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    एक तस्वीर में इंदौर की पूरी थाली और दूसरी में सिंगरौली का आधा समोसा… और जनता पूछ रही है “क्या ये वही मोहन दा हैं?”

     

    एक तस्वीर में इंदौर की पूरी थाली और दूसरी में सिंगरौली का आधा समोसा… और जनता पूछ रही है “क्या ये वही मोहन दा हैं?”

    कभी इंदौर की थाली पर ऐसा न्याय हुआ कि दाल-बाफले से लेकर मिठाई तक लोकतंत्र की तरह समेट ली गई, और आज हाल ये कि आधे समोसे में ही संतोष प्रकट कर दिया गया। लगता है दिल्ली दरबार से “कम खाओ, ज्यादा दिखाओ” वाला नया अनुशासन लागू हो गया है।

    मोहन दा अब सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि “आज्ञाकारी शिष्य” की परिभाषा बन चुके हैं।गुरु का आदेश आया होगा “जनता के बीच सादगी दिखाओ…”तो पूरी थाली वाले नेता ने आधा समोसा पकड़ लिया।

    राजनीति में भूख सिर्फ पेट की नहीं होती, कुर्सी की भी होती है। और कुर्सी बचाने के लिए आदमी पूरी थाली छोड़ सकता है, समोसा आधा कर सकता है, और मुस्कान पूरी रख सकता है।

    जनता भी बड़ी निर्दयी है…वो नेता के भाषण नहीं, प्लेट का आकार याद रखती है।उसे याद है कौन कब कितना खा गया था, और कब कैमरे के सामने “त्याग” का अभिनय करने लगा।

    इंदौर की थाली वाला आत्मविश्वास और सिंगरौली के आधे समोसे वाली विनम्रता यही भारतीय राजनीति का असली डाइट प्लान है। जहाँ नेता पेट से नहीं, परिस्थिति से खाते हैं।rajendra singh jadon

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