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    Homeप्रदेशयहाँ हर नेता अटल होना चाहता है ....?

    यहाँ हर नेता अटल होना चाहता है ….?

    यहाँ हर नेता अटल होना चाहता है ….?

    व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

    आजकल राजनीति में एक नई महामारी फैली हुई है “अटल बनने की आकांक्षा”। हर दूसरा नेता मंच पर चढ़ते ही अपनी आवाज़ भारी कर लेता है, शब्दों के बीच लंबा विराम देता है, हाथ हवा में घुमाता है और सोचता है कि जनता भावुक होकर उसे भी इतिहास का महापुरुष घोषित कर देगी।पर समस्या यह है कि अभिनय से व्यक्तित्व नहीं बनता और शब्दों की नकल से विचार पैदा नहीं होते।

    आज सिस्टम में बैठे लोग बेहद व्यस्त दिखाई देते हैं, मगर यह व्यस्तता जनता के प्रश्नों से ज्यादा अपनी छवि गढ़ने में खर्च हो रही है। कोई अपनी जीवनी लिखवा रहा है, कोई कविता संग्रह छपवा रहा है, कोई भाषणों को किताब बनवा रहा है। ऐसा लगता है मानो मंत्रालय कम और प्रकाशन गृह ज्यादा चल रहे हों।

    किसी सरकारी अधिकारी को यदि विभाग से हटकर कोई छोटा-सा सामाजिक कार्य करना हो तो उसे अनुमति पत्र, प्रस्ताव, उद्देश्य और प्रक्रिया का पूरा ब्यौरा देना पड़ता है। उससे पूछा जाता है कि इसका सार्वजनिक हित क्या है? इससे शासन को क्या लाभ होगा?

    लेकिन जब वही अधिकारी या नेता अचानक लेखक, चिंतक, कवि और दार्शनिक बन जाता है, तब कोई प्रश्न नहीं पूछता।
    किताब छप जाती है, विमोचन हो जाता है, मीडिया में फोटो आ जाती है और अगले दिन अखबार में शीर्षक होता है “माननीय की ऐतिहासिक पुस्तक का लोकार्पण।”

    अब कौन पूछे कि महोदय को यह पुस्तक लिखने का समय कब मिला?जनता की समस्याओं के बीच यह साहित्यिक साधना किस तपोवन में सम्पन्न हुई?

    सच तो यह है कि साहित्य और रचना केवल शब्दों का ढेर नहीं होते।एक सच्ची रचना में लेखक का एकांत जलता है, उसकी बेचैनी बहती है, उसके अनुभव बोलते हैं।इतिहास यूँ ही नहीं लिखा जाता। उसके पीछे वर्षों का अध्ययन, असंख्य संवाद, आत्ममंथन और भीतर की आग होती है।

    एक कवि रातों में टूटता है तब जाकर कविता जन्म लेती है।
    एक लेखक अपने भीतर के अंधेरे से लड़ता है तब कोई उपन्यास खड़ा होता है।शब्द केवल लिखे नहीं जाते, जिए जाते हैं।

    लेकिन आजकल कुछ लोगों ने साहित्य को भी सत्ता की तरह उपयोग की वस्तु बना लिया है।पैसा है, पद है, प्रभाव है तो किताब भी चाहिए।बस फिर क्या, किसी लेखक को बुलाइए, भाषणों की फाइल पकड़ाइए और कह दीजिए “कुछ ऐतिहासिक लिख दीजिए।”

    फिर वही पुस्तक किसी बड़े सभागार में प्रकाशित होती है और लेखक पीछे कुर्सियों में बैठा रह जाता है जबकि मुखपृष्ठ पर किसी और का चेहरा चमकता है।

    मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो दूसरों के श्रम पर अपना नाम लिख देते हैं।वे विचारों के किसान नहीं, फसल पर कब्जा करने वाले ज़मींदार हैं।साहित्य में ऐसे लोगों को परजीवी कहा जाता है जो स्वयं सृजन नहीं करते, मगर सृजन का श्रेय हथिया लेते हैं।

    आज हर नेता अपने भीतर अटल बिहारी वाजपेयी खोज रहा है।कोई कविता पढ़ रहा है, कोई विराम लेकर बोल रहा है, कोई राष्ट्रवाद के स्वर में संवाद कर रहा है।लेकिन अटल होना केवल कविता पढ़ लेने से संभव नहीं है।

    अटल जी शब्दों के जादूगर इसलिए नहीं थे कि वे प्रधानमंत्री थे।वे इसलिए अटल थे क्योंकि उनके भीतर एक संवेदनशील कवि जीवित था।उन्होंने सत्ता को साहित्य का साधन नहीं बनाया, बल्कि साहित्य से राजनीति को गरिमा दी।

    उनकी कविताएँ खरी थीं क्योंकि वे किसी पीआर एजेंसी ने नहीं लिखीं। उनके भाषण प्रभावी थे क्योंकि वे भीतर से निकले थे। उनकी चुप्पी भी संवाद करती थी क्योंकि उसमें अनुभव था, अभिनय नहीं।

    आज के नेताओं को समझना होगा कि इतिहास प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं बनता। वह जनता की स्मृति में बनता है। और जनता बहुत समझदार होती है। उसे पता होता है कि कौन सचमुच लेखक है और कौन केवल अपने नाम का मुखपृष्ठ छपवा रहा है।

    अटल जी बनने के लिए पुनर्जन्म नहीं, पुनः आत्मा चाहिए।
    वह आत्मा जो शब्दों को सत्ता से ऊपर रख सके। वह धैर्य जो तालियों से अधिक विचारों को महत्व दे। और वह ईमानदारी जो किसी और की कलम पर अपना नाम लिखने से रोक सके। क्योंकि इतिहास में वही अटल रहता है,जो भीतर से सचमुच अटल हो।

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