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    कांग्रेसियों की औकात से बहुत बड़ा है कार्पोरेट का योगदान

     

    -आलोक सिंघई-
    मध्यप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी कांग्रेस के बीच इन दिनों तनातनी का दौर चल रहा है। कई शहरों में आपसी गुत्थमगुत्थी आज की ताजा खबर है। इंदौर में कांग्रेसियों ने हमला किया तो भोपाल में भाजपाईयों ने कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में कोहराम मचा दिया। ये सारा मामला उस मुद्दे पर जोर पकड़ा जिसमें अडानी का नाम आने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को औकात में रहने की नसीहत दे दी थी। कैलाश पिछले कुछ दिनों से इंदौर के भागीरथपुरा में गंदा पेयजल सप्लाई होने से होने वाली पैंतीस से चालीस मौतों के बाद से निशाने पर चल रहे हैं। भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी कैलाश के अनुकूल नहीं है। ऐसे में उनके तैश में दिए बयान को उनकी दंभोक्ति माना गया। सदन में हंगामे के बाद उन्होंने अपने कथन पर दुख व्यक्त किया और मुख्यमंत्री ने भी माफी मांगी। जाने अन जाने में हुए इस संवाद ने न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर किया है कि कांग्रेसियों की मुफ्तखोरी और भिखारी सोच को आखिर कैसे बदला जा सकता है। अनुत्पादक सरकारी सेक्टर और डिफाल्टरों का कर्जा माफ करने वाली फोकटिया सोच को कुचलकर उत्पादकता बढ़ाने वाली सोच को कैसे विकसित किया जा सकता है।

    कांग्रेस के राजपुत्र राहुल गांधी को देश के लोग यदि पप्पू कहते हैं तो कांग्रेसी इसे भाजपाईयों का दुष्प्रचार कहकर आगे बढ़ जाते हैं। जवाहर लाल नेहरू के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस सरकारीकरण की नींव रखी थी उसकी वजह से देश की विकास दर बहुत धीमी गति से बढ़ सकी है। आज 357.14 लाख करोड़ रुपये (GDP USD 4.18 ट्रिलियन) अर्थव्यवस्था वाला हिंदुस्तान तब सामने आया है जब उसने 2026 की शुरुआत तक कुल सार्वजनिक ऋण (आंतरिक और बाहरी) लगभग 197-200 लाख करोड़ रुपये के बीच ले रखा है। हमें सोचने पर मजबूर होना ही पड़ेगा कि कथित आजादी के लगभग 78 सालों बात तक हम करते क्या रहे हैं। लगभग 147 करोड़ आबादी वाले जिस देश में लगभग सौ करोड़ कार्यबल मौजूद हो उसका उपयोग अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में क्यों नहीं किया जा सका इस मुद्दे पर हमें विचार अवश्य करना होगा। आजादी के बाद यदि हमने केवल डेढ़ सौ लाख करोड़ रुपयों का योगदान किया तो इसकी वजह क्या

    रही होगी हमें इस पर अवश्य विचार करना होगा।

    भारत सरकार ने देश के लगभग पचास लाख लोगों को नौकरी दे ऱखी है। जबकि इसके विपरीत कार्पोरेट सेक्टर और निजी क्षेत्र मिलकर शेष लगभग सत्तर लाख परिवारों का जीवन रोशन कर रहा है । टाटा समूह में 7,50,000 कर्मचारी हैं। एल एंड टी में 3,38,000 लोग कार्यरत हैं। इंफोसिस में 2,60,000 कर्मचारी हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा के 2,60,000 कर्मचारी हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज के 2,36,000 लोग हैं। विप्रो में 2,10,000 कर्मचारी हैं। एचसीएल में 1,67,000 कर्मचारी हैं। एचडीएफसी बैंक में 1,20,000 कर्मचारी हैं। आईसीआईसीआई बैंक में 97,000 कर्मचारी हैं। टीवीएस समूह में 60,000 कर्मचारी हैं। मात्र ये दस कंपनियां मिलकर लगभग 25 लाख भारतीयों को रोजगार

    देती हैं वो भी सम्मानजनक वेतन के साथ।

    ये केवल वो आँकड़े हैं जो इनके डायरेक्ट पेरोल पर हैं। इनके अलावा ऑफ रोल्स, ऐसोशिएट्स, डीलर्स, एजेंट्स, इनके प्रोडक्ट्स से जुड़े सहायक प्रोडक्ट्स की कंपनियां। इनके सहारे जन्मी पैकेजिंग कंपनियां, ट्रांसपोर्ट सेक्टर। लिस्ट बहुत लंबी है। किसी कंपनी के अगर डायरेक्ट 1 लाख कर्मचारी हैं तो मान के चलिए कि कम से कम चार लाख ऐसे हैं जिनका चूल्हा उसी कम्पनी के कारण चलता है। यहां बात मात्र 10 बड़ी कंपनियों की हो रही है। हजारों ऐसी प्राइवेट कंपनियां हैं जो देश में रोजगार पैदा कर रही हैं। ये 25 लाख कॉर्पोरेट नौकरियां भारत में पिछले 78 वर्षों में सृजित कुल केंद्र सरकार की नौकरियों (48.34 लाख) के आधे से अधिक हैं।

    राहुल गांधी जिस तरह अडानी अंबानी की सरकार कहकर मोदी सरकार पर कीचड़ उछालते फिरते हैं इनमें से अधिकतर घराने तो कभी कांग्रेसियों की काली कमाई और संरक्षण से ही शुरु हुए थे। सरकारी खजाने से चुराया धन कार्पोरेट घरानों में लगाकर ब्याज खाने की आदत के कारण ही नेहरू गांधी परिवार आज एक अभेद्य विरासत वाला राजघराना बन सका है। बार बार उन्हें समझाया जाता है कि निजी क्षेत्र का सम्मान करें, उन्हें गालियों से मत नवाजें। अपने राजनैतिक एजेंडे और पसंद नापसंद के कारण उन लोगों का मजाक ना उड़ायें जो देश के विकास में बहुत बड़े सहभागी हैं। नौकरी

    देने वालों के लिए जयकार जयकार भले ना करें लेकिन उन्हें इज़्ज़त देना तो सीखिए।वे लाखों भारतीयों के लिए आजीविका पैदा कर रहे हैं।

    भारत के आर्थिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने की नीति अपनाई गई थी। बाद के दशकों में उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी और निजी—दोनों क्षेत्रों की ताकतों का संतुलित उपयोग हो।

    मध्यप्रदेश की हालिया राजनीतिक तनातनी इसी व्यापक राष्ट्रीय बहस का एक स्थानीय प्रतिबिंब है। व्यक्तिगत कटाक्ष और टकराव से न तो विकास का रास्ता निकलेगा और न ही लोकतांत्रिक गरिमा की रक्षा होगी। राज्य और देश, दोनों के हित में यही

    होगा कि राजनीतिक दल विचारधारात्मक मतभेदों को शालीन संवाद के माध्यम से सामने रखें और आर्थिक नीति पर ठोस, तथ्याधारित चर्चा करें।

    आखिरकार भारत जैसे 147 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—रोजगार, उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा। यदि आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध भविष्य का निर्माण करना है, तो सरकार और निजी क्षेत्र को परस्पर विरोधी ध्रुवों की तरह नहीं, बल्कि सहयोगी साझेदारों की तरह देखना होगा। राजनीति की गर्मी के बीच यही संतुलित दृष्टिकोण देश को आगे ले जा सकता है।

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