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    मध्यप्रदेश की मोहन सरकार में 30 हजार करोड़ का माइनिंग घोटाला?

     

    मध्यप्रदेश में कथित 30 हजार करोड़ रुपये के माइनिंग घोटाले का मामला अब केवल चर्चाओं या राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका के संज्ञान में आ चुका है। इस प्रकरण पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने गंभीर रुख अपनाते हुए दायर जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है। यह याचिका श्री दिलीप सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसे हाईकोर्ट में रिट पिटीशन क्रमांक 41873/2025 के रूप में पंजीकृत किया गया है। हाईकोर्ट के अभिलेखों के अनुसार यह मामला वर्तमान में विचाराधीन है और अदालत ने इसे सुनवाई योग्य मानते हुए राज्य सरकार तथा संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया है।

    हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसकी अध्यक्षता माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री विनय सराफ कर रहे हैं, के समक्ष 4 फरवरी 2026 को इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह बाद मामले को पुनः सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए। न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर दर्ज जानकारी के अनुसार अगली संभावित सुनवाई 6 मार्च 2026 निर्धारित की गई है। इससे स्पष्ट है कि अदालत इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि मध्यप्रदेश में बीते कई वर्षों से खनन के नाम पर बड़े पैमाने पर नियमों की अनदेखी की जा रही है। रेत, गिट्टी, मुरम, पत्थर और अन्य खनिजों का अवैध उत्खनन न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर किया गया, बल्कि इससे राज्य सरकार को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान भी हुआ। याचिकाकर्ता का दावा है कि यदि वास्तविक खनन और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़ों की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराई जाए, तो यह नुकसान लगभग 30 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।

    याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई स्थानों पर खनन पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना किया गया, नदियों के किनारों और नदी तल में खुलेआम भारी मशीनों का उपयोग हुआ तथा रॉयल्टी और ट्रांजिट पास में व्यापक अनियमितताएँ पाई गईं। आरोप है कि इन गतिविधियों के पीछे खनन माफिया, ठेकेदारों, कुछ अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय रहा, जिसके कारण कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई जाती रही।

    हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि प्रथम दृष्टया अदालत को आरोप गंभीर प्रतीत हुए हैं। चूँकि यह जनहित याचिका है, इसलिए मामला किसी एक व्यक्ति या जिले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की खनिज संपदा और जनता के व्यापक हित से जुड़ा हुआ है। यदि अदालत इस प्रकरण में किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या विशेष जांच दल के गठन का आदेश देती है, तो प्रदेश की राजनीति और प्रशासन—दोनों में बड़ा प्रभाव पड़ना तय है।

    सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि खनन पूरी तरह नियमों के अनुरूप हो रहा था, तो 30 हजार करोड़ रुपये के संभावित नुकसान का अनुमान आखिर किस आधार पर सामने आया। सरकार और खनिज विभाग की अब तक की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। वर्षों से अवैध खनन की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन ठोस और निर्णायक कार्रवाई बहुत कम देखने को मिली। अब जबकि मामला सीधे अदालत के समक्ष है, जवाबदेही से बचना आसान नहीं होगा।

    आने वाले दिनों में हाईकोर्ट की अगली सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह मध्यप्रदेश के इतिहास के सबसे बड़े खनन घोटालों में से एक सिद्ध हो सकता है। प्रदेश की प्राकृतिक संपदा जनता की धरोहर है और उस पर किसी भी प्रकार की लूट सीधे तौर पर जनहित पर प्रहार है। अब सभी की निगाहें न्यायालय पर टिकी हैं कि वह इस कथित 30 हजार करोड़ रुपये के माइनिंग घोटाले की परतें कैसे खोलता है और दोषियों तक कानून का शिकंजा कैसे पहुँचाता है।

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