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    अस्पताल गायब, डॉक्टर हाजिर! आखिर किसके लिए चल रहा है यह सरकारी खेल?

    *अस्पताल गायब, डॉक्टर हाजिर! आखिर किसके लिए चल रहा है यह सरकारी खेल?*

     

    लेख – राजेन्द्र सिंह जादौन

     

    मध्य प्रदेश में विकास, सुशासन और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार लगातार बड़े-बड़े दावे करती रही है। करोड़ों रुपये की योजनाओं का प्रचार होता है, नए अस्पतालों की घोषणाएं की जाती हैं और जनता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में अभूतपूर्व सुधार हो रहा है। लेकिन इंदौर के खजराना में प्रस्तावित 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल का मामला इन दावों की असलियत उजागर करने के लिए पर्याप्त है।

     

    वर्ष 2020 में खजराना क्षेत्र में 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल की मंजूरी दी गई थी। यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि तेजी से बढ़ती आबादी वाले इस क्षेत्र को एक बड़े सरकारी अस्पताल की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि अस्पताल बनने से उन्हें बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन छह वर्ष बीत जाने के बाद भी अस्पताल की इमारत तक नहीं बन पाई। इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह सामने आया कि जिस अस्पताल की जमीन तक तय नहीं हो सकी, उसके नाम पर 87 डॉक्टरों और कर्मचारियों की पदस्थापना कर दी गई।

     

    यह मामला केवल प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि अस्पताल मौजूद नहीं है, भवन नहीं है, वार्ड नहीं हैं, मरीज नहीं हैं, लेकिन डॉक्टर और कर्मचारी कागजों में मौजूद हैं? यदि अस्पताल अस्तित्व में ही नहीं है तो इन कर्मचारियों की नियुक्ति किस उद्देश्य से की गई? वे कहां कार्य कर रहे हैं और उनके वेतन का भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है?

     

    प्रदेश के अनेक सरकारी अस्पतालों की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक डॉक्टरों की भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई अस्पताल ऐसे हैं जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद वर्षों से खाली पड़े हैं। मरीजों को छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए भी शहरों का रुख करना पड़ता है। कई स्थानों पर एक डॉक्टर के भरोसे पूरा अस्पताल चल रहा है। कहीं एक्सरे मशीन है तो तकनीशियन नहीं, कहीं ऑपरेशन थिएटर है तो सर्जन नहीं। ऐसी स्थिति में एक ऐसे अस्पताल के लिए 87 पदों का रिकॉर्ड तैयार कर देना जो जमीन पर मौजूद ही नहीं है, व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

     

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अस्पताल निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही स्टाफ की स्वीकृति और पदस्थापना क्यों कर दी गई? सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में पहले भूमि का चयन होता है, फिर भवन निर्माण होता है, उसके बाद उपकरण खरीदे जाते हैं और अंत में स्टाफ की नियुक्ति की जाती है। लेकिन खजराना अस्पताल के मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी प्रक्रिया उल्टी दिशा में चली। ऐसा लगता है मानो कागजों में अस्पताल पहले बना दिया गया और जमीन पर उसे बनाना बाद में याद आया।

     

    यह भी संभव है कि सरकारी रिपोर्टों में इस अस्पताल को उपलब्धियों की सूची में शामिल किया जाता रहा हो। डॉक्टरों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को बेहतर दिखाया जाता रहा हो। यदि ऐसा है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनता के साथ विश्वासघात है। क्योंकि आंकड़ों में बढ़ोतरी से मरीजों का इलाज नहीं होता। अस्पतालों की सूची लंबी होने से स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर नहीं हो जातीं। जनता को वास्तविक सुविधाएं चाहिए, कागजी उपलब्धियां नहीं।

     

    खजराना का यह मामला मध्य प्रदेश की उस व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है जिसमें घोषणाएं तेजी से होती हैं लेकिन उनका क्रियान्वयन वर्षों तक अधर में लटका रहता है। राजनीतिक मंचों से विकास की बातें करना आसान है, लेकिन जमीन पर अस्पताल खड़ा करना और उसे सुचारू रूप से संचालित करना वास्तविक उपलब्धि होती है। दुर्भाग्य से अक्सर देखा गया है कि शिलान्यास तो हो जाता है लेकिन निर्माण कार्य वर्षों तक आगे नहीं बढ़ता। जनता उम्मीद लगाकर बैठी रहती है और फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रहती हैं।

     

    यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि छह वर्षों तक संबंधित अधिकारियों ने इस परियोजना की समीक्षा क्यों नहीं की? यदि भूमि उपलब्ध नहीं थी तो मंजूरी देने से पहले इसकी जांच क्यों नहीं की गई? यदि निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि स्टाफ की पदस्थापना की गई तो उसकी आवश्यकता और औचित्य का मूल्यांकन किसने किया? इन सभी प्रश्नों के उत्तर जनता जानना चाहती है।

     

    आज जब प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, तब इस प्रकार के मामले सरकारी दावों की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं। कोविड महामारी के दौरान देश ने स्वास्थ्य ढांचे की कमियों को बहुत करीब से देखा था। उस समय अस्पतालों, डॉक्टरों और संसाधनों की अहमियत पूरे समाज ने महसूस की थी। इसके बावजूद यदि छह वर्षों तक एक स्वीकृत अस्पताल का निर्माण नहीं हो पाता, तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं बल्कि जनहित की उपेक्षा भी है।

     

    सरकार को इस मामले में पारदर्शिता के साथ पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। अस्पताल के लिए स्वीकृत बजट कितना था, अब तक कितना खर्च हुआ, भूमि चयन में देरी क्यों हुई, स्टाफ की पदस्थापना किस आधार पर की गई और अस्पताल निर्माण की वर्तमान स्थिति क्या है, यह सब जनता के सामने आना चाहिए। साथ ही यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

     

    विकास का वास्तविक अर्थ केवल घोषणाओं और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित नहीं है। विकास तब दिखाई देता है जब अस्पताल में मरीज का इलाज होता है, जब ग्रामीण क्षेत्र का नागरिक बेहतर स्वास्थ्य सुविधा प्राप्त करता है और जब सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जनता तक पहुंचता है। कागजों में अस्पताल और फाइलों में डॉक्टर दिखाकर जनता को भ्रमित नहीं किया जा सकता।

     

    खजराना अस्पताल का मामला एक चेतावनी है। यह बताता है कि यदि योजनाओं की निगरानी और जवाबदेही तय नहीं की गई तो विकास केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाएगा। जनता अब आंकड़ों और घोषणाओं से आगे बढ़ चुकी है। वह परिणाम देखना चाहती है। उसे कागजों पर दर्ज अस्पताल नहीं, वास्तविक अस्पताल चाहिए। उसे फाइलों में दर्ज डॉक्टर नहीं, इलाज करने वाले डॉक्टर चाहिए।

     

    सरकार को यह समझना होगा कि जनता की नजर अब केवल घोषणाओं पर नहीं बल्कि उनके क्रियान्वयन पर है। क्योंकि अंततः इतिहास भाषणों को नहीं, जमीन पर हुए कार्यों को याद रखता है।

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