कुंठित मानसिकता के साथ सोशल मीडिया पर उल्टी करने वालों को लेकर मैं कभी कोई टिप्पणी नहीं करता. करना भी नहीं चाहिए क्योंकि हम सब भाषा के पुजारी हैं. मेरा मानना है कि वैचारिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, सोचने का नजरिया अलग हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम किसी के व्यक्तित्व का छीछालेदर करने लगें. हम किसी को वामपंथी तो किसी दो दक्षिणपंथी साबित करने लगें. मगर यही हो रहा है. खुद कुछ अच्छा करने की काबिलियत नहीं है और काबिल लोगों की टांग खींचने के लिए बावले हुए जा रहे हैं.
पिछले दिनों माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी को लेकर जलन से भरपूर कुछ टिप्पणियां पढ़ने में आर्इं. आमतौर पर ऐसी टिप्पणियों को लेकर मैं वक्त जाया नहीं करता, सरसरी निगाह से आगे बढ़ जाता हूं लेकिन बात चूकि विजय मनोहर तिवारी की थी इसलिए मैने पूरा पढ़ा. उस टिप्पणी में यह झूठ परोसने की कोशिश की गई है कि विजय वास्तव में वामपंथी विचारधारा के व्यक्ति हैं. उन पर कुछ और भी अनर्गल टिप्पणियां की गई हैं. कुलगुरु पद के लिए उन्हें अयोग्य ठहराने की कोशिश भी उस पोस्ट में है. इसलिए मुझे लगा कि उस पोस्ट का प्रतिउत्तर दिया जाना चाहिए. और जो सच है, वह लिखा जाना चाहिए.
विजय को मैं पिछले 34 साल से जानता हूं और बहुत अच्छी तरह से जानता हूं. मुझे याद है कि किन्हीं कारणों से मैं उन दिनों लंबी छुट्टी पर था जब नईदुनिया में दो नए रिपोर्टर एक ही दिन ज्वाइन हुए थे, विजय मनोहर तिवारी और प्रवीण शर्मा. आने वाले वक्त में दोनों ने साबित किया कि वे असीम प्रतिभा के धनी हैं. प्रवीण इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल के संस्थापक हैं, वैचारिक रूप से अत्यंत संपन्न हैं और साहसी लेखन के लिए जाने जाते हैं. विजय संभवत: अकेले ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने रिपोर्टिंग के लिए आठ बार पूरे भारत का चक्कर लगाया है. उनकी भाषा और उनकी समझ कमाल की है. विषय की गहराई में उतरना उन्हें हमेशा पसंद रहा है. हमने लंबे अरसे तक नईदुनिया में साथ काम किया है. बल्कि रिपोर्टिंग के अलावा नईदुनिया के रविवारीय पृष्ठ पर एक साथ लिखा भी है.
विजय के बारे में टिप्पणी की गई है कि वे वामपंथी विचारधारा के हैं. पहली बात तो यह कि वामपंथी होना या दक्षिणपंथी होना कोई अपराध नहीं है. मगर नईदुनिया में काम करते हुए या फिर बाद में भी विजय के लेखन को लेकर कभी अंशमात्र भी यह नहीं लगा कि वे किसी संगठन या विचार के समर्थक हंै. हरसूद के अमानवीय विस्थापन पर टीवी पर वे शासन के अधिकारियों के प्रति आक्रामक थे. यह एक पत्रकार की सही भूमिका थी. कुछ गलत है तो गलत कहना और सही है तो उसके समर्थन में आगे आना, यही तो पत्रकारिता का धर्म है. हरसूद की रिपोर्टिंग से वे वामपंथी कैसै हो गए? फिर तो भोजशाला पर उनकी रिपोर्टिंग या झाबुआ में विराट हिंदू संगम पर उनकी रिपोर्टिंग को देखते हुए उन्हें दक्षिणपंथी कह देंगे?
आरएसएस की स्थापना के 75 साल हुए तब सरसंघचालक बने केएस सुदर्शन. उनका पहला बड़ा कार्यक्रम झाबुआ का चर्चित विराट हिंदू संगम था, जिसमें मालवा निमाड़ के तीन लाख आदिवासी जुटे थे. साध्वी ऋतम्भरा, आचार्य धर्मेंद्र, गिरिराज किशोर और स्वामी परमानंद सहित राम मंदिर आंदोलन के अनेक चेहरे शामिल हुए थे. नईदुनिया ने विजय मनोहर तिवारी को इस कवरेज में लगाया था. दिग्विजय सिंह तब मुख्यमंत्री थे और प्रदेश के इस हिस्से में हिंदू संगम के सफल आयोजन ने राजनीति का भविष्य लिख दिया था. दो पेज के विजय और नईदुनिया की टीम के विस्तृत कवरेज की आलोचना जनसत्ता के संपादकीय पेज पर अखबारों के कॉलम में हुई थी. तब प्रभाष जोशी सक्रिय थे.
इंदौर में मेरे साथ सिटी रिपोर्टिंग के दायरे के बाहर विजय की धुंआधार रिपोर्टिंग का दूसरा प्रमाण धार की भोजशाला के कवरेज का है. वे अकेले पत्रकार थे जिन्होंने भोजशाला को कानून व्यवस्था का नहीं बल्कि इतिहास और संस्कृति का विषय मानकर लिखा. इसके लिए बंदे ने इतिहासकार डॉ शशिकांत भट्ट के साथ उज्जैन, धार और मांडू के स्मारक जाकर देखे. परमार राजाओं के इतिहास को खंगाला. गहरे अध्ययन और शोध से उनके हर कवरेज आज तक याद किए जाते हैं. मैं कह सकता हूं कि भोजशाला के संघर्ष में वे अग्रिम पंक्ति में रहे हैं. उनकी खबरें इतनी तथ्यात्मक होती थीं कि नईदुनिया में छपी उनकी खबरें तरुण विजय पाञ्चजन्य में साभार छापते थे. और भी कई विषय रहे हैं. गुजरात में स्वाध्याय परिवार के गांवों की उनकी रिपोर्टिंग ने उन्हें संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय लोगों से जोड़ दिया था. कृषि क्षेत्र में उनकी रिपोर्टिंग को मैं बेमिसाल मानता रहा हूं.
और हां, भारत के इतिहास में मुगल काल को लेकर उनकी अपनी तीखी दृष्टि रही है क्योंकि इतिहास के भीतर उन्होंने गहरी पैठ लगाई है. हालांकि मुझे कई बार आश्चर्य होता रहा है कि कभी गणित का प्रोफेसर रहा यह व्यक्ति इतिहास पर ऐसी पकड़ कैसे रखता है? मगर यही तो विजय की खासियत है! मुगलकाल को लेकर उनकी दृष्टि से, संभव है कि आप असहमत हों लेकिन उनके अध्ययन और तर्कों का मुकाबला कठिन है. उनकी दो किताबें इस्लाम के विस्तार पर ही हैं. कोई असहमत हो तो दो किताबें लिख कर जवाब दे सकता है.
नईदुनिया के सिटी डेस्क पर विजय से कई बार इतिहास से जुड़े विषयों पर हमारी चचार्एं होती थी. मैंने इतिहास कभी पढ़ा नहीं लेकिन इतिहास के प्रति हमेशा ही अनुराग रहा है इसलिए कई बार मैं अपने ज्ञानवर्धन के लिए विजय के सामने इतिहास के प्रसंगों की चर्चा कर दिया करता था. उन्हें सुनते हुए मुझे लगता था और कई बार मैंने उन्हें कहा भी कि सिटी में खबरों में बेकार की धूल क्यों फांक रहे हो? आप कों तो कहीं प्रोफेसर होना चाहिए था मगर यह भी हम जानते हैं कि वे कॉलेज की नौकरी छोड़कर केवल लिखने के शौक से पत्रकारिता में आए. उनके आने से पत्रकारिता समृद्ध हुई, यह कहने में मुझे कोई परहेज नहीं है. बल्कि मैं तो कहूंगा कि 25 साल तक उनकी पत्रकारिता वास्तव में विश्वविद्यालय की इस कठिन भूमिका में लौटने की लंबी तैयारी ही थी. एक साल के भीतर उन्होंने अपने अनुभव, अपनी लगन और मेहनत से अपने काम की छाप छोड़ी है. हिंदी पत्रकारिता के 200 साल के अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने जिस तरह का सारगर्भित आयोजन किया, वैसा आयोजन देश भर में क्या कहीं और हुआ? देश भर से 60 संपादक, विचारक, शिक्षाविद् और विषय विशेषज्ञ का एक जगह एकत्रित होना और संवाद करना एक बड़ी सफलता रही है. ऐसे आयोजन को लेकर सवाल उठाने को मैं केवल और केवल टिप्पणी करने वालों की ओछी मानसिकता के रूप में ही निरूपित करूंगा. हकीकत तो यह है कि विजय के नवाचारों की चर्चा है और हमें तत्काल मूल्यांकन की बजाए उन्हें पूरा समय देना चाहिए. चार साल के कार्यकाल के बाद ही देखना चाहिए कि वे इस योग्य थे या नहीं.
विजय के बारे में कुछ और बातें जान लें. दैनिक भास्कर में 5 साल स्पेशल रिपोर्टिंग के दौरान भारत की लगातार 8 परिक्रमाएं की हैं, जिन पर छपी किताब का विमोचन भोपाल में ही संघ सुप्रीमो डॉ मोहन भागवत ने किया था. क्या कमाल है कि उनकी सबसे चर्चित किताब हरसूद 30 जून पर टिप्पणी अरुंधति रॉय ने की थी.
ये एक पत्रकार के बड़े धरातल के दो सिरे हैं. वे हर भूमिका में अपने मूल यानी पत्रकारिता में अडिग हैं. कहां का वामपंथ, कैसा दक्षिणपंथ। विजय केवल एक शुद्ध पत्रकार हैं. तभी तो नईदुनिया के दुखद अवसान पर एक जीवंत उपन्यास भी लिखा, जो खूब पढ़ा गया. वे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में भले ही दो चार साल के लिए कुलपति बने हैं, तय मानिए कि भारत में उच्च शिक्षा की दुर्गति या सद्गति पर लिखे बिना रहेंगे नहीं. दिलजलों को जलाने के लिए विजय के पास ज्वलनशील सामग्री भरपूर होनी चाहिए.
एक बात नोट कर लें, ये बंदा किसी को छेड़ता नहीं है और छेड़ने वालों को छोड़ता नहीं है. कम लोग जानते हैं कि नईदुनिया में उनके जिद्दी और उग्र स्वभाव के कारण ही हम उन्हें ऋषि दुवार्सा कहकर ऐसी वैसी परिस्थिति में शांत किया करते थे. कोई न भूले कि वे इसी विश्वविद्यालय में आए दूसरे कुलपतियों की तरह नहीं हैं. उनके भीतर का लेखक और पत्रकार पद के भार में दबा नहीं है. विजय के पास एक सतत सक्रिय कलम है, जो नुकीली भी कम नहीं है. इसलिए अच्छा है कि जलन, कुढ़न और खुन्नस की बजाए बुद्धिमानी से पेश आएं. अगर सच में पत्रकार हैं तो जिस भाषा में पोस्ट पढ़ने में आई हैं, अशोभनीय हैं.


