
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
लोकसभा में पूछे गए एक अनुत्तरित प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने जो आँकड़े प्रस्तुत किए, वे अपने आप में किसी व्यंग्य से कम नहीं हैं। सरकार के अनुसार मार्च 2014 से नवंबर 2024 तक 365 जातियों और समुदायों के प्रस्ताव ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए विचाराधीन रहे और 147 मामलों में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी सलाह दी। इसे सरल भाषा में समझें तो तस्वीर साफ हो जाती है—पिछले दस वर्षों में औसतन हर दस दिन में एक जाति को “पिछड़ा” घोषित करने की प्रक्रिया चली है। सवाल यह नहीं है कि कोई समुदाय वास्तव में पिछड़ा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या पिछड़ापन अब एक स्थायी सामाजिक सच्चाई है या एक चलती-फिरती सरकारी योजना?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में पिछड़ेपन की अनुभूति से ज्यादा, पिछड़ेपन की सूचना दी जा रही है। कल तक जो व्यक्ति खुद को सामान्य, सक्षम और आत्मनिर्भर मानता था, उसे आज बताया जा रहा है कि वह तो सदियों से शोषित था—बस उसे पता नहीं था। अब सरकार उसे इतिहास भी समझा रही है और प्रमाणपत्र भी थमा रही है। रात को सामान्य नागरिक सोता है और सुबह उठते ही “पिछड़ा वर्ग” का सदस्य बन जाता है। पाँच हजार साल के शोषण की कहानी अब एक नोटिफिकेशन में सिमट जाती है।
मोदी सरकार मंचों से बार-बार कहती है कि वह जातिवाद खत्म करना चाहती है, लेकिन हकीकत यह है कि इस दौर में जाति पहले से ज्यादा संस्थागत हो चुकी है। पहले जाति समाज में थी और राजनीति उसे भुनाती थी, अब जाति स्वयं राजनीति की सबसे बड़ी नीति बन चुकी है। सामाजिक न्याय का मंत्रालय अब सामाजिक संतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक गणित संभालता दिखता है। किस राज्य में कौन-सी जाति कितनी प्रभावशाली है, किस समुदाय को जोड़ने से कितने वोट मिल सकते हैं—पिछड़ेपन की परिभाषा इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है।
विडंबना यह है कि जिन लोगों को यह भरोसा दिलाया गया था कि नया भारत जाति से ऊपर उठेगा, वही भारत आज हर सरकारी सूची में और गहराई से जातियों में बंटता जा रहा है। जाति जनगणना की मांग एक तरफ और ओबीसी सूची का लगातार विस्तार दूसरी तरफ—यह विरोधाभास अपने आप में बहुत कुछ कहता है। अगर पिछड़ापन खत्म करने की ईमानदार कोशिश होती, तो सूची छोटी होती, लंबी नहीं।
सरकार के समर्थक तर्क देते हैं कि यह सामाजिक न्याय का विस्तार है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सामाजिक न्याय का अर्थ केवल सूची में नाम जोड़ देना है? अगर ऐसा होता, तो आज़ादी के 75 साल बाद भी “ongoing exercise” जैसे शब्द सरकारी जवाबों में नहीं दिखाई देते। सच्चाई यह है कि पिछड़ेपन से बाहर निकालने की नीति जितनी कमजोर रही है, पिछड़ेपन को स्थायी पहचान बनाने की नीति उतनी ही मजबूत होती चली गई है।
मोदी सरकार पर आरोप यह नहीं है कि उसने किसी पिछड़े समुदाय को अधिकार दिए, आरोप यह है कि उसने पूरे समाज को पिछड़े और अगड़े खाँचों में इस तरह बाँट दिया है कि सामाजिक एकता लगातार कमजोर होती जा रही है। हिंदू समाज, जिसे एकजुट करने के नारे दिए गए थे, आज आपस में ही प्रमाणपत्रों और श्रेणियों में उलझा हुआ है। जो काम चीन, पाकिस्तान, कांग्रेस और वामपंथी मिलकर भी नहीं कर सके—हिंदू समाज को गहराई से जातियों में बाँटना—वह काम मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में कर दिखाया।
आज स्थिति यह है कि जो ओबीसी सूची में नहीं है, वह खुद को वंचित मानता है और जो सूची में है, वह खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। कारण साफ है—लाभ सीमित हैं, लेकिन दावेदार लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जब हर दस दिन में एक नई जाति पिछड़ी घोषित होगी, तो स्वाभाविक है कि आरक्षण और संसाधनों को लेकर संघर्ष तेज होगा। इसका नतीजा सामाजिक तनाव के रूप में सामने आएगा, जिसका राजनीतिक लाभ अंततः सत्ता को ही मिलेगा।
भविष्य की तस्वीर और भी दिलचस्प है। जिस रफ्तार से जातियाँ जोड़ी जा रही हैं, उस हिसाब से आने वाले वर्षों में अगर ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य और बनिया भी यह कहने लगें कि वे संख्या में कम हैं और उन्हें भी संरक्षण चाहिए, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। तब शायद एक नया विमर्श खड़ा होगा—“सवर्ण भी पिछड़े कैसे हुए?” और सरकार उस वक्त भी कोई नया आयोग, कोई नई समिति और कोई नई सूची लेकर आ जाएगी।
यह व्यंग्य किसी जाति, समुदाय या वर्ग के खिलाफ नहीं है। सवाल व्यवस्था पर है, नीयत पर है और उस राजनीति पर है जो समाज को आगे ले जाने के बजाय उसे स्थायी रूप से पहचान की लड़ाई में उलझाए रखना चाहती है। असली सामाजिक न्याय वह होता है जो व्यक्ति को पिछड़ेपन से बाहर निकालता है, न कि उसे गर्व के साथ पिछड़ेपन का तमगा थमा देता है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार यह तय करे कि वह जाति खत्म करना चाहती है या जातियों का प्रबंधन करना चाहती है—क्योंकि दोनों एक साथ संभव नहीं हैं। जब तक हर समस्या का समाधान नई जाति जोड़ने में खोजा जाएगा, तब तक न समाज आगे बढ़ेगा और न ही राजनीति का स्तर ऊपर उठेगा।
मोदी राज में हर दस दिन में एक जाति का ओबीसी बनना सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है, यह उस राजनीति का आईना है जिसमें सामाजिक सुधार से ज्यादा चुनावी संतुलन झलकता है। और जब समाज को सुधारने की जगह उसे वर्गीकृत करने की होड़ लग जाए, तब सवाल सिर्फ यह नहीं रहता कि कौन पिछड़ा है—सवाल यह बन जाता है कि क्या पूरा देश ही पीछे की ओर धकेला जा रहा है?


