
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को दिल्ली प्रशासन ने 15,000 की भीड़ के साथ बड़े शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन की अनुमति दे दी। यह वही दिल्ली पुलिस है जिसने 26 नवंबर 2020 को शुरू हुए किसान आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों पर 12-12 इंच लंबी लोहे की कीलें ठोक दी थीं,
गाजीपुर तथा सिंघू बॉर्डर पर 300 से अधिक कंक्रीट के बैरिकेड्स खड़े कर दिए थे। करीब 365 दिनों तक चले उस आंदोलन में देश के 750 किसानों ने अपनी जान गंवाई थी, लेकिन उन्हें दिल्ली की सीमा में घुसने तक नहीं दिया गया था।
आज देश में बेरोजगारी की दर 15.4% और महंगाई दर 6.2% को पार कर चुकी है, तब अचानक एक नई पार्टी को दिल्ली के दिल में इतना ‘फ्री पास’ मिलना कहीं असली मुद्दों को दबाने की कोई फिक्सिंग तो नहीं?
अगर आंकड़ों के आधार पर पिछले 12 वर्षों के ’24 घंटे काम करने’ के नैरेटिव का विश्लेषण करें, तो आर्थिक मोर्चे पर देश को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। वर्ष 2014 में देश के ऊपर कुल कर्ज ₹55 लाख करोड़ था, जो 2026 में तीन गुना बढ़कर ₹175 लाख करोड़ के पार जा चुका है, यानी देश का हर नागरिक अनजाने में कर्जदार हो चुका है।
सरकार ने पिछले दशक में जनता के पैसों का ऐतिहासिक अपव्यय किया है, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल सरकारी प्रचार और विज्ञापनों पर ₹6,500 करोड़ से अधिक की राशि फूंकी जा चुकी है।
इसके अलावा, बिना किसी ठोस वित्तीय ऑडिट के पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) में जनता से लिए गए ₹11,000 करोड़ से अधिक के फंड को आरटीआई (RTI) के दायरे से पूरी तरह बाहर रखकर पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा दी गईं।
चौबीस घंटे काम करने का दावा करने वाली इस व्यवस्था ने पिछले 12 सालों में 25 से अधिक मुनाफे में चल रही नवरत्न और मिनीरत्न सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी को निजी कॉरपोरेट्स के हवाले कर दिया।
महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के नाम पर बनी सरकारी स्कीमों की हकीकत को अगर सांख्यिकी के तराजू पर तौलें, तो परिणाम बेहद चौंकाने वाले और खोखले दिखाई देते हैं। वैश्विक भूख सूचकांक (Global Hunger Index) में भारत खिसककर 127 देशों में 105वें स्थान पर आ चुका है, जो यह साबित करता है कि बच्चों के लिए बनी मिड-डे मील और पोषण योजनाएं कुपोषण को रोकने में 82% तक विफल रही हैं।
उज्ज्वला योजना के तहत बांटे गए सिलेंडरों में से 45.8% ग्रामीण परिवारों ने ₹1,100 से अधिक की रीफिलिंग कीमत होने के कारण दोबारा पारंपरिक चूल्हा अपना लिया है।
रेलवे मंत्रालय ने कोरोना काल का हवाला देकर सीनियर सिटीजन्स को मिलने वाली 40% से 50% की रियायत को जो बंद किया था, उससे सरकार ने बुजुर्गों की जेब से ₹5,200 करोड़ से अधिक का अतिरिक्त राजस्व वसूला है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए निर्भया फंड के ₹9,000 करोड़ के बजट का लगभग 35% हिस्सा राज्यों द्वारा बिना इस्तेमाल किए धूल फांक रहा है, जबकि एनसीआरबी (NCRB) के अनुसार महिला अपराधों में 15% की वार्षिक वृद्धि दर्ज हुई है।
इस भयंकर आर्थिक मिसमैनेजमेंट के बीच अगर भारत की उन ऐतिहासिक बुनियादों को देखें जो जनता की नजरों से दूर रखी गईं, तो देश को बनाने वाली प्रशासनिक दूरदर्शिता साफ समझ आती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि जब 1991 में देश के पास महज 14 दिनों का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) बचा था, तब बिना किसी शोर-शराबे के आर्थिक उदारीकरण (Liberalization) की नीति लागू करके देश की जीडीपी को अगले दो दशकों में 800% से अधिक की ग्रोथ दी गई थी।
आज जिस इसरो (ISRO) के अंतरिक्ष मिशनों पर पूरा देश गर्व करता है, उसकी नींव 1962 में ‘इन्कोस्पार’ (INCOSPAR) के रूप में तब रखी गई थी जब देश बेहद गरीब था, और बिना किसी राजनीतिक पीआर के वैज्ञानिकों को 100% बजटीय स्वायत्तता दी गई थी।
देश को वैश्विक महामारी पोलियो से मुक्त कराने के लिए 1995 में जो ‘पल्स पोलियो अभियान’ शुरू किया गया था, उसी के माइक्रो-प्लानिंग मॉडल की बदौलत देश के 17 करोड़ से अधिक बच्चों को सुरक्षित किया गया था, जिसका ढिंढोरा कभी किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं पीटा गया।
भारत को खाद्यान्न संकट से उबारने के लिए 1960 के दशक में शुरू की गई ‘हरित क्रांति’ और दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने वाली ‘श्वेत क्रांति’ (Operation Flood) जैसी नीतियां किसी एक चेहरे को चमकाने के लिए नहीं, बल्कि देश के संस्थागत ढांचे को मजबूत करने के लिए लागू की गई थीं।
परिणामस्वरूप भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और अनाज निर्यात में शीर्ष 5 देशों में शामिल है, जिसकी नींव दशकों पहले बिना किसी तामझाम के रख दी गई थी।
आज 2026 में देश का आम नागरिक जब जंतर-मंतर की नौटंकी और सड़कों पर बिछाई गई कीलों की तुलना करता है, तो उसे समझ आता है कि देश विज्ञापनों और इवेंट्स से नहीं, बल्कि शांत और मजबूत आर्थिक फैसलों से चलता है।
जुमलों और नफरत की राजनीति के इस दौर में अब जनता समझदार हो चुकी है और वह विकास के उस पुराने, गंभीर और समावेशी मॉडल की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है जिसने चुपचाप भारत को विश्व गुरु बनाया था।


