मध्यप्रदेश भाजपा का चाणक्य आचार्य रजनीश अग्रवाल ?
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
भारतीय राजनीति में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मंच पर दिखाई देते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो मंच तैयार करते हैं। कुछ लोग भाषण देकर तालियाँ बटोरते हैं और कुछ लोग उन तालियों की व्यवस्था करते हैं। कुछ लोग चुनाव जीतने के बाद अखबारों की सुर्खियाँ बनते हैं और कुछ लोग चुनाव जितवाने के बाद भी संगठन के किसी कमरे में बैठकर अगले चुनाव की रणनीति बना रहे होते हैं। राजनीति के इस दूसरे वर्ग के लोगों को आम जनता कम जानती है, लेकिन संगठन उन्हें अच्छी तरह पहचानता है। मध्यप्रदेश भाजपा में यदि ऐसे नेताओं की सूची बनाई जाए तो रजनीश अग्रवाल का नाम उसमें प्रमुखता से शामिल होगा।
हाल ही में भाजपा ने उन्हें मध्यप्रदेश से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में अचानक चर्चा शुरू हो गई कि आखिर यह नेता कौन है जो वर्षों तक पर्दे के पीछे काम करता रहा और एक दिन सीधे संसद के उच्च सदन की ओर बढ़ चला? तब लोगों को याद आया कि भाजपा में केवल भाषण देने वालों का ही नहीं, बल्कि संगठन को सींचने वालों का भी मूल्यांकन होता है।
वैसे राजनीति में “चाणक्य” शब्द बड़ा खतरनाक है। यह ऐसा विशेषण है जो किसी नेता को मिल जाए तो उसके समर्थक उसे रणनीति का महर्षि मानने लगते हैं और विरोधी उसे चालों का जादूगर समझने लगते हैं। लेकिन रजनीश अग्रवाल के संदर्भ में जब कार्यकर्ता उन्हें “संगठन का चाणक्य” कहते हैं तो उसका कारण केवल उनका पद नहीं बल्कि उनकी कार्यशैली मानी जाती है।
कहते हैं कि राजनीति में चुनाव केवल मंचों पर नहीं जीते जाते। चुनाव बूथों पर जीते जाते हैं। मतदाता के घर तक पहुँचने वाले कार्यकर्ता, मतदान केंद्र तक पहुँचने वाली रणनीति और संगठन के अंतिम छोर तक फैला नेटवर्क ही किसी दल की वास्तविक शक्ति होता है। भाजपा ने पिछले तीन दशकों में जिस बूथ आधारित संगठनात्मक मॉडल को विकसित किया है, उसमें रजनीश अग्रवाल जैसे नेताओं की भूमिका को अक्सर महत्वपूर्ण माना जाता है।
उनकी राजनीतिक यात्रा भी किसी फिल्मी पटकथा जैसी नहीं रही। न कोई राजनीतिक विरासत, न कोई राजवंश और न ही कोई पारिवारिक सत्ता केंद्र। सागर जिले के मंडी बामोरा से निकलकर विद्यार्थी परिषद की राजनीति में सक्रिय होना और फिर धीरे-धीरे भाजपा संगठन की सीढ़ियाँ चढ़ना अपने आप में एक लंबा सफर है। यह वही रास्ता है जिसमें लालबत्ती का आकर्षण कम और संगठन की बैठकों का धैर्य अधिक चाहिए होता है।
विद्यार्थी परिषद से निकले अधिकांश कार्यकर्ताओं की तरह उन्होंने भी छात्र राजनीति में नारे लगाए होंगे, पोस्टर चिपकाए होंगे, धरनों में भाग लिया होगा और संगठनात्मक प्रशिक्षण शिविरों में घंटों बैठकर विचारधारा की पाठशाला पढ़ी होगी। राजनीति में यह वह विश्वविद्यालय है जहाँ डिग्री नहीं मिलती, लेकिन नेतृत्व का निर्माण होता है।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने पत्रकारिता की शिक्षा भी प्राप्त की। अब पत्रकारिता और राजनीति का रिश्ता बड़ा रोचक होता है। पत्रकार खबर खोजता है और राजनेता कोशिश करता है कि खबर उसके पक्ष में बने। पत्रकार सवाल पूछता है और नेता जवाब देने से बचने की कला सीखता है। ऐसे में पत्रकारिता पढ़कर राजनीति में आना शायद दोनों पक्षों को समझ लेने जैसा अनुभव रहा होगा।
भाजपा संगठन में उन्होंने प्रदेश महामंत्री, प्रदेश मंत्री, प्रवक्ता और बूथ प्रबंधन प्रभारी जैसे कई महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। यह वे पद हैं जिनके नाम आम मतदाता को शायद याद न रहें, लेकिन संगठन में इनकी भूमिका किसी मशीन के इंजन जैसी होती है। इंजन दिखाई नहीं देता, लेकिन पूरी गाड़ी उसी से चलती है।
राजनीति में एक वर्ग वह भी होता है जिसे चुनावी मौसम का मौसम वैज्ञानिक कहा जा सकता है। उन्हें पता होता है कि किस जिले में संगठन मजबूत है, कहाँ कार्यकर्ता नाराज हैं, किस बूथ पर अतिरिक्त मेहनत की आवश्यकता है और कहाँ उम्मीदवार से ज्यादा संगठन का चेहरा काम करेगा। रजनीश अग्रवाल को भाजपा के भीतर इसी श्रेणी का नेता माना जाता है।
आज के दौर में जब राजनीति सोशल मीडिया की चमक और टीवी डिबेट की आवाज़ में सिमटती दिखाई देती है, तब संगठन के पुराने कार्यकर्ता अक्सर यह शिकायत करते हैं कि मेहनत करने वालों की जगह चेहरे पहचान लिए जाते हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक संगठन में काम करने के बाद राज्यसभा तक पहुँचता है तो कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिलता है कि पार्टी अभी भी केवल चेहरों की नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की भी है।
हालाँकि राजनीति में सम्मान और पुरस्कार का समय हमेशा रोचक होता है। वर्षों तक मेहनत करने वाले कार्यकर्ता जब किसी साथी को ऊँचे पद पर पहुँचते देखते हैं तो उन्हें अपने संघर्ष का प्रतिबिंब दिखाई देता है। शायद यही कारण है कि रजनीश अग्रवाल के राज्यसभा उम्मीदवार बनने की खबर को भाजपा के अनेक कार्यकर्ताओं ने अपनी जीत के रूप में देखा।
अब यदि राजनीतिके दृष्टि से देखें तो भाजपा में चाणक्य बनने की प्रक्रिया भी बड़ी कठिन है। पहले आपको हजारों कार्यकर्ताओं के नाम याद रखने होंगे। फिर आपको यह भी याद रखना होगा कि कौन सा कार्यकर्ता किस कारण नाराज है और कौन सा किस कारण खुश। आपको चुनावी गणित भी समझना होगा और कार्यकर्ताओं का मनोविज्ञान भी। आपको मंच के सामने खड़े लोगों से ज्यादा मंच के पीछे खड़े लोगों की चिंता करनी होगी। और सबसे बड़ी बात, आपको तब भी काम करना होगा जब आपकी तस्वीर अखबार में न छपे।
यही कारण है कि संगठन आधारित राजनीति में काम करने वाले नेताओं का मूल्यांकन उनके भाषणों से कम और उनके परिणामों से अधिक होता है। वे कितने लोकप्रिय हैं, यह भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वे संगठन को कितना प्रभावी बना पाते हैं।
राज्यसभा का टिकट मिलना केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं बल्कि संगठनात्मक यात्रा का सार्वजनिक सम्मान भी माना जा सकता है। यह उस विचार का सम्मान है जिसमें कार्यकर्ता पहले आता है और पद बाद में। कम से कम संदेश तो यही दिया गया है।
अब दिल्ली की राजनीति उनका नया कार्यक्षेत्र होगी। वहाँ राष्ट्रीय मुद्दे होंगे, संसद की बहसें होंगी, नीतियों पर चर्चा होगी और देशभर के नेताओं के बीच संवाद होगा। लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए शायद उनकी सबसे बड़ी पहचान वही रहेगी जो वर्षों से रही है एक ऐसा संगठनकर्ता जो सामने कम और पीछे अधिक दिखाई देता है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे केवल राज्यसभा सदस्य की भूमिका तक सीमित रहते हैं या राष्ट्रीय स्तर पर भी संगठनात्मक रणनीति के महत्वपूर्ण सूत्रधार बनते हैं। राजनीति में वास्तविक चाणक्य वही होता है जो सत्ता के गलियारों में पहुँचने के बाद भी संगठन की नब्ज को समझना न भूले।
फिलहाल इतना तय है कि मंडी बामोरा से दिल्ली तक की यह यात्रा भाजपा संगठन की उस परंपरा को फिर चर्चा में ले आई है जिसमें वर्षों तक चुपचाप काम करने वाला कार्यकर्ता एक दिन राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर खड़ा दिखाई देता है। और शायद इसी कारण आज भाजपा के अनेक कार्यकर्ता मुस्कुराते हुए कह रहे हैं “वीर तुम बढ़े चलो, इतिहास गढ़े चलो” का नारा अभी भी संगठन में जीवित है, क्योंकि कभी-कभी मंच के पीछे बैठा रणनीतिकार भी इतिहास के पन्नों में अपनी जगह बना लेता है।


