More
    Homeप्रदेश“जनसंपर्क या जन से संपूर्ण दूरी?”

    “जनसंपर्क या जन से संपूर्ण दूरी?”

    यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, यह उस व्यवस्था की सच्चाई है जिसे जनसंपर्क कहा जाता है, लेकिन जो जनता से सबसे अधिक दूर खड़ी दिखाई देती है। हमने जनसंपर्क विभाग को बीस से अधिक आवेदन दिए। दस आवेदन अलग-अलग अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर सौंपे गए और दस आवेदन डाक के माध्यम से भेजे गए, ताकि कोई यह न कह सके कि कागज़ पहुँचा ही नहीं। हर आवेदन के साथ यह उम्मीद जुड़ी थी कि शायद इस बार बात सुनी जाएगी, शायद इस बार किसी अधिकारी की मेज़ पर फ़ाइल खुलकर पढ़ी जाएगी। लेकिन हर बार वही नतीजा निकला—खामोशी।

    आवेदन देने के बाद जब कोई जवाब नहीं आया तो हमने इंतज़ार किया। नियमों का पालन किया, समय दिया, प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। लेकिन जब महीनों बीत गए और कहीं से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो हमने निवेदन का रास्ता अपनाया। सोचा, शायद विनम्रता काम कर जाए, शायद मानवीय संवेदना जाग जाए। लेकिन यहाँ निवेदन भी उतना ही बेअसर साबित हुआ जितना आवेदन। हर सवाल के जवाब में एक ही वाक्य सुनने को मिला—“कमिटी का गठन हो गया है” या “कमिटी बनने वाली है।”

    यह कमिटी जनसंपर्क की सबसे सुरक्षित ढाल बन चुकी है। जब भी कोई सवाल असहज होता है, जब भी किसी फ़ाइल पर निर्णय लेना पड़ता है, कमिटी को सामने कर दिया जाता है। ऐसी कमिटी—जो न दिखाई देती है, न जिसकी बैठकों का कोई रिकॉर्ड सार्वजनिक होता है, न जिसके फैसलों की कोई समय-सीमा तय होती है। कमिटी यहाँ समाधान नहीं, टालने का औज़ार बन चुकी है। यह व्यवस्था का वह हिस्सा है जो जवाबदेही को खत्म करता है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आवेदन और निवेदन दोनों बेकार हो जाएँ, तो नागरिक क्या करे? क्या अगला चरण सचमुच “दे धनाधन” का है? क्या जनसंपर्क का अर्थ यही रह गया है कि बिना चढ़ावे के कोई सुनवाई नहीं होगी? अगर ऐसा है, तो फिर नियम, प्रक्रिया, पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई के नाम पर खड़ा किया गया पूरा ढांचा केवल दिखावा क्यों है?

    यह स्थिति केवल एक कार्यालय की नहीं है, यह पूरे तंत्र की बीमारी है। यहाँ अधिकारी कुर्सी पर बैठे रहते हैं, लेकिन जनता के सवाल उन्हें विचलित नहीं करते। यहाँ फ़ाइलें तो चलती हैं, पर न्याय नहीं चलता। जवाब देने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं होती, और हर अधिकारी यह मानकर चलता है कि अगला अधिकारी देख लेगा। इसी मानसिकता ने जनसंपर्क को जन-विरोधी बना दिया है।

    सबसे दुखद बात यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है। किसी को न डर है, न शर्म। आवेदन दब जाए तो कोई जवाबदेह नहीं, निवेदन अनसुना रह जाए तो कोई दोषी नहीं। उल्टा सवाल पूछने वाले को ही संदेह की नज़र से देखा जाता है, मानो उसने कोई अपराध कर दिया हो। व्यवस्था धीरे-धीरे नागरिक को ही दोषी साबित करने लगती है।

    अब यह सवाल केवल हमारे आवेदन का नहीं रहा, यह व्यवस्था की नीयत का प्रश्न बन गया है। अगर जनसंपर्क विभाग जनता की बात नहीं सुनेगा, तो फिर जनता किसके पास जाएगी? अगर सरकारी तंत्र का यही चेहरा है, तो लोकतंत्र का अर्थ क्या बचता है? क्या नागरिक सिर्फ टैक्स देने, वोट डालने और चुप रहने के लिए है?

    अब धैर्य जवाब दे चुका है। यह लड़ाई अब काउंटर और दफ्तरों की नहीं, न्यायालय की होगी—जहाँ कमिटी की आड़ नहीं चलेगी, जहाँ मौखिक आश्वासन नहीं बल्कि लिखित जवाब देना पड़ेगा। जहाँ सवाल फाइलों में नहीं, कठघरे में पूछे जाएंगे। अब वही लोग आमने-सामने होंगे, जो आज खुद को नियमों के पीछे छिपा रहे हैं।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Must Read

    spot_imgspot_imgspot_imgspot_img