
पत्रकारिता की साधना में शून्यता की खोज?
लेख : राजेन्द्र सिंह जादौन
मैं पत्रकारिता की धरा पर देह लिए मग्न हूँ। एक पत्रकारिता-भक्त जब अपनी साधना में लीन होता है, तब वह बाहर से नहीं, भीतर से यात्रा करता है। यह यात्रा शब्दों, समाचारों और घटनाओं की नहीं होती, बल्कि स्वयं को जानने और सत्य तक पहुँचने की होती है। इस मार्ग पर चलने वाला साधक धीरे-धीरे अपने भीतर के अहंकार, अपेक्षाओं और मोह को त्यागता जाता है। वह शून्य होने लगता है और उसी शून्यता में उसे पत्रकारिता के साक्षात् दर्शन की प्रतीक्षा रहती है।
यह प्रतीक्षा सरल नहीं होती। समय की धूल, परिस्थितियों के थपेड़े और संघर्षों के असंख्य प्रश्न उसके धैर्य की परीक्षा लेते हैं। कुछ लोग इस कठिन प्रतीक्षा को पार कर जाते हैं और कुछ बीच राह में ही थककर बैठ जाते हैं। जो साधक धैर्य रखता है, वह अंततः पत्रकारिता के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। किंतु जो उतावला हो जाता है, उसके सामने भ्रम की अनेक परतें खड़ी हो जाती हैं। वह सत्य और असत्य के बीच भेद नहीं कर पाता और अंततः निराश होकर उस मार्ग को ही छोड़ देता है, जिस पर चलकर वह बहुत कुछ प्राप्त कर सकता था।
पत्रकारिता की प्रतीक्षा करना वास्तव में स्वयं को साधने जैसा है। जिसकी केवल देह ने पत्रकारिता को पाने की इच्छा की, वह अक्सर खाली हाथ रह गया। जिसने इसे केवल आजीविका, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि का माध्यम समझा, वह इसके बाहरी आवरण तक ही सीमित रहा। किंतु जिसकी आत्मा में पत्रकारिता के प्रति सच्ची प्यास जागी, जिसने इसे लोकमंगल और सत्य की साधना माना, उसने धैर्य और भक्ति के साथ वह मार्ग खोज लिया जो उसे पत्रकारिता के वास्तविक स्वरूप तक ले जाता है।
पत्रकारिता किसी बाज़ार में मिलने वाली वस्तु नहीं है। यह कोई पद, पहचान या पुरस्कार भी नहीं है। यह एक अनुभूति है, एक तप है, एक निरंतर चलने वाली साधना है। यह हमें तब प्राप्त होती है जब हम भीतर से रिक्त हो जाते हैं। जब मन में कोई पूर्वाग्रह नहीं बचता, हृदय में कोई स्वार्थ नहीं रहता और मस्तिष्क किसी निश्चित निष्कर्ष का बंदी नहीं होता। जब हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ वश में होती हैं और हम व्याकुलता, अधीरता तथा आकर्षणों से परे खड़े होकर संसार को देख पाते हैं, तभी पत्रकारिता का वास्तविक प्रकाश हमारे भीतर उतरता है।
आज अनेक लोग पत्रकारिता के मार्ग पर चलना चाहते हैं, परंतु स्वयं को रिक्त नहीं कर पाते। वे अपने विचारों, आग्रहों, महत्वाकांक्षाओं और पूर्वधारणाओं से इतने भरे होते हैं कि सत्य उनके सामने खड़ा होकर भी दिखाई नहीं देता। वे घटनाओं को नहीं देखते, बल्कि अपनी धारणाओं के चश्मे से उन्हें व्याख्यायित करते हैं। परिणामस्वरूप वे सत्य और असत्य का भेद खो बैठते हैं और धीरे-धीरे टूटने लगते हैं। उन्हें लगता है कि पत्रकारिता ने उनका साथ छोड़ दिया, जबकि वास्तविकता यह होती है कि वे स्वयं पत्रकारिता की मूल भावना से दूर हो चुके होते हैं।
मैं भी उसी पथ का एक साधक हूँ। मैं धैर्य रखकर, मौन रहकर स्वयं को शून्य करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि यह मार्ग लंबा है, कठिन है और इसके परिणाम अनिश्चित हैं। परंतु अब परिणाम मेरे लिए उतने महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं। पत्रकारिता मिले या न मिले, उसके नाम से जुड़ा यह पथ ही मुझे प्रिय हो गया है। क्योंकि इस मार्ग ने मुझे स्वयं से मिलना सिखाया है। इसने मुझे धैर्य, समर्पण और प्रतीक्षा का अर्थ समझाया है।
मेरा तप भी पत्रकारिता है, मेरा जप भी पत्रकारिता है। मेरी सिद्धि, मेरा समर्पण और मेरी समस्त शून्यता की अनुभूति भी पत्रकारिता के लिए ही है। मैं उसी धरा पर खड़ा हूँ जहाँ सत्य की खोज कभी समाप्त नहीं होती। मैं उसी अग्नि के सामने बैठा हूँ जहाँ प्रश्नों की आहुति देकर उत्तरों की प्रतीक्षा की जाती है। मैं उसी धूनी के पास हूँ जहाँ शब्द तपकर विचार बनते हैं और विचार तपकर सत्य का रूप धारण करते हैं।
मैं मग्न हूँ पत्रकारिता की धरा पर देह लिए। तेरे नाम की धूनी रमाए हुए, तेरी प्रतीक्षा में मौन खड़ा हूँ। यदि तू मिलेगी तो भी यही पथ मेरा होगा, और यदि न मिलेगी तो भी तेरे नाम का यह तप मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य रहेगा। क्योंकि पत्रकारिता केवल एक कर्म नहीं, बल्कि आत्मा का वह संकल्प है जो सत्य की ओर निरंतर अग्रसर रहने का साहस देता है।॥
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