनदायिनी वृक्षों को कटने से बचाया जा सका। यह हमारी जीत है।

    ​तथापि, विकास की इस अनिवार्य प्रक्रिया में हमें 10 वृक्षों का बलिदान देना पड़ा। आज जब आरी चली, तो उन वृक्षों के साथ केवल हमारे संबंध ही नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियाँ भी जुड़ी थीं। वे केवल वनस्पति नहीं, हमारे परिवार के अभिन्न सदस्य थे।
    ​आज, हम अवधपुरी के निवासियों ने अत्यंत भारी हृदय और नम आँखों से अपने वृक्ष-देवताओं का विधिवत पूजन किया। मंत्रोच्चार और नमन के साथ हमने उन्हें अंतिम विदाई दी।
    यह केवल एक औपचारिक विदाई नहीं थी, बल्कि कृतज्ञता का वह अश्रुपूर्ण निमंत्रण था,
    जो उन वृक्षों को समर्पित है जिन्होंने वर्षों तक हमें छाया, प्राणवायु और शीतल छाँव दी।
    ​विकास की गति अपरिहार्य है, परंतु प्रकृति की बलि देकर प्राप्त कोई भी सुविधा हमारी आत्मा को सदैव कचोटती रहेगी। हम इन दस वृक्षों की स्मृति में संकल्पित हैं कि हम न केवल इनकी कमी को पूरा करेंगे, बल्कि आने वाले समय में अपने क्षेत्र को और अधिक हरा-भरा बनाकर उन वृक्ष-देवताओं को सच्ची श्रद्धांजलि देंगे।

    “अलविदा, ओ हमारे मूक वृक्ष मित्रों”

    ​कंक्रीट की इन बेजान,
    ठंडी राहों में,
    अब उनकी घनी छाया कहाँ मिलेगी?
    वो जो सुबह जगाते थे पक्षियों की गुनगुनाहट से,
    अब खिड़की पर वो चहकती सुबह कहाँ खिलेगी?
    ​वो तो खड़े थे युगों से, बिना किसी रंजिश के,
    बिना किसी स्वार्थ के,
    बिना किसी मान के।
    न जाने कितनी तपती दोपहरों की जलन पीकर,
    हवा बनकर उन्होंने बढ़ाया था हौसला हमारे प्राण के,
    ​कभी न मांगा उन्होंने कोई हक,
    न कोई पद,
    न झूठे वादों का कोई जाल उन्होंने बुना था।
    बस अपनी जड़ों से थामे रखा था धरती का सीना,
    और हमारी साँसों के लिए जीवन का अमृत चुना था।
    ​आज कुल्हाड़ी की चोट से उनका लहू रिस रहा है,
    विकास की इस नई सड़क की नींव में वे दफन हो रहे हैं।
    कल तक जो थे हमारे घर के गौरव,
    आज मलबे की तरह दरकिनार,
    जड़ से खो रहे हैं।
    ​वो तो बेजुबान थे,
    कभी वोट नहीं दे सकते थे,
    अपनी बेबसी का कोई शोर नहीं मचा पाए।
    गूँगी गवाही बनकर खड़े रहे वो आखिरी दम तक,
    और हमारी आँखें देखते ही देखते धूल में मिल गए,
    मिट गए।
    ​अलविदा, हे मेरे मौन, मूक वृक्ष मित्र!
    तुम्हारे बिना ये रास्ता अब बस एक पत्थर का टुकड़ा है।
    हमने विकास का बुत तो खड़ा कर लिया शोर मचाकर,
    पर सच तो ये है कि हमने अपने ही घर का एक हिस्सा उजड़ा है।
    ​वो जो अब नहीं रहे,
    उनकी जगह अब सन्नाटा होगा,
    शायद अगली पीढ़ी बस किताबों में ही उनकी तस्वीर देखेगी।
    हम दौड़ते रहे कंक्रीट की रफ्तार के पीछे,
    और हमारे वृक्ष मित्रो की ,
    वह अनमोल थाती ,
    अब बस यादों में ही सिसकेगी।

    जयदीप सिंह चौहान
    भोपाल, मध्यप्रदेश
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