द्विज समाज के प्रदर्शन, ज्ञापनों, महिलाओं के धरने से होने वाली सामाजिक, धार्मिक, राजनेतिक, प्रतिक्रिया की सर्जरी प्रदेश शासन ने आग उगलु, बड़बोले, अमर्यादित, आईएएस सन्तोध वर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी। निलंबन में वर्मा का अजाक्स अध्यक्ष पद भी काम नही आया। अपने अध्यक्ष के कदाचार के पक्ष में अभी आजाक्स की क्रिया- प्रतिक्रिया आना बाकी है। सूत्रों का कहना है। आरक्षण के अवांछित, अप्रिय, समाज तोड़क वर्मा की मांग के पक्ष में आजाक्स के अधिकांश प्रभाव शाली मेम्बर नही है। नतीजन हाथ खेच लेने से वर्मा अकेले पड़ गए है। मांग सही हो सकती है। पर तरीका बेहद शर्मनाक, अशोभनीय, अवांछित,बेहूदा था। कोई भी कर्मशील,
स्वभामानी व्यक्ति इस तरह का जहर नही उगल सकता।
द्विज समाज के लिए संतोष वर्मा के निलंबन ने भले ही मल्हम का काम किया हो। मगर वर्मा उवाच ने जो गंदगी परोसी वह बिस्फोट महसूस न करना भूल होगी।
आज भले ही बड़ा विवाद या आजाक्स समारोह की आरक्षण उत्तेजना मान ज्यादा भाव न दे। पर इसके दुर्गामी परिणाम ठीक मंशा इंगित करते नही दिखते है।
वर्मा के ही समाज की एक लड़की बीडीओ कार्यालय में बतौर डाटा इंट्री क्लर्क लगी थी।
बाद में वह सम्पन्न पीएसी परीक्षा पास करके बीडीओ पदस्थ हो गयी। डेटा इंट्री पद पर रहते उसकी नजदीकियां सहयोगी ब्राह्मण क्लर्क से हो गई। बीडीओ पदस्थ होने के बाद उस युवती ने अपने सहयोगी का वरण कर लिया।
मजे की बात जब है परिणय सम्पन्न हुआ तब खंडवा निवासी इसी समाज के जिला पंचायत सीओ जिले में पदस्थ थे। और भी दर्जन भर अधिकारी थे। कर्मचारी थे। चाहते तो वे आपत्ति दर्ज करवा सकते थे। स्मरण कराने पर जिला पंचायत सीओ ने कहा मिया बीबी राजो तो काजी का दखल बेकार है।
जिला पंचायत सीओ ने इस सामाजिक घटना को सहज प्रवर्ति मान उन्होंने मूक मान्यता दे दी। इस घटना के पूर्व ओर बाद में अनेक सम्बन्ध हुए है। हो रहे है। युवा सिर्फ योग्यता,प्रभाव, नेक नीयत, साख को मान्यता देकर किसी बंधन को स्वीकार नही करते।
सिर्फ ये देखते है। कौन अपने धर्म का नही है।सनातनी है तो विदा करने या विदाई कराके लाने में अब पहले जैसी सामाजिक कठोरता बाकी नही बची। इस बंधन को तोड़ने में उच्च शिक्षा और लगी तकनीकी शिक्षा की होड़ का बड़ा हाथ लगता है।
70 के दशक में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन कलेक्टर ने देह शोषण की शिकार रही, घरू काम करने वाली युवतियों को उनका हक दिलाने का मानवीय धर्म निभाया था। अनेक समाजो में बड़ी उम्र तक विवाह न होने पर बैतूल, बालाघाट की युवतियों से विवाह कराने का आम चलन है। वे तमाम युवतियां ससरस् हो परिवार की मतयादो का पालन करके यश लूट रही है।
शायद वर्मा का दुख इंदौर के थाने में दर्ज रिपोर्ट से उपजी जगहंसाई ओर फजिते है। यदि वर्मा कलालरी दिलानेकी बजाय सत्य का सामना करते तो शायद ये अप्रिय स्थिति देखने से बच जाते। सारी लीला के रचयिता वर्मा का अहंकार, बड़बोला पन और अपने ही समाज से कन्नी काटना लगता है।


