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    मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव

    मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव

    मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस द्वारा मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले ने एक बार फिर पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन के बीच चल रही खींचतान को उजागर कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा थी कि राज्य के वरिष्ठ नेताओं की पसंद को महत्व दिया जाएगा, लेकिन राहुल गांधी ने अंततः अपने विश्वासपात्र चेहरे पर दांव लगाया।

    कांग्रेस की एकमात्र संभावित राज्यसभा सीट को लेकर जिस प्रकार की अंदरूनी रस्साकशी सामने आई है, वह यह संकेत देती है कि पार्टी में निर्णय प्रक्रिया और जमीनी नेतृत्व के बीच सामंजस्य का अभाव है। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव और कमलेश्वर पटेल जैसे नामों की चर्चा के बावजूद अंतिम निर्णय हाईकमान ने लिया, जिससे स्थानीय नेतृत्व की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

    मीनाक्षी नटराजन निश्चित रूप से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन लंबे समय से मध्य प्रदेश की सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका सीमित रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह चयन संगठन की आवश्यकता के आधार पर हुआ है या केवल केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता के कारण।

    केरल में विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद के चयन को लेकर लंबे समय तक चर्चाएं चलती रहीं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना था कि राहुल गांधी के निकट माने जाने वाले नेताओं का प्रभाव निर्णायक हो सकता है, लेकिन अंततः प्रदेश की राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए नेतृत्व का फैसला उस दिशा में गया, जिसे राज्य की वास्तविक शक्ति संरचना अधिक स्वीकार्य मानती थी। इस घटनाक्रम ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस हाईकमान की इच्छा और प्रदेश की राजनीतिक मजबूरियां हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।

    दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि संगठन में निष्ठा और समर्पण का सम्मान सर्वोपरि है। भाजपा ने जहां राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व को अवसर दिया है, वहीं लंबे समय से पार्टी के लिए काम कर रहे साधारण कार्यकर्ता रजनीश अग्रवाल को भी राज्यसभा का उम्मीदवार बनाकर कार्यकर्ता-आधारित राजनीति की अपनी परंपरा को मजबूत किया है।

    रजनीश अग्रवाल का चयन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि उन्होंने न तो दिल्ली में लॉबिंग की और न ही टिकट के लिए किसी प्रकार की सार्वजनिक सक्रियता दिखाई। यह भाजपा की उस कार्यसंस्कृति को रेखांकित करता है जिसमें संगठन के प्रति समर्पण को महत्व दिया जाता है। पार्टी पहले भी आलोक संजर, कई प्रदेश अध्यक्षों और मुख्यमंत्रियों के चयन में ऐसे निर्णय लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षकों को चौंकाती रही है।

    राज्यसभा में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए भाजपा लगातार रणनीतिक रूप से आगे बढ़ रही है। यदि पार्टी मध्य प्रदेश से तीसरा उम्मीदवार उतारने का निर्णय लेती है, तो मुकाबला रोचक हो सकता है। ऐसे परिदृश्य में कांग्रेस की आंतरिक एकजुटता भी परीक्षा के दौर से गुजरेगी, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के छत्रप जिसे उम्मीदवार बनाना चाहते थे, उसे दरकिनार कर राहुल गांधी ने अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है। यदि भाजपा ने तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतार दिया, तो फिर क्रॉस वोटिंग होने की गुंजाइश बनती है और राहुल गांधी का उम्मीदवार पराजित हो सकता है, लेकिन भाजपा इस तीसरे उम्मीदवार को चुनाव मैदान में नहीं लाती है, तो फिर भाजपा के दोनों और कांग्रेस का एक उम्मीदवार निर्विरोध जीत जाएगा!

    वर्तमान परिस्थितियां यह भी दर्शाती हैं कि कांग्रेस में युवा नेतृत्व और पुराने क्षत्रपों के बीच मतभेद समाप्त नहीं हुए हैं। राज्यसभा टिकट के बहाने यह अंतर्विरोध फिर सतह पर दिखाई देने लगा है। राहुल गांधी ने भले ही अपना निर्णय लागू करा दिया हो, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता इसे किस हद तक स्वीकार करते हैं।

    इसके विपरीत भाजपा अपने संगठन विस्तार, कार्यकर्ता सम्मान और नए नेतृत्व को अवसर देने की रणनीति के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। यही कारण है कि पार्टी लगातार अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने में सफल रही है।

    राज्यसभा चुनाव का परिणाम चाहे जो हो, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने एक बार फिर कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियों और भाजपा की संगठनात्मक मजबूती के बीच स्पष्ट अंतर को सामने ला दिया है। कृष्णकांतअग्निहोत्री

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