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    प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा पर भारत सरकार ₹1.62 करोड़ प्रतिदिन खर्च करती है

    प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा पर भारत सरकार ₹1.62 करोड़ प्रतिदिन खर्च करती है. मतलब ₹ 6.75 लाख प्रति घंटा. यानि ₹11,263 प्रति मिनट. सालाना यह खर्चा करीब ₹500 करोड़ बैठता है. यह सिर्फ एसपीजी का बज़ट है.

    अगर इसमें सीआरपीएफ,पुलिस इत्यादि का खर्चा मिला लिया जाये तो प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर प्रतिदिन हमारी सरकार करीब ₹2 करोड़ रुपये खर्च करती है. यह रकम आसमान से नहीं टपकती. हमारी आपकी जेब से निकाली जाती है.

    फिर भी जिमखाना क्लब पीएम की सुरक्षा के लिये खतरा है? शर्म आनी चाहिये उस सरकार को जो इतना खर्च करने के बाद भी प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती.

    दूसरी बात कि सेंट्रल विस्टा के तहत पीएम का नया आवास अलग बन रहा है. जब पीएम का आवास ही लोककल्याण मार्ग नहीं रहेगा तो सुरक्षा की चिंता कहां से पैदा हो गई?

    असली वजह न तो पीएम की सुरक्षा है न ही उपनिवेशवाद से मुक्ति. वजह है कुंठा. मकसद है गरीब जनता को परपीड़ा का सुख देना ताकि वह अपनी गरीबी और दुर्दशा पर सवाल न कर सके. प्राइम लोकेशन पर मौजूद जमीन हड़पना और उसे अंबानी-अडानी या उनके जैसे किसी दूसरे पूंजीपति लुटेरों को सौंप देना.

    जिमखाना क्लब की फीस अगर कम है तो सरकार बढ़ा सकती है लेकिन फीस भी मकसद नहीं है. अगर दारू पीने पिलाने से कोई अय्याश हो जाता है तो फिर अटल जी के बारे में क्या कहेंगे? प्रमोद महाजन, अरुण जेटली के बारे में क्या कहेंगे?

    एलीटिज्म का राजनीतिक तौर पर विरोध करना अलग बात है. एलीट संस्थाओं को ध्वस्त करना अलग बात है. यह उस बंदर वाली मानसिकता है जो उस्तरा पाते ही दूसरे का कान काटने लगता है. मैं कोई जिमखाना का पक्षधर नहीं हूं लेकिन उसकी लिगेसी को धवस्त करने का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता. वह हमारी विरासत – अच्छी या बुरी – का हिस्सा है.

    मंडल-कमंडल टाइप के जो लोग इसके सरकारी टेकओवर को उपनिवेशवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं उनमें एक चीज कॉमन मिलेगी – वो सब कुंठित और नैतिक रूप से भ्रष्ट हैं. राजनीतिक रूप से या तो मंडलवादी हैं या कमंडलवादी.

    जिन लोगों ने अंग्रेज़ी राज के लिये मुखबिरी की, जिन्होंने अपना राजनीतिक अस्तित्व अंग्रेज़ों की चाकरी करते हुये गढ़ा वो जब औपनिवेशिक सोच निशानियों से मुक्ति की बात करते हैं तो दुख नहीं होता गुस्सा आता है.

    जिनका आज़ाद भारत की स्थापना और निर्माण में नाखून कटाने से भी कम योगदान है वो जब भारत को कॉलोनियल प्रतीकों से मुक्ति दिलाने का ठेका ले रहे होते हैं तो उनके बड़बोलेपन पर तरस आता है. जन्मजात कुंठा से पार पाने की प्रतिक्रिया में तैयार किये गये उनके फर्जी ज्ञान-विज्ञान, इतिहासबोध पर दया आती है.

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