
साल 1997 में बनारस के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने बेटे के लिए दवा लेने निकले थे। महानगर बस में सीट को लेकर एक यात्री से उनका विवाद हो गया। मामला सुंदरपुर चौकी पहुंचा, जहां तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह ने उन पर यात्री की जेब से 100 रुपये चोरी करने का आरोप लगाकर जेल भेज दिया।
आरोप है कि हिरासत में राजेंद्र प्रसाद सिंह को इतनी प्रताड़ना दी गई कि उनकी मौत हो गई। इसके बाद मामले की जांच दरोगा राधेश्याम सिंह को सौंपी गई, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि राजेंद्र ने शॉल का फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली। अगले दिन बीएचयू में पोस्टमार्टम हुआ और डॉक्टर के.के. जैन ने भी अपनी रिपोर्ट में मौत का कारण फंदा बताया। इतना ही नहीं, पुलिस ने परिजनों को बिना सूचना दिए उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।
राजेंद्र प्रसाद सिंह की पत्नी ने हार नहीं मानी और मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। लगभग 29 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब अदालत का फैसला आया है। तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल की सजा, राधेश्याम सिंह को 6 महीने की सजा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टर के.के. जैन को 5 साल की सजा तथा जुर्माना सुनाया गया है।
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जहां सच को दबाने, रिकॉर्ड बदलने और न्याय को वर्षों तक टालने की कोशिश की गई। अगर एक परिवार 29 साल तक लड़ता न रहता, तो शायद यह सच कभी सामने ही नहीं आता।
सोचिए, न्याय मिलने में 29 साल लग जाएं तो यह जीत है या हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता?
Via @Mihilesh Dhar Dubey


